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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 734
    ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    27

    इ꣣द꣡म् व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥७३४॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ꣣द꣢म् । वसो । सुत꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣡पू꣢꣯र्णम् । सु । पू꣣र्णम् । उद꣡र꣢म् । उ꣣ । द꣡र꣢꣯म् । अ꣡ना꣢꣯भयिन् । अन् । आ꣣भयिन् । ररिम꣢ । ते꣣ ॥७३४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदम् वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥७३४॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इदम् । वसो । सुतम् । अन्धः । पिब । सुपूर्णम् । सु । पूर्णम् । उदरम् । उ । दरम् । अनाभयिन् । अन् । आभयिन् । ररिम । ते ॥७३४॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 734
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 2; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १२४ पर परमात्मा और अतिथि के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ गुरुजन शिष्य को ब्रह्मानन्द-रस का पान करा रहे हैं।

    पदार्थ

    हे (वसो) गुरुकुलनिवासी, व्रतपालक ब्रह्मचारी ! (इदम् अन्धः) यह ब्रह्मविज्ञान, तेरे लिए (सुतम्) अभिषुत है, तू इसे (सुपूर्णम् उदरम्) पेट भरकर (पिब) पान कर। हे (अनाभयिन्) निर्भय शिष्य ! हम (ते) तेरे लिए, यह विज्ञान (ररिम) दे रहे हैं ॥१॥

    भावार्थ

    जिन्होंने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे गुरुजनों को उचित है कि वे छात्रों को ब्रह्मज्ञान देकर अनुगृहीत करें ॥१॥

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    टिप्पणी

    (देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या १२४)

    विशेष

    ऋषिः—मेधातिथिः प्रियमेधो वा (मेधा से परमात्मा में गमन प्रवेश करने वाला या प्रिय है मेधा जिसको)॥<br>देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥

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    विषय

    प्रभु का उपहार

    पदार्थ

    प्रियमेध ऋषि से प्रभु कहते हैं कि हे (वसो) = उत्तम निवास करने के लिए प्रयत्नशील जीव ! (इदम्) = यह (अन्धः) = आध्यायनीय – सर्वथा ध्यान देने योग्य वीर्य-शक्ति [सोम] (सुतम्) = मैंने तुझमें पैदा कर दी है। (पिब) = तू इसका पान कर, इसे अपने अन्दर ही व्याप्त करने के लिए प्रयत्न कर। पी हुई यह शक्ति (सुपूर्णम्) = उत्तम प्रकार से तेरा पालन व पूरण करनेवाली होगी । तेरे शरीर पर रोगों का आक्रमण न होगा, मन में ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न न होंगे तथा बुद्धि में कुण्ठता न आएगी । तेरा पूरण तो करेगी ही (उत) = और (अरम्) = वह तेरे जीवन को अलंकृत कर देगी । वीर्य शरीर को शक्ति सम्पन्न करता है, मन को निर्मल व बुद्धि को तीव्र । एवं, यह शरीर, मन व बुद्धि तीनों को ही शोभान्वित करता है। इसके अतिरिक्त इस वीर्य-रक्षा का सबसे महान् लाभ तो यह है कि मनुष्य निर्भीक बनता है। प्रभु कहते हैं कि (अनाभयिन्) = हे निर्भीक प्रियमेध! ते (ररिम) = तुझे हम सर्वोत्तम भेंट प्राप्त कराते हैं। प्रभु की जीव के प्रति अनन्त देनों में यह सर्वोत्तम देन है। इसी पर अन्य सारी उन्नति निर्भर है 

    भावार्थ

    सुरक्षित वीर्य हमारा पालन व पूरण करता है, यह हमारे जीवन को अलंकृत करता | है और हमें निर्भीक बनाता है ।
     

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = (१) व्याख्या देखो अवि० सं० [१२४] पृ० ६६ ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - काण्व: प्रियमेध:। देवता - इन्द्र:। स्वरः - षड्ज:।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके १२४ क्रमाङ्गे परमात्मविषयेऽतिथिविषये च व्याख्याता। अत्र गुरवः शिष्यं ब्रह्मज्ञानरसं पाययन्ति।

    पदार्थः

    हे (वसो) गुरुकुले कृतनिवास व्रतपालक ब्रह्मचारिन् ! (इदम् अन्धः) एतद् ब्रह्मविज्ञानम् तुभ्यम् (सुतम्) अभिषुतमस्ति, त्वम् एतत् (सुपूर्णम् उदरम्) कणेहत्य (पिब) आस्वादय। हे (अनाभयिन्) निर्भय शिष्य ! वयम् (ते) तुभ्यम्, एतद् विज्ञानम् (ररिम) प्रयच्छामः ॥१॥

    भावार्थः

    कृतब्रह्मसाक्षात्कारैर्गुरुभिश्छात्रा ब्रह्मज्ञानदानेनानुग्राह्याः ॥१॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।२।१, साम० १२४।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O fearless King, the settler of thy subjects, eat thou to thy heart’s content, this nicely prepared food, which we offer thee !

    Translator Comment

    The verse is the same as 124, but with a different interpretation.

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    Meaning

    O lord of the worlds treasure of wealth, honour and excellence, here is this exhilarating soma nectar of love and devotion distilled from the heart and soul. Pray drink of it to your hearts content. We offer it to you, lord beyond fear. (Rg. 8-2-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (वसो) હે મારા હૃદયમાં તથા મારામાં નિવાસ કરનાર પરમાત્મન્ ! (इदं सुतम्) એ ઉત્પન્ન (उत् अरम्) ઉપર ગમનશીલ , ઊભરનાર - ઉછળનાર (अन्धः) સોમ - સોમ્ય હૃદયના ભાવથી પૂર્ણ સ્તુતિ , પ્રાર્થના , ઉપાસનારસ ધારા પ્રવાહને (सुपूर्णम्) જે સમ્યક્ પૂર્ણ છે , સમસ્ત આત્મ ભાવનાથી ભરેલ છે , તેનું (पिब) પાન કર , સ્વીકાર કર. (आभयम्) જેના આશ્રયમાં જરા પણ ભય નથી તે સર્વથા નિર્ભય શરણવાલા પરમાત્મન્ ! (ते ररिमा) અમે તારા માટે આપીએ છીએ - સમર્પિત કરીએ છીએ. (૧૦)

     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : મારા હૃદય અને આત્મામાં નિવાસી , નિર્ભય શરણ પરમાત્મન્ ! તું મારામાં ઉભરતા-ઉછળતા સમસ્ત આત્મ ભાવનાથી પૂર્ણ સોમ્ય હૃદયના ભાવથી ભરેલી સ્તુતિ , પ્રાર્થના , ઉપાસનારૂપ રસ ધારા પ્રવાહનું પાન કર , સ્વીકાર કર , તને ભેટ ધરું છું. તું મને અપનાવી લે , હું તારા નિર્ભય શરણમાં રહું , કારણ કે તારો સ્વભાવ છે देहि मे ददामि ते(યજુ૦ ૩.૫૦)તું મને આપ હું તને આપું. (૧૦)

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    ज्यांनी ब्रह्माचा साक्षात्कार केलेला आहे, अशा गुरूजनांनी शिष्यांना ब्रह्मज्ञान देऊन अनुगृहित करावे ॥१॥

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    विषय

    प्रथम ऋचा पूर्वार्चिकात क्र. १२४ वर आली आहे. तिथे तिची व्याख्या परमेश्वर आणि अतिथीविषयी केली आहे. इथे गुरुजन शिष्याला ब्रह्मानंद रस पाजवित आहेत.

    शब्दार्थ

    हे (वसो) गुरुकुलात निवास करणाऱ्या शिष्य, व्रतधारक ब्रह्मचारी (इदमु) अन्ध:) हे ब्रह्मविज्ञान मी तुझ्यासाठी (सुतम्) तयार वा उत्पन्न केले आहे. तू हे ज्ञान रस (सुपूर्णम् उदरम्) पेर भरून म्हणजे भरपूर (पिव) पी. हे (अनाथयित्) निर्भय शिष्य, आम्ही गुरूजन (ते) तुझ्यासाठी हे विशेष ज्ञान (रमि) देत आहोत. ।।१।।

    भावार्थ

    ज्या गुरूजनांनी ब्रह्म साक्षात्कार केला आहे. त्यांनी आपल्या शिष्यांना ते ब्रह्मज्ञान देऊन उपकृत करावे. हे त्यांचे कर्तव्यच आहे. ।।१।।

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