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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 80
    ऋषिः - पायुर्भारद्वाजः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
    23

    स꣣ना꣡द꣢ग्ने मृणसि यातु꣣धा꣢ना꣣न्न꣢ त्वा꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि꣣ पृ꣡त꣢नासु जिग्युः । अ꣡नु꣢ दह स꣣ह꣡मू꣢रान्क꣣या꣢दो꣣ मा꣡ ते꣢ हे꣣त्या꣡ मु꣢क्षत꣣ दै꣡व्या꣢याः ॥८०॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स꣣ना꣢त् । अ꣣ग्ने । मृणसि । यातुधा꣡ना꣢न् । या꣣तु । धा꣡ना꣢꣯न् । न । त्वा꣣ । र꣡क्षाँ꣢꣯सि । पृ꣡त꣢꣯नासु । जि꣣ग्युः । अ꣡नु꣢꣯ । द꣣ह । सह꣡मू꣢रान् । स꣣ह꣢ । मू꣣रान् । क꣣या꣡दः꣢ । क꣣य । अ꣡दः꣢꣯ । मा । ते꣣ । हेत्याः꣢ । मु꣣क्षत । दै꣡व्या꣢꣯याः ॥८०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षाꣳसि पृतनासु जिग्युः । अनु दह सहमूरान्कयादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः ॥८०॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सनात् । अग्ने । मृणसि । यातुधानान् । यातु । धानान् । न । त्वा । रक्षाँसि । पृतनासु । जिग्युः । अनु । दह । सहमूरान् । सह । मूरान् । कयादः । कय । अदः । मा । ते । हेत्याः । मुक्षत । दैव्यायाः ॥८०॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 80
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 8
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 8;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से राक्षस-संहार की प्रार्थना की गयी है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन् ! अथवा शत्रुसंहारक राजन् ! आप (सनात्) चिरकाल से (यातुधानान्) पीड़ादायक, घात-पात, हिंसा, उपद्रव आदि दोषों को और दुष्टजनों को (मृणसि) विनष्ट करते आये हो। (रक्षांसि) काम-क्रोध-लोभ आदि और ठग-लुटेरे-चोर आदि राक्षस (त्वा) आपको (पृतनासु) आन्तरिक और बाह्य देवासुर-संग्रामों में (न जिग्युः) नहीं जीत पाते। आप (कयादः) सुख-नाशक दुर्विचारों तथा दुष्टजनों को (सहमूरान्) समूल (अनुदह) एक-एक करके भस्म कर दीजिए। (ते) वे दुष्टभाव और दुष्टजन (ते) आपके (दैव्यायाः) विद्वज्जनों का हित करनेवाले (हेत्याः) दण्डशक्तिरूप वज्र से एवं शस्त्रास्त्रों से (मा मुक्षत) न छूट सकें ॥८॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है, वीर रस है ॥८॥

    भावार्थ

    हे धर्मपालक, विधर्मविध्वंसक, सद्गुणप्रसारक जगदीश्वर वा राजन् ! आपके प्रशंसक हम जब-जब मानसिक या बाह्य देवासुर-संग्राम में काम-क्रोध-लोभ-मोह आदिकों में और ठग-लुटेरे-हिंसक-चोर-शराबी-व्यभिचारी-भ्रष्टाचारी आदि दुष्टजनों से पीड़ित हों, तब-तब आप हमारे सहायक होकर उन्हें जड़-समेत नष्ट करके हमारी रक्षा कीजिए। दुर्जनों का यदि हृदय-परिवर्तन सम्भव हो तो उनका राक्षसत्व नष्ट करके उन्हें शुद्ध अन्तःकरणवाला कर दीजिए, जिससे संसार में सज्जनों की वृद्धि से सर्वत्र सुख और सौहार्द की धारा प्रवाहित हो ॥८॥ इस दशति में परमात्माग्नि को जागृत करने का, अग्नि, पूषन् और जातवेदस् नामों से परमात्मा के गुणों का और उसके द्वारा किये जानेवाले राक्षस-विनाश का वर्णन होने से तथा मनुष्यों को परमात्मा की पूजा की प्रेरणा किये जाने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥

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    पदार्थ

    (अग्ने) हे शोधक अज्ञानान्धकारनाशक परमात्मन्! तू (यातुधानान्) अपने तथा अन्यों के प्रति यातना धारण करने वालों पीड़ा पहुँचाने वाले पापविचारों तथा पापीजनों को (सनात्-मृणसि) नित्य या सर्वदा “सनात् नित्ये—सर्वदा वा” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] हिंसित करता है नष्ट करता है (त्वा रक्षांसि पृतनासु न जिग्युः) तुझे राक्षस—जिनसे रक्षा करनी चाहिए ऐसे पापविचार और पापीजन संघर्ष संग्रामों में “पृतनाः संग्राम नाम” [निघं॰ २.१७] जीत नहीं सकते हैं—तेरे दण्डविधान का उलङ्घन नहीं कर सकते हैं (मूरान् कयादः-सह-अनुदह) मूढ—अज्ञानपरायण तथा शरीरस्थ मांस खाने वालों का एकसाथ भस्म कर दे—कर देता है—तुच्छ असमर्थ कर देता है “लडर्थे लोट्” (दैव्यायाः-हेत्याः) तेरी दैवी—तीक्ष्ण हेति वज्रशक्ति से “हेतिः-वज्रनाम” [निघं॰ २.२०] (ते मा मुुक्षत) वे न छूट सकें—नहीं छूट सकते।

    भावार्थ

    परमात्मा सदा से या नित्य मनुष्यों के पीडक विचारों—पाप भावों एवं पापियों को नष्ट करता है, पाप और पापी उसके सम्मुख तुच्छ हैं उन ऐसे शरीर का मांस सुखाने तथा खाने वाले पाप-विचारों और पापियों को एक साथ भस्म करने तुच्छ करने में समर्थ है उसके दिव्य वज्र से कोई पाप और पापी बच नहीं सकता, उसका चिन्तनबल पाप को भगाने वाला उसका आश्रय पापियों से रक्षा करता है॥८॥

    विशेष

    ऋषिः पायुः (दोषनिवारण गुणधारण अपनी रक्षा करने वाला उपासक)॥<br>

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    विषय

    राक्षसों का समूल-दहन

    पदार्थ

    हे (अग्ने)= प्रभो! आप हृदयान्तरिक्ष में ज्ञान व भक्ति की अरणियों से जगाये जाकर (सनात्) = सदा से यातुधानान् पीड़ित करनेवाली राक्षसी वृत्तियों को [यातूनि यातनाः पीडा धीयन्ते अस्मिन्] (मृणसि) = कुचलते हो। जीव की अपनी शक्ति नहीं कि वह इन अशुभ वृत्तियों को नष्ट कर सके| इनका विनाश तो 'नर' के हित के लिए 'नारायण' ही करेंगे। 

    प्रभो! (त्वा)=आपको (पृतनासु) = मनुष्यों के हृदयों में चल रहे देवासुर संग्रामों में (रक्षांसि) = [र+क्ष] रमण के द्वारा क्षय की ओर ले जानेवाली ये अशुभ वृत्तियाँ (न जिग्युः) = पराजित नहीं कर सकतीं [पृतना = battle, encounter, fight] । जीव अकेला इन अशुभ वृत्तियों से हार जाता जब वह प्रभु को अपने रथ पर बिठा लेता है तो वे वृत्तियाँ प्रभु को थोड़े ही हरा परन्तु सकती हैं, परिणामतः जीव उनका शिकार होने से बच जाता है। है

    हे प्रभो! आप इन (कयाद:) = [क्रव्यादः] मनुष्य का मांस ही खा जानेवाली अशुभ वृत्तियों को (सह मूरान्) = जड़ समेत अर्थात् इनके उत्पत्तिकारणों के साथ (अनुदह) = क्रम से जला दीजिए। जब जीव प्रभु को अपना साथी बनाता है तो वे जीव के हित के लिए इन अशुभ वृत्तियों का 'समूल दहन' कर देते हैं। कामादि के ध्वंस के साथ उनके उत्पत्तिकारणों को भी प्रभुस्मरण समाप्त कर देता है। हे प्रभो! (ते) = आपके (दैव्याया:) = अलौकिक प्रकाशमय (हेत्या:) = हनन साधन से कोई भी अशुभ वृत्ति (मा)= मत (मुक्षत) = छूटे | इन अशुभ वृत्तियों को नष्ट करनेवाला शस्त्र प्रकाश व ज्ञान ही है। ज्ञानाग्नि ही इन अशुभ वृत्तियों का दहन किया करती है। 

    हम सब प्रभु दर्शनरूप ज्ञानाग्नि को अपने अन्दर प्रज्वलित करके ही इन अशुभ से अपनी रक्षा कर सकते हैं। ऐसा करने पर हम इस मन्त्र के ऋषि (‘पायु:')='रक्षा करनेवाले कहलाएँगे।

    भावार्थ

    प्रभुस्मरण राक्षसी वृत्तियों का समूल दहन कर देता है।

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    विषय

    परमेश्वर की स्तुति

    भावार्थ

    भा० = हे अग्ने ! परंसतापकारिन् तू ( सनात् ) = प्राचीनकाल से ( यातुधानान् ) = दुष्ट पुरुषों को ( मृणसि ) = पीड़ित, दण्डित करता रहा है । ( पृतनासु ) = सेना संग्रामों में ( रक्षांसि ) = राक्षस लोग ( न त्वा ) = तुझको कभी भी नहीं ( जिग्युः ) = जीत सके हैं । ( मूरान् ) = मूढ़ ( कयाद:१  ) = ऋव्याद -कच्चा मांस खाने वाले राक्षसों को ( सह ) = एक ही साथ तू ( अनु दह ) = तेज से भस्म कर डाल । वे ( ते ) = तेरी ( दैव्यायाः ) = दिव्यगुणों से युक्त ( हेत्या ) = शस्त्र की धार से ( मा मुक्षत ) = न बच पावें । 

    टिप्पणी

    ८० - 'ऋव्यादो' इति ऋ० ।
    १. कयाद् | रेफवकारयोश्छन्दसि लोपः ( स०सा० )
     

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः -  पायु:  । छन्द: - त्रिष्टुभ । देवता :- अग्नि: ।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मा राजा च राक्षससंहाराय प्रार्थ्यते।

    पदार्थः

    हे (अग्ने) अग्रणीः परमात्मन् शत्रूच्छेदक राजन् वा ! त्वम् (सनात्) चिरकालात्। सनादिति चिरम् इत्यर्थे व्याख्यातो निरुक्ते १२।३४। (यातुधानान्२) यातनाधायकान् घातपातहिंसोपद्रवादीन् दोषान् दुष्टजनान् वा (मृणसि) मर्दयसि, विनाशयसि। मृण हिंसायाम्, तुदादिः। (रक्षांसि) कामक्रोधलोभादयो वञ्चकलुण्ठकतस्करादयो वा राक्षसाः (त्वा) त्वाम् (पृतनासु) आभ्यन्तरेषु बाह्येषु च देवासुरसंग्रामेषु। पृतनेति संग्रामनाम। निघं० २।१७। (न जिग्युः) न जेतुं शक्नुवन्ति। जि जये, लडर्थे लिट्। ‘सन् लिटोर्जेः।’ अ० ७।३।५७ इति कुत्वम्। त्वम् (कयादः३) कं सुखं यातयन्ति विनाशयन्तीति तान् दुर्विचारान् दुष्टजनान् वा। कम् इति सुखनाम। निरु–० २।१४। यातयतिः हिंसाकर्मा। निघं० २।१९। (सहमूरान्४) समूलान्। रलयोरभेदः। (अनुदह) अनुक्रमेण भस्मसात् कुरु। ते दुष्टभावा दुष्टजनाश्च (ते) तव (दैव्यायाः) देवेभ्यो विद्वद्भ्यो हिता दैव्या तस्याः। देवशब्दाद् हितार्थे देवाद् ययञौ अ० ४।१।८५ वा० इति यञ् प्रत्ययः। (हेत्याः५) दण्डशक्तेः शस्त्रास्त्रसमूहाच्च। हेतिः वज्रनाम। निघं० २।२०। (मा मुक्षत) मुक्ता मा भूवन्। मुचोऽकर्मकस्य लुङि, अडभावे, प्रथमबहुवचने रूपम् ॥८॥ अत्र अर्थश्लेषालङ्कारः, वीरो रसः ॥८॥

    भावार्थः

    हे धर्मपालक विधर्मविध्वंसक सद्गुणप्रसारक जगदीश्वर राजन् वा ! तव प्रशंसका वयं यदा यदा मानसे बाह्ये वा देवासुरसंग्रामे कामक्रोधलोभमोहादिभिर्वञ्चक-लुण्ठक-हिंसक-तस्कर-मद्यप-व्यभिचारक-भ्रष्टाचारकप्रभृतिभिर्दुष्टजनैश्च पीड्यामहे तदा तदाऽस्माकं सहायको भूत्वा तान् समूलघातं हत्वाऽस्मान् रक्ष। दुर्जनानां च यदि हृदयपरिवर्तनं संभवेत् तदा तेषां राक्षसत्वं विनाश्य तान् शुद्धान्तःकरणान् कुरु, येन जगति सज्जनानां वृद्ध्या सर्वत्र सुखसौहार्दधारा प्रवहेत् ॥८॥ अत्र परमात्माग्नेर्जागरणवर्णनाद्, अग्नि-पूषन्-जातवेदोनामभिः परमात्मगुणवर्णनात्, तत्क्रियमाणराक्षसविनाशवर्णनाद्, मनुष्याणां तत्पूजार्थं प्रेरणाच्चैतद्दशत्यर्थस्य पूर्वदशत्यर्थेन सह सङ्गतिरस्ति। इति प्रथमे प्रपाठके द्वितीयार्धे तृतीया दशतिः ॥ इति प्रथमेऽध्यायेऽष्टमः खण्डः ॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० १०।८७।१९, देवता अग्नी रक्षोहा, कयादो इत्यत्र ‘क्रव्यादो’—इति पाठः। अथ० ५।२९।११, ८।३।१८, उभयत्र सहमूराननु दह क्रव्यादो इति तृतीयः पादः। २. याति हिंसाकर्मा। यातुर्हिंसा। यातोर्निधानभूता इति यातुं विदधति इति वा यातुधानाः—इति भ–०। ३. कयादः। क्रव्यशब्दस्य रेफवकारयोश्छन्दसि वर्णलोपेन कय इत्येतद् भवति। कयं ये अदन्ति ते कयादः क्रव्यादाः। मांसस्य भक्षयितॄनित्यर्थः—इति वि०। तदेव भरतसायणोरभिमतम्। ४. सहमूरान् सहभूतान् मूढान्, मूर्खानित्यर्थः—इति वि०। मूढेन सहितान्—इति भ–०। ५. हन्तेः हिनोतेर्वा हेतिः—इति भ०।

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    G God, from times immemorial Thou hast been punishing the sinners. Evil forces have never overcome Thee in fights. Bum up the raw flesh devourers; Let none of them escape the edge of Thine divine weapon.

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    Meaning

    Agni, you destroy the oppressors since time immoral. Never can the evil dominate over you in their battles against the good. Let the flesh eaters along with the cruel and wicked be destroyed, and may they never escape the strike of your divine punishment and natural retribution. (Rg. 10-87-19)

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    Translation

    O fire-divine, from the days of yore, you have been destroying the evil-doers; these wicked ones have never overcome you in fight; please burn the murderous flesh-eating such creatures one by one; let none of them escape alive against your divine weapons.

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    गुजराती (1)

    पदार्थ


    પદાર્થ : (अग्ने) હે શોધક અજ્ઞાન - અંધકાર નાશક પરમાત્મન્ ! તું (यातुधानान्) પોતાના પ્રત્યે યાતના ધારણ કરનાર પાપવિચારો તથા અન્યોને પીડા આપનાર પાપિજનોને (सनात् मृणसि) હિંસિત અર્થાત્ નષ્ટ કરે છે - (त्वा रक्षांसि पृतनासु न जिग्युः) તને રાક્ષસ - જેનાથી રક્ષા કરવી જોઈએ એવા પાપ વિચારો અને પાપિજનો સંઘર્ષ સંગ્રામોમાં જીતી શકતા નથી (मूरान् क्यादः सह अनुदह) મૂઢ - અજ્ઞાન પરાયણ તથા શરીરનું માંસ ખાનારને એક સાથે ભસ્મ કરી નાખ - કરી નાખે છે. - તુચ્છ અસમર્થ બનાવી દે છે. (दैव्यायाः हेत्याः) તારી દૈવી - તીક્ષ્ણ હેતિ = વજ્ર શક્તિથી (ते मा मुक्षत) તેઓ છૂટે નહિ - છૂટી શકતા નથી. (૮)

     

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્મા સદા થી અથવા નિત્ય મનુષ્યોના પીડાદાયક વિચારો-પાપભાવો અને પાપીઓને નષ્ટ કરે છે , પાપ અને પાપી તેની સામે તુચ્છ છે. તે એવા શરીરનું માંસ શોષનારા-સૂકવનારા તથા ખાનારા પાપ-વિચારો અને પાપીઓને એક સાથે ભસ્મ કરવા , તુચ્છ કરવામાં સમર્થ છે , તેના દિવ્ય વજ્રથી કોઈ પાપ અને પાપી બચી શકતા નથી , તેનું ચિંતનબળ પાપને ભગાડનાર તેનો આશ્રય પાપીઓથી રક્ષા કરે છે. (૮)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    ہمارے اندر کے پاپوں کو جلا کر بھسم کر دو!

    Lafzi Maana

    (اگنے) اگنی کے سمان پاپوں کو جلانے والے پرمیشور! آپ (سنات یا تودھانان) ہمیشہ جلاتے رہنے والے کام آدی دشمنوں کا (مرلسّی) وِناش کرتے ہیں۔ (پرتنا سوُرکھشانسی) دیو اُسر سنگراموں میں پاپ روُپی راکھشس (توُاجگیونہ) آپ پروِجے نہیں پا سکتے (مسُوران کیادہ) اندر رہنے والی ان ناش وان چنتاؤں ایرشا دویش جلن حسد کی آگ جو اندر ہی اندر شریر کے کچے مانس کو کھا کر سُکھا دیتی ہیں، ان کو آپ (انودہ) نرنتر جلاتے رہیں (تے) آپ کے (دیویا یا ہیتیہ) دیو شکتیوں کے بجر پر ہار سے (مامکھیت) یہ چھُوٹنے نہ پائیں۔
     

    Tashree

    ایشور کے دویہ بجر پر ہار سے کوئی پاپ اور پاپی بچ نہیں سکتا۔ اُس کے چنتن دھیان پریم بھگتی یوگا بھیاس کابل پاپ کو بھگانے والا اور اُس کا آشریہ پاپیوں سے رکھشا کرنے والا ہے۔
     

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे धर्मपालक, विधर्मविध्वंसक, सद्गुण प्रसारक जगदीश्वर किंवा राजा! तुझे प्रशंसक आम्ही जेव्हा जेव्हा मानसिक किंवा बाह्य देवासुर-संग्रामात काम-क्रोध-लोभ-मोह इत्यादींमध्ये व ठग-लुटारू-हिंसक-चोर-दारुडे-व्यभिचारी-भ्रष्टाचारी इत्यादी दुष्ट जनांकडून त्रस्त असल्यास तू आमचा सहायक बनून त्यांना समूळ नष्ट करून आमचे रक्षण कर. दुर्जनांचे जर हृदय परिवर्तन शक्य असेल तर त्यांचे राक्षसत्व नष्ट करून त्यांना शुद्ध अंत:करणयुक्त कर, ज्यामुळे जगात सज्जनांची वृद्धी होऊन सर्वत्र सुख व सौहार्दाची धारा प्रवाहित व्हावी ॥८॥

    टिप्पणी

    या दशतिमध्ये परमात्मग्नीला जागृत करण्याचे, अग्नी, पूषन् व जातवेदस् नावांनी परमात्म्याच्या गुणांचे व त्याच्याद्वारे केलेल्या राक्षस-विनाशाचे वर्णन असल्यामुळे व माणसांना परमात्म्याच्या पूजेची प्रेरणा केल्यामुळे या दशतिच्या विषयाची पूर्व दशतिच्या विषयाबरोबर संगती आहे

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    विषय

    आता परमेश्वराला आणि राजाला राक्षसांचा सहार करण्याविषयी प्रार्थना केली आहे.

    शब्दार्थ

    हे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन/अथवा हे शत्रुसंहारक राजा, तुम्ही (रागात) चिरकाळापासून (यातुधानान्) पीडा आमच्यातीलच पीडा नाश विनाश, हिंसा, उपद्रव आदी दोषांना / दुष्यांना (मृणसि) नष्ट करीत आले आहात. (रक्षसि) काम, क्रोध, लोभ आदी / डाकु, लुटारू, चोर आदी राक्षस (त्वा) तुम्हाला (पृतवासु) आंतरिक संग्रामात साह्य देवासुर-संग्रामात (न जिग्यु:) जिंकू शकत नाहीत. तुम्ही (कयाद:) सुखनाशक दुर्विचारांना / दुष्य जनांना (सहमुरान्) समूळ (अनुदह) एक एक करून भस्म करून टाका. (ते) ते दुष्टभाव / दुष्टजन (ते) तुमच्या (दैव्याया:) विद्वज्जन हितकारी (हेव्या:) दंड शक्तिरूप वज्राच्या प्रहारापासून / तीव्र शस्त्रांपासून (मा मुक्षत) सुटू शकणार नाहीत, असे करा. ।।८।।

    भावार्थ

    हे धर्मपालक, विधर्मविध्वंसक, सद्गुणप्रसारक, जगदीश्वर अथवा हे राजन् आपले प्रशंसक आम्ही उपासक/प्रजानन ज्या ज्या वेळी मानसिक/बाह्य देवासुर संग्रामात काम, क्रोध लोभ, मोह आदींपासून / ठक, पेंढारी, हिंसक, चोर, मद्यपी, व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी आदी दुष्टजनांद्वारे पीडित वा त्रस्त होऊ वा होतो. त्या त्यावेळी आपण आमचे सहाय्यक होऊन त्या दोषांना समूळ नष्ट करा आणि आमचे रक्षण करा. त्या दुर्जनांचे जर हृदय परिवर्तन होणे शक्य असेल तर तयंचे राक्षसत्व नष्ट करून त्यांना शुद्ध अंत:करणवान करा. की ज्यायोगे जगात सज्जनांची वृद्धी होऊन सर्वत्र सुख-सौहार्दाची धारा प्रवाहित होईल. ।।८।। प्रथम प्रपाठकातील द्वितीय अर्धाची तृतीय दशति समाप्त

    विशेष

    या मंत्रात अर्थश्लेषालंकार आहे. मंत्रात वीर रस आहे.

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    அரக்கர்களை அழிப்பவனே! உன்னை அவர்கள் வெல்ல முடியாது. அறிவு அற்றவர்களை எரிப்பவனே! பச்சை மாமிசத்தை உண்பவனே! உன்னுடைய தெய்வீக அம்பிற்கு எவரும் தப்ப முடியாது.

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