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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 846
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
20
यो꣢ अ꣣ग्निं꣢ दे꣣व꣡वी꣣तये ह꣣वि꣡ष्मा꣢ꣳ आ꣣वि꣡वा꣢सति । त꣡स्मै꣢ पावक मृडय ॥८४६॥
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । दे꣣व꣡वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣡तये । हवि꣡ष्मा꣢न् । आ꣣वि꣡वा꣢सति । आ꣣ । वि꣡वा꣢꣯सति । त꣡स्मै꣢꣯ । पा꣣वक । मृडय ॥८४६॥
स्वर रहित मन्त्र
यो अग्निं देववीतये हविष्माꣳ आविवासति । तस्मै पावक मृडय ॥८४६॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । अग्निम् । देववीतये । देव । वीतये । हविष्मान् । आविवासति । आ । विवासति । तस्मै । पावक । मृडय ॥८४६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 846
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।
पदार्थ
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) आत्मसमर्पणवाला उपासक (देववीतये) दिव्य गुण-कर्मों की प्राप्ति के लिए (अग्निम्) सब सुख प्राप्त करानेवाले तुझ परमात्मा को (आ विवासति) पूजता है, (तस्मै) उस उपासक को, हे (पावक) पवित्रतादायक परमात्मन् ! आप (मृडय) सुखी कीजिए ॥ द्वितीय—यज्ञ के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) उत्तम होम के द्रव्यों से युक्त याज्ञिक मनुष्य (देववीतये) तेज की प्राप्ति के लिए अथवा दिव्य सुख के सम्पादनार्थ (अग्निम्) तुझ यज्ञाग्नि का (आ विवासति) होम से सत्कार करता है (तस्मै) उसे, हे (पावक) वायुशुद्धि तथा हृदयशुद्धि करनेवाले यज्ञाग्नि ! तू (मृडय) आरोग्य आदि प्राप्त कराने के द्वारा सुखी कर, अर्थात् यज्ञाग्नि सुखी करे ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थ
जैसे श्रद्धा के साथ आत्मसमर्पणपूर्वक उपासना किया गया परमेश्वर दिव्य गुण-कर्मों को प्रेरित करता है, वैसे ही उत्तमोत्तम हव्य-द्रव्यों से होम किया हुआ यज्ञाग्नि आरोग्य प्रदान से तथा हृदय में तेज, शूरता आदि दिव्य गुणों की प्रदीप्ति से सुखी करता है ॥३॥
पदार्थ
(पावक) हे शोधक परमात्मन्! (यः-हविष्मान्) जो मनस्वी उपासक (देववीतये) देवस्थली—मुक्तिप्राप्ति के लिए (अग्निम्-आविवासति) तुझ अग्नि—परमात्मा की समन्तरूप से उपासना करता है (तस्मै मृळय) उसके लिये मुक्ति देता है “मृळतिर्दानकर्मा” [निरु॰ १०.१५]।
भावार्थ
हे पवित्र करनेवाले परमात्मन्! जो मनस्वी उपासक मुक्तिधामप्राप्ति के लिए तेरी उपासना करता है उसके लिए तू अवश्य मुक्ति प्रदान करता है॥३॥
विशेष
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विषय
नैष्कर्म्य सिद्धि
पदार्थ
(यः) = जो भी पुरुष (देववीतये) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (हविष्मान्) = हविर्मय जीवनवाला होकर (अग्निम्) = सबके संचालक प्रभु को (आविवासति) = पूजता है; हे (पावक) = पवित्र करनेवाले प्रभो ! (तस्मै) = उसके लिए (मृडय) = सुख प्राप्त कराइए ।
दिव्य गुणों की प्राप्ति का मार्ग एक ही है कि हम स्वार्थ से ऊपर उठकर हविर्मय जीवनवाले बनकर प्रभु की पूजा करें । वस्तुतः प्रभु की उपासना भी यही है कि हम भौतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर लोकहित में प्रवृत्त हों । सच्चा प्रभुभक्त वही है जो 'सर्वभूतहिते रत: ' है । प्रभु-भक्ति प्रभु की प्रजा का हित-साधन ही है। ‘हविष्मान्' बनने से प्रभु की आराधना होती है, दिव्य गुणों की प्राप्ति होती है, मानव-जीवन पवित्र हो उठता है । इस जीवन-पवित्रता का साधन भी यही हविष्मत्ता है । जीवन के पवित्र होने पर हम प्रभु की कृपा के पात्र बनते हैं और वास्तविक सुखलाभ करते हैं ।
भावार्थ
हम हविष्मान् बनकर कर्म करें, इसी से प्रभु आराधित होंगे, दिव्य गुण प्राप्त होंगे, हमारे जीवन पवित्र होंगे, परिणामतः हमें प्रभुकृपा प्राप्त होगी ।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( यः ) = जो ( हविष्मान् ) = प्रेम भक्ति रूपी हविवाला उपासक पुरुष ( देववीतये ) = अपनी दिव्य गति के लिए ( अग्निम् ) = ज्ञानस्वरूप परमात्मा का ( आविवासति ) = उपासना रूपी पूजन करता है ( तस्मै ) = उसके लिए ( पावक ) = हे अपवित्रों को भी पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! ( मृडय ) = आनन्द दीजिये।
भावार्थ
भावार्थ = हे पावक ! पवित्र स्वरूप, पवित्र करनेवाले परमेश्वर ! जो उपासक पुरुष सत्कर्मों को करता हुआ आपका प्रेमपूर्वक उपासनारूप पूजन करता है ऐस अपने प्यारे उपासक को आप, दिव्यगति मुक्ति देकर सदा आनन्द दीजिए।
विषय
missing
भावार्थ
(यः) जो (हविष्मान्) उत्तम अन्नों और पदार्थों का स्वामी के (देववीतये) विद्वानों या भौतिक दिव्य गुणों और पदार्थों को प्राप्त करने लिये (अग्निं) अग्नि के समान ज्ञानस्वरूप, सर्वप्रकाशक परमात्मा के (आविवासति) उपासना करता है। हे (पावक) सबको पवित्र करनेहारे परमेश्वर ! आप (तस्मै) उसको (मृडय) सुख शान्ति दें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ जमदग्निः। २ भृगुर्वाणिर्जमदग्निर्वा। ३ कविर्भार्गवः। ४ कश्यपः। ५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ७ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ९ सप्तर्षयः। १० पराशरः। ११ पुरुहन्मा। १२ मेध्यातिथिः काण्वः। १३ वसिष्ठः। १४ त्रितः। १५ ययातिर्नाहुषः। १६ पवित्रः। १७ सौभरिः काण्वः। १८ गोषूत्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १९ तिरश्चीः॥ देवता—३,४, ९, १०, १४—१६ पवमानः सोमः। ५, १७ अग्निः। ६ मित्रावरुणौ। ७ मरुत इन्द्रश्च। ८ इन्द्राग्नी। ११–१३, १८, १९ इन्द्रः॥ छन्दः—१–८, १४ गायत्री। ९ बृहती सतोबृहती द्विपदा क्रमेण। १० त्रिष्टुप्। ११, १३ प्रगाथंः। १२ बृहती। १५, १९ अनुष्टुप। १६ जगती। १७ ककुप् सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक् ॥ स्वरः—१—८, १४ षड्जः। ९, ११–१३ मध्यमः। १० धैवतः। १५, १९ गान्धारः। १६ निषादः। १७, १८ ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनस्तमेव विषयमाह।
पदार्थः
प्रथमः—परमात्मपरः। (यः हविष्मान्) आत्मसमर्पणवान् उपासको जनः (देववीतये) दिव्यगुणकर्मणां प्राप्तये (अग्निम्) सर्वसुखप्रापकं परमात्मानं त्वाम् (आविवासति) परिचरति। [विवासतिः परिचरणकर्मा। निघं० ३।५।] (तस्मै) तम् उपासकम्। [अत्र कर्मणि चतुर्थी।] हे (पावक) पवित्रतासम्पादक परमात्मन् ! त्वम् (मृडय सुखय) ॥ द्वितीयः—यज्ञपरः। (यः हविष्मान्) उत्तमानि होतुं योग्यानि द्रव्याणि विद्यन्ते यस्य सः याज्ञिको जनः (देववीतये) तेजःप्राप्तये दिव्यसुखसम्पादनाय वा (अग्निम्) यज्ञवह्निं त्वाम् (आ विवासति) होमेन सत्करोति (तस्मै) तम्, हे (पावक) वायुशुद्धेः हृदयशुद्धेश्च सम्पादक यज्ञवह्ने ! त्वम् (मृडय) आरोग्यादिप्रापणेन सुखय। पावकोऽग्निः सुखयतु इति तात्पर्यम् ॥३॥२ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥३॥
भावार्थः
यथा श्रद्धयाऽऽत्मसमर्पणेनोपासितः परमेश्वरो दिव्यगुणकर्माणि प्रेरयति तथोत्तमोत्तमहव्यद्रव्यैर्हुतो यज्ञवह्निरारोग्यप्रदानेन हृदि तेजःशौर्यादिदिव्यगुणानां समेधनेन च सुखयति ॥३॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १।१२।९। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दस्वामिना मन्त्रोऽयं श्लेषेण परमेश्वरविषये भौतिकाग्निविषये च व्याख्यातः।
इंग्लिश (2)
Meaning
Be gracious, brilliant God ! to him, who for noble conduct of life, would fain worship Thee.
Meaning
Who so ever offers yajna with holy materials in honour and service to Agni for the gifts of the divine, to him, brilliant power, be kind and gracious with blessings. (Rg. 1-12-9)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (पावक) હે શોધક-પવિત્ર કરનાર પરમાત્મન્ ! (यः हविष्मान्) જે મનસ્વી ઉપાસક (देववीतये) દેવસ્થલી-મુક્તિ પ્રાપ્તિને માટે (अग्निम् आविवासति) તારી-અગ્નિ પરમાત્માની સમગ્રરૂપથી ઉપાસના કરે છે. (तस्मै मृळय) તેને માટે પ્રદાન કરે છે. (૩)
भावार्थ
ભાવાર્થ : હે પવિત્ર કરનાર પરમાત્મન્ ! જે મનસ્વી ઉપાસક મુક્તિધામ પ્રાપ્તિને માટે તારી ઉપાસના કરે છે, તેને માટે તું અવશ્ય મુક્તિ પ્રદાન કરે છે. (૩)
बंगाली (1)
পদার্থ
যো অগ্নিং দেব বীতয়ে হবিষ্মাঁ আবিবাসতি।
তস্মৈ পাবক মৃডয়।।৭৮।।
(সাম ৮৪৬)
পদার্থঃ (যঃ) যে (হবিষ্মাঁ) প্রেমভক্তিরূপী হব্য সম্পন্ন উপাসক (দেব বীতয়ে) নিজের দিব্য গতির জন্য (অগ্নিম্) জ্ঞান স্বরূপ পরমাত্মাকে (আবিবাসতি) উপাসনারূপ পূজা করেন, (তস্মৈ) সেই উপাসককে (পাবক) পবিত্রকারী পরমাত্মা (মৃডয়) আনন্দ দান করেন।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে পতিত পাবন! পবিত্র স্বরূপ, পবিত্রকারী পরমেশ্বর! যে উপাসক সৎকর্ম করে তোমার প্রেমপূর্বক উপাসনারূপ পূজা করে, এমন নিজের প্রিয় উপাসককে তুমি দিব্যগতি মুক্তি দিয়ে সদা আনন্দ প্রদান করো।।৭৮।।
मराठी (1)
भावार्थ
जसे श्रद्धेने आत्मसमर्पणपूर्वक उपासना केला गेलेला परमेश्वर दिव्य गुण-कर्मांना प्रेरित करतो, तसेच उत्तमोत्तम हव्य द्रव्यांनी होम केलेला यज्ञाग्नी आरोग्य प्रदान करतो व हृदयात तेज, शूरता इत्यादी दिव्य गुणांच्या प्रदीप्तीने सुखी करतो. ॥३॥
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