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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 709
ऋषिः - सौभरि: काण्व:
देवता - इन्द्रः
छन्दः - काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
19
उ꣡प꣢ त्वा꣣ क꣡र्म꣢न्नू꣣त꣢ये꣣ स꣢ नो꣣ यु꣢वो꣣ग्र꣡श्च꣢क्राम꣣ यो꣢ धृ꣣ष꣢त् । त्वा꣡मिध्य꣢꣯वि꣣ता꣡रं꣢ व꣣वृ꣢म꣣हे स꣡खा꣢य इन्द्र सान꣣सि꣢म् ॥७०९॥
स्वर सहित पद पाठउ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । क꣡र्म꣢꣯न् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सः । नः꣣ । यु꣡वा꣢꣯ । उ꣣ग्रः꣢ । च꣣क्राम । यः꣢ । धृ꣣ष꣢त् । त्वाम् । इत् । हि । अ꣣विता꣡र꣢म् । व꣣वृम꣡हे꣢ । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । इन्द्र । सानसि꣣म् ॥७०९॥
स्वर रहित मन्त्र
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत् । त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम् ॥७०९॥
स्वर रहित पद पाठ
उप । त्वा । कर्मन् । ऊतये । सः । नः । युवा । उग्रः । चक्राम । यः । धृषत् । त्वाम् । इत् । हि । अवितारम् । ववृमहे । सखायः । स । खायः । इन्द्र । सानसिम् ॥७०९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 709
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 22; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 22; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमात्मा का वरण करते हैं।
पदार्थ
हे (इन्द्र) परमसहायक परमात्मन् ! (कर्मन्) कर्मों में (ऊतये) रक्षा के लिये हम (त्वा) आपको (उप) प्राप्त होते हैं। भाइयो ! देखो (सः) वह (नः) हमारा (युवा) सदा युवा रहनेवाला (उग्रः)वीर प्रभु, उस पर (चक्राम) आक्रमण कर देता है, (यः) जो आन्तरिक या बाह्य शत्रु (धृषत्) हमें दबाता है। हे परमेश ! (सखायः) आपके सखा हम (अवितारम्) रक्षक, (सानसिम्) संभजनीय (त्वाम् इत् हि) आपको ही (ववृमहे) वरण करते हैं ॥२॥
भावार्थ
महाशक्तिशाली जीव को भी संसार-समराङ्गण में विजय पाने के लिये परमात्मा की सहायता अपेक्षित होती है ॥२॥
पदार्थ
(कर्मन्) प्रत्येक कर्म में (ऊतये) रक्षा के लिए (त्वा-उप) तेरी हम उपासना करते हैं (सः-यः-युवा-उग्रः-धृषत्-नः-चक्राम) वह जोकि युवा—सदा युवा पूर्ण समर्थ प्रतापी पाप प्रताड़क होता हुआ हमें उत्साही तेजस्वी करता है, अतः (इन्द्र त्वां सानसिम्-अवितारम्-इत्-हि) हे ऐश्वर्यवान् परमात्मन्! तुझ सम्भजनीय रक्षक को ही निश्चय (सखायः-ववृमहे) हम तेरे सखा—उपासकजन वरते हैं—अपनाते हैं।
भावार्थ
प्रत्येक कर्म में सदा समर्थ पापनाशक सम्भजनीय परमात्मा की उपासना करनी चाहिये॥२॥
विशेष
<br>
विषय
प्रभु का स्मरण करते हुए युद्ध कर
पदार्थ
(कर्मन्) = कर्म करते हुए हम (त्वा उप) = तेरे समीप स्थित होते हैं। क्यों? (ऊतये) = अपनी रक्षा के लिए। यह संसार चक्की के दो पाटों के समान है। इसमें व्यक्ति प्रभुरूपी कीली से दूर हुआ और पिसा।'हमारा प्रत्येक कर्म पवित्र बना रहे, कोई प्रलोभन हमें अपना शिकार न बना लें' इसके लिए आवश्यक है कि हम प्रभु के समीप बने रहें । प्रभु का स्मरण करें और संसार में अपने युद्ध को जारी
रक्खें । (सः) = वह प्रभु ही (नः) = हमें (युवा) = बुराइयों से पृथक् रखनेवाले हैं [यु=अमिश्रण] (उग्रः) = बड़े शक्तिशाली व हमारे कार्य को पूर्ण करनेवाले हैं [उग्र=Ready to do any work] । इस युद्ध में (यः धृषत्) = जो भी हमारा धर्षण करता है, उसे प्रभु (चक्राम) = पाँवों तले रौंद देते हैं । वस्तुतः प्रभु के बिना क्या हम इन वासनाओं को कभी कुचल सकेंगे? सब विजय, सब विभूति, सब ऐश्वर्य उस प्रभु का ही है। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! हम (त्वाम् इत् हि) = आपको ही निश्चय से (अवितारम्) = रक्षक (ववृमहे) = वरते हैं ।
प्रभु के वरने का प्रकार क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर मन्त्र के 'सखाय: ' शब्द में मिल रहा है । (सखायः) = समानख्याना: = कुछ प्रभु - जैसे प्रतीत होते हुए । प्रभु-जैसे बनने का प्रयत्न करते हुए ही पुरुष को प्रभु के वरण का अधिकार है । यहाँ यह नहीं हो सकता कि प्रभु को कार्य सौंपा और हमें मिल गई । पुरुषार्थ के उपरान्त ही प्रार्थना की सार्थकता है ।
छुट्टी ‘वे प्रभु कैसे हैं?’ (सानसिम्) = उचित संविभाग करनेवाले हैं [षण्=संभक्तौ] । हमें भी यह संविभाग का पाठ सीखना है। वासनाओं के आक्रमण से अपने को बचाना है तो यह पाठ पढ़ना आवश्यक है, बिना इस पाठ के पढ़े लोभ की वृत्ति पनपती है और व्यसन-वृक्ष फूलता-फलता है।
भावार्थ
हमारा प्रत्येक कर्म प्रभु-स्मरण के साथ हो ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( २ ) हे ( इन्द्र ) = परमेश्वर ! ( कर्मन् ) = समस्त कर्मों में ( ऊतये ) = रक्षा और ज्ञान के निमित्त ( त्वा ) = आपको ( उप ) = उपासना करते हैं । ( सः ) = वह ( युवा ) = बलवान् ( उग्रः ) = तेजस्वी है ( यः ) = जो ( धृषत् ) = शत्रु ,काम, क्रोधादि को पराजित करता है। हे ( इन्द्र ) = प्रभो ! ( त्वामिद् हि ) = तुझको ही हम ( सखायः ) = मित्र जीवगण मिलकर ( सानसिं ) = सबके प्रति समान रूप से आश्रय करने योग्य ( अवितारं ) = रक्षक रूप से ( ववृमहे ) = वरते हैं ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - सौभरि: । देवता - इन्द्र:। छन्दः - ककुप् । स्वरः - ऋषभ:।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमात्मानं वृणुते।
पदार्थः
हे (इन्द्र) परमसहायक परमात्मन् ! (कर्मन्२) कर्मणि। [अत्र ‘सुपां सुलुक्’ इति विभक्तेर्लुक्।] (ऊतये) रक्षार्थम् (त्वा)त्वाम् (उप) उपगच्छामः। द्वितीयः पादः परोक्षकृतः। पश्यत, (सः) असौ (नः) अस्माकम् (युवा) नित्यतरुणः (उग्रः) वीरः परमेश्वरः तम् (चक्राम) आक्रामति। [क्रमु पादविक्षेपे। लडर्थे लिट्] (यः) आन्तरो बाह्यो वा शत्रुः (धृषत्) अस्मान् प्रसहते। [धृष प्रसहने, लेट्।] हे परमेश ! (सखायः) तव सुहृदो वयम् (अवितारम्) रक्षकम्, (सानसिम्) संभजनीयम् (त्वाम् इत् हि) त्वामेव (ववृमहे) वृण्महे ॥२॥
भावार्थः
महाशक्तिरपि जीवः संसारसमराङ्गणे विजेतुं परमात्मनः साहाय्यमपेक्षते ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।२१।२, अथ० २०।१४।२ (ऋषिः सौभरिः), २०।६२।२। २. कर्मन्, कर्मणा यः सम्भजते तस्य सम्बोधनं, हे कर्मन् इति—वि०। तत्तु चिन्त्यं स्वरविरोधात्
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, for protection in all actions, we worship Thee. Thou art Mighty, Splendid, the Subduer of the foes like lust and anger, O God, therefore, we Thy friends, have chosen Thee as our succourer and worthy of adoration !
Meaning
We approach you for protection and success in every undertaking. O lord youthful and blazing brave who can challenge and subdue any difficulty, pray come to our help. Indra, friends and admirers of yours, we depend on you alone as our sole saviour and victorious lord and choose to pray to you only as the lord supreme. (Rg. 8-21-2)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (कर्मन्) પ્રત્યેક કર્મમાં (ऊतये) રક્ષાને માટે (त्वा उप) અમે તારી ઉપાસના કરીએ છીએ (सः यः युवा उग्रः धृषत् नः चक्राम) તે જે યુવા-સદા યુવાપૂર્ણ સમર્થ પ્રતાપી પાપ પ્રતાડક થઈને અમને ઉત્સાહી તેજસ્વી બનાવે છે, તેથી (इन्द्र त्वां सानसिम् अवितारम् इत् हि) હે ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મન્ ! તુજ સંભજનીય રક્ષકને જ નિશ્ચય (सखायः ववृमहे) અમે તારા મિત્ર-ઉપાસકજન વરણ કરીએ છીએઅપનાવીએ છીએ. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : પ્રત્યેક કર્મમાં સદા સમર્થ, પાપનાશક, સંભજનીય પરમાત્માની ઉપાસના કરવી જોઈએ. (૨)
मराठी (2)
भावार्थ
महाशक्तिशाली जीवालाही संसार समरांगणात् विजय प्राप्त करण्यासाठी परमेश्वराचे साह्य अपेक्षित असावे. ॥२॥
विषय
पुढच्या मंत्राद्वारे परमेश्वराचा स्वीकार करीत आहेत.
शब्दार्थ
(इन्द्र) हे सहायक परमात्मा (कर्मन्) आमच्या श्रेष्ठ कर्मांच्या (ऊतये) रक्षणासाठी आम्ही (व्वा) तुमच्या (उप) जवळ येत आहोत. (आमचे हे सत्कर्म पूर्ण व्हावेत, यासाठी आपले साह्य आवश्यक आहे. (स:) ते आपण (युवा) सदा युवा असणारे असून, (उग्र:) वीर आहात. (य:) जो आंतरिक वा बाह्य शत्रू आम्हांवर आक्रमण करतो, त्याला आमचा युवा वीर म्हणजे आपण त्याला (धृषत्) दाबून टाकता. हे परमेश, (सरमाय:) तुमचे श्ररवा आम्ही (अवितारम्) रक्षक आणि (सानसिम्) भजनीय असलेल्या (त्वाम्) आपल्यासारख्या परम मित्राला (ही) विश्वासपूर्वक) ववृमहे) चयन वा स्वीकार करीत आहोत ।।२।।
भावार्थ
महाशक्तिशाली आत्म्यालाही संसार रूप समरांगणांत विजय प्राप्त करण्यासाठी परमात्म्याच्या साहाय्याची आवश्यकता असते. ।।२।। २३) या प्रथम ऋचेची व्याख्या पूर्वार्चिक भागात क्र. ४०६ वर केली आहे. तिथे व्याख्या जगदीश्वरपर आहे.
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