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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 727
ऋषिः - इरिम्बिठिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
25
य꣡स्ते꣢ शृङ्गवृषो णपा꣣त्प्र꣡ण꣢पात्कुण्ड꣣पा꣡य्यः꣢ । न्य꣢꣯स्मिन् दध्र꣣ आ꣡ मनः꣢꣯ ॥७२७॥
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । ते꣣ । शृङ्गवृषः । शृङ्ग । वृषः । नपात् । प्र꣡ण꣢꣯पात् । प्र । न꣣पात् । कुण्डपा꣡य्यः꣢ । कु꣣ण्ड । पा꣡य्यः꣢꣯ । नि । अ꣣स्मिन् । दध्रे । आ꣢ । म꣡नः꣢꣯ ॥७२७॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्ते शृङ्गवृषो णपात्प्रणपात्कुण्डपाय्यः । न्यस्मिन् दध्र आ मनः ॥७२७॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । ते । शृङ्गवृषः । शृङ्ग । वृषः । नपात् । प्रणपात् । प्र । नपात् । कुण्डपाय्यः । कुण्ड । पाय्यः । नि । अस्मिन् । दध्रे । आ । मनः ॥७२७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 727
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।
पदार्थ
हे (शृङ्गवृषः नपात्) रश्मियों से वर्षा करनेवाले सूर्य को बिना ही आधार के आकाश में स्थिर करनेवाले जगदीश्वर ! (यः ते) जो आपका (प्र नपात्) प्रकृष्ट रूप से रक्षक (कुण्डपाय्यः) समुद्ररूप कुण्ड जिसमें सूर्य द्वारा पिये जाते हैं, ऐसा वृष्टिरूप यज्ञ है, (अस्मिन्) इसमें, उपासक लोग (मनः) अपने मन को (आ निदध्रे) निहित करते हैं ॥३॥
भावार्थ
जैसे सूर्य समुद्ररूप कुण्डों को पीकर बादल बना कर वर्षा करता है, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि धन कमाकर और योगसिद्धियाँ प्राप्त करके सत्पात्रों में उनकी वर्षा करें ॥३॥
पदार्थ
(ते शृङ्गवृषः) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तुझ अज्ञानान्धकारनाशक ज्ञानप्रकाशवर्षक का “शृङ्गाणि ज्वलतो नाम” [निघं॰ १.१७] (नपात्) न गिरानेवाला अपितु धारण करनेवाला तथा (प्रणपात्) आत्मा को भी प्रकृष्टरूप से न गिरानेवाला उत्कर्षकर्ता (कुण्डपाय्यः) कुण्ड से जैसे पान करने योग्य भरपूर आनन्दरस पान करना होता है वह जो अध्यात्मयज्ञ है “क्रतौ कुण्डपाय्यसञ्चाय्यौ” [अष्टा॰ ३.१.१३०] (अस्मिन्) इस—उस में (मनः-नि-आ दध्रे) उपासकजन अपने मन को नियम से निरन्तर रखते हैं—समर्पित करते हैं।
भावार्थ
अध्यात्मयज्ञ जोकि अज्ञानान्धकारनाशक ज्ञानप्रकाश सुख वर्षानेवाले परमात्मा का न गिराने—साक्षात् करानेवाला आत्मा का भी उत्कर्ष करानेवाला है उसमें उपासकजन अपना मन निरन्तर लगाया करते हैं॥३॥
विशेष
<br>
विषय
[ सोम कुण्डपाय्य है ] द्वेष-शून्य समाज
पदार्थ
प्रभु कहते हैं कि हे इरिम्बिठे! (यः) = जो सोम (ते) = तेरा (शृङ्गवृष:- नपात्) = धर्म के शिखर से न गिरनेवाला है। वृषस्य शृङ्ग = शृङ्गवृषः = राजदन्तवत् । यहाँ वृष का परनिपात है। जो (प्रणपात्) = पतन से अतिशेयन बचानेवाला है और (कुण्डपाय्य:) = दाह, जलन, ईर्ष्यादि से रक्षा करनेवाला है [कुडि दाहे]। (नि) = निश्चय से (अस्मिन्) = इस सोम में (ते) = तेरा (मनः) = मन (आदध्रे) = सर्वथा धारण किया जाए। तू सब प्रकार से इसकी रक्षा करनेवाला बन ।
धर्म को वृष कहते हैं, क्योंकि यह सचमुच सुखों की वर्षा करनेवाला है। जब मनुष्य वीर्यरक्षा के लिए अपने मन को दृढ़ निश्चयी बना लेता है तब यह सुरक्षित वीर्य उस संयमी पुरुष को धर्म के शिखर से गिरने नहीं देता ।
यह वीर्य शरीर में ऊर्ध्वगतिवाला होकर मनुष्य को भी ऊँचा उठाता है, इसके संयम का निश्चय करके ऊर्ध्व-रेतस् बनने का निश्चय करते ही मनुष्य ('निषाद') = पापियों से ऊपर उठकर 'शूद्र' बन जाता है । वीर्य के रुधिर में प्रवेश करते ही यह (विश्) = वैश्य हो जाता है। जब वीर्य इसकी क्षतों = रोगादि से रक्षा करता है तब यह भी (क्षेत्र) = बनता है और जब यह सुरक्षित वीर्य ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, तब यह भी ब्राह्मण बन जाता है । एवं, वीर्य की ऊर्ध्वगति के अनुपात में मनुष्य ऊपर-व-ऊपर उठता जाता है । =
इन दोनों बातों से बढ़कर बात तो यह है कि यह संयमी पुरुष ईर्ष्या जलन व द्वेषादि की वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है । वीर्य (कुण्ड) = ईर्ष्या आदि से (पाय्य) = रक्षा करनेवाला है।
भावार्थ
हमारी सारी शक्ति वीर्य-र - रक्षा पर केन्द्रित हो, जिससे हम धर्म के शिखर से न गिरें । उन्नति करते-करते हम उन्नति-पर्वत के शिखर पर पहुँचें तथा ईर्ष्या-द्वेष से ऊपर उठ जाएँ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = (३) हे ( इन्द्र ) = आत्मन् ! ( यः ) = जो ( ते ) = तेरा ( शृङ्गवृषाः नपात् ) = अज्ञान नाश करनेहारे वृषस्वरूप आत्मा को न गिराने हारा, ( कुण्डपाय्यः ) = कुण्ड अर्थात् रमण करने वाले प्राणों द्वारा पान करने योग्य, ( प्र नपात् ) = आत्मा की रक्षा करने वाला ज्ञानरस है ( अस्मिन् ) = इसमें योगी ( मनः ) = मनन शील ध्यान को ( नि आदध्रे ) = नियत, या स्थिर रूप से धारण करता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - इरिमिठि:। देवता - इन्द्र। स्वरः - षड्ज: ।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनस्तमेव विषयमाह।
पदार्थः
हे (शृङ्गवृषः नपात्२) शृङ्गैः रश्मिभिः वर्षतीति शृङ्गवृट् सूर्यः तस्य न पातयितः निरालम्बमेव गगने स्थापयितः जगदीश्वर ! (यः ते) यः तव (प्र नपात्) प्रकर्षेण न पातयिता, प्रत्युत रक्षकः, (कुण्डपाय्यः३) समुद्ररूपाणि कुण्डानि पीयन्ते यस्मिन् तादृशः वृष्टिरूपो यज्ञः अस्ति। [‘क्रतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ’ अ० ३।१।१३० इत्यनेन क्रत्वर्थे निपात्यते।] (अस्मिन्) एतस्मिन् उपासकाः (मनः) स्वीयचित्तम् (आ निदध्रे) आ निदधिरे, निहितं कुर्वन्ति। [‘इरयो रे’। अ० ६।४।७६ इति इरे इत्यस्य रे भावः] ॥३॥
भावार्थः
यथा सूर्यः समुद्रकुण्डानि पीत्वा मेघान् निर्माय वृष्टिं करोति तथैव जनैरपि धनान्यर्जयित्वा योगसिद्धीश्च प्राप्य सत्पात्रेषु तद्वृष्टिर्विधेया ॥३॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।१७।१३, अथ० २०।५।७। २. गृणन्ति हिंसन्तीति शृङ्गाणि रश्मयः तैर्वर्षतीति शृङ्गवृड् आदित्यः, तस्य न पातयितः स्वकीयेऽवस्थानेऽवस्थापयितः। ‘सुबामन्त्रिते’ पा० २।१।२ इति षष्ठ्यन्तस्य पराङ्गवद्भावेनामन्त्रितानुप्रवेशात् समुदायस्याष्टमिकं सर्वानुदात्तत्वम्—इति सा०। ३. कुण्डैः पीयते अस्मिन् सोम इति कुण्डपाय्यः क्रतुविशेषः—इति सा०। अत्र कुण्डाश्चमसाः कुण्डप्रतिरूपाः तैः पीयते कुण्डपाय्यः—इति वि०।
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, Thy soul-protecting knowledge, which is realizable through Pranas, does not allow the ignorance-dispelling soul degrade. A Yogi concentrates his mind on it !
Translator Comment
It' means the knowledge of God. Wilson observes, the construction of the verse, is loose and the explanation not very satisfactory.^Grassman places the stanza In his appendix as having no connection with the rest of the original hymn. Sorry both the Commentators take a wrong view. The meaning of the verse is clear as day-light.
Meaning
O lord, the sun on high which neither falls nor allows others, planets and satellites, to fall is your creation and it is the protector and sustainer of the vault of heaven and the firmament. On this we meditate and concentrate our mind. (Rg. 8-17-13)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ: (ते श्रृङ्गवृषः) હે ઐશ્વર્યવાનપરમાત્મન્ ! તારા અજ્ઞાન-અંધકાર નાશક જ્ઞાન-પ્રકાશવર્ષકના (नपात्) ન પાડનાર પરંતુ ધારણ કરનાર તથા (प्रणपात्) આત્માને પણ પ્રકૃષ્ટરૂપ ન પાડનાર-ઉત્કર્ષ કરનાર (कुण्डपाय्यः) કુંડથી જેમ પાન કરવા યોગ્ય ભરપૂર આનંદરસનું પાન કરવાનું હોય છે તે જે અધ્યાત્મયજ્ઞ છે (अस्मिन्) એ તેમાં (मनः नि आ दधे) ઉપાસકજન પોતાનાં મનને નિરંતર નિયમમાં રાખે છે-સમર્પિત કરે છે. (૩)
भावार्थ
ભાવાર્થ : અધ્યાત્મયજ્ઞ જે અજ્ઞાન-અંધકાર નાશક, જ્ઞાન-પ્રકાશ સુખ વરસાવનાર પરમાત્માનો ન પાડનાર-સાક્ષાત્ કરાવનાર આત્માનો પણ ઉત્કર્ષ કરાવનાર છે, તેમાં ઉપાસકજન પોતાનું મન નિરંતર લગાવ્યા કરે છે. (૩)
मराठी (2)
भावार्थ
जसा सूर्य समुद्ररूप कुण्डाना प्राशन करून मेघ उत्पन्न करतो व वृष्टी करतो, तसेच माणसांनी धन कमावून व योगसिद्धी प्राप्त करून सत्पात्रांमध्ये त्यांचा वर्षाव करावा ॥३॥
विषय
पुढच्या मंत्रात पुन्हा त्याच विषयाचे वर्णन आहे.
शब्दार्थ
हे जगदीश्वर, आपण (शृंगवृष: नपात्) आपल्या किरणांची वृष्टी करणाऱ्या सूर्याला कोणत्याही आधाराविना आकाशात स्थिर करणारे आहेत. (य: ते) तुमच्या जो (प्रवपात्) प्रकृष्ट रूपेण रक्षक असलेल्या (कुणुपाय्य:) समुद्र रूप कुंडातून जो वृष्टीरूप यज्ञ केला जातो, (अस्मिन्) त्या यज्ञात उपासक जन (मन:) आपल्या मनाला (आ निदध्रे) केंद्रित वा स्थिर करतात. (वृष्टी यज्ञ करण्यासाठी प्रवृत्त होतात.)
भावार्थ
ज्याप्रमाणे सूर्य समुद्र रूप कुंडाचे पाणी पिऊन त्याचे रूपांतर ढगामध्येकरतो आणि पृथ्वीवर पाऊस पाडतो, तद्वत माणसांनी धन कमवावे, योग सिद्धी प्राप्त कराव्यात आणि त्या धनाचा व सिद्धीचा लाभ सप्तात्र व्यक्तींना होऊ द्यावा. ।।३।।
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