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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 851
ऋषिः - मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः
देवता - मरुतः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
36
आ꣡दह꣢꣯ स्व꣣धा꣢꣫मनु꣣ पु꣡न꣢र्गर्भ꣣त्व꣡मे꣢रि꣣रे꣢ । द꣡धा꣢ना꣣ ना꣡म꣢ य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢त् । अ꣡ह꣢꣯ । स्व꣣धा꣢म् । स्व꣣ । धा꣢म् । अ꣡नु꣢꣯ । पु꣡नः꣢꣯ । ग꣣र्भत्व꣢म् । ए꣣रिरे꣢ । आ꣣ । इरिरे꣢ । द꣡धा꣢꣯नाः । ना꣡म꣢꣯ । य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥
स्वर रहित मन्त्र
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ॥८५१॥
स्वर रहित पद पाठ
आत् । अह । स्वधाम् । स्व । धाम् । अनु । पुनः । गर्भत्वम् । एरिरे । आ । इरिरे । दधानाः । नाम । यज्ञियम् ॥८५१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 851
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में जीवात्मा के पुनर्जन्म का विषय है।
पदार्थ
(आत् अह) देहत्याग के अनन्तर सूक्ष्म शरीर में समाविष्ट ये प्राण पूर्वजन्मकृत कर्मों के संस्कारों के अनुसार (स्वधाम् अनु) भोग को लक्ष्य करके, जीवात्मासहित (यज्ञियम्) देहयज्ञ के सञ्चालन-योग्य (नाम) कर्म को (दधानाः) धारण करते हुए (पुनः) पूर्वजन्म के समान फिर भी (गर्भत्वम्) माता के गर्भ में स्थिति को (एरिरे) प्राप्त करते हैं ॥२॥
भावार्थ
पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्मभूत, मन और बुद्धि यह सत्रह लिङ्गोंवाला सूक्ष्मशरीर जीवात्मा के साथ मृत्यु के बाद भी रहता है। पूर्वजन्म के कर्मों के संस्कारानुसार फल भोगने के लिए सूक्ष्मशरीर के साथ जीवात्मा पुनर्जन्म ग्रहण करने के लिए माता के गर्भ में प्रवेश करता है ॥२॥
पदार्थ
(आत्-अह) बस, अन्तर—परमात्मसदृश गुण प्राप्त कर मुक्त गण (स्वधाम्-अनु) अपनी धृति—स्थिति के अनुसार (पुनः-गर्भत्वम्-एरिरे) पुनः परमात्मा के गर्भभाव को प्राप्त हो जाते हैं उसके अन्दर विराजमान हो जाते हैं (यज्ञियं नाम दधानाः) सङ्गमनीय आत्मसमर्पण नम्रभाव को धारण करते हुए।
भावार्थ
उपासना से उपासकजन उपास्य परमात्मा के गुण धारण कर अपने धृति स्थिति—स्व ज्ञान गति के अनुसार परमात्मा के अन्दर पुनः प्राप्ति अनुभव करते हैं जैसे संसार में आने से पूर्व मोक्ष में रहते थे सङ्गमनीय आत्मसमर्पणरूप नम्रीभाव को धारण करते हुए॥२॥
विशेष
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विषय
पुनर्गर्भत्व से ऊपर, चक्र से मुक्ति
पदार्थ
गत मन्त्र में प्रभु से मेल करने की भावना थी । यह मेल ही स्व-आत्मा का, धा=धारण है, इसी का नाम प्रस्तुत मन्त्र में 'स्वधा' है । (आत्-स्वधाम् + अनु) = आत्म-धारण के एकदम पश्चात् (अह) = निश्चय से (यज्ञियम्) = उपासना के योग्य (नाम) = उस प्रभु के नाम को (दधानः) = धारण करते हुए ये ‘मधुच्छन्दा वैश्वामित्र' (पुनर्गर्भत्वम्) = दुबारा जन्म में आने की स्थिति को (एरिरे) = अपने से कम्पित कर दूर कर देते हैं ।
मनुष्य को प्रयत्न करके प्रभु को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए। तत्पश्चात् सदा उसके उपास्य नामों का स्मरण करते रहना चाहिए, जिससे एक बार बनी हुई वह प्रभु के धारण की स्थिति नष्ट न हो जाए।
जन्म-मरण के चक्र से छूटने का क्रम यह है कि मनुष्य अपने में ‘स्व'=‘आत्मा' का धारण करे, इसके लिए योग-मार्ग पर चलता हुआ साधना को परिपक्व करे । जब एक बार वह 'स्व' को धारण करने में समर्थ हो जाए तब वह सदा प्रभु के यज्ञिय नामों का स्मरण करनेवाला बने । सदा तद्भावभावित रहेगा तो अन्त में भी प्रभु का स्मरण करेगा और प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनेगा। दूसरे शब्दों में 'पुनर्जन्म' से ऊपर उठ जाएगा।
भावार्थ
हम प्रभु को अपने में धारण करें, प्रभु के नाम का स्मरण करें, जिससे जन्ममरणचक्र से मुक्त हो सकें ।
विषय
missing
भावार्थ
मरुत् गण, इन्द्रियां या दशों प्राण (स्वधाम् अनु) अपने स्वरूप,या देह को स्वयं धारण करने में समर्थ जीवात्मा के साथ (आत्) बाद में (पुनः) फिर (गर्भत्वम्) गर्भरूप से (एरिरे) प्रकट होते हैं और (यज्ञियं) जीवनरूप यज्ञ के योग्य (नाम) संज्ञा को (दधानाः) धारण करते हैं। आधिदैविक पक्ष में—स्वधा=जल के साथ वायुएं आकाश में गर्भित होकर यज्ञ के योग्य जलवर्षा कराते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ जमदग्निः। २ भृगुर्वाणिर्जमदग्निर्वा। ३ कविर्भार्गवः। ४ कश्यपः। ५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ७ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ९ सप्तर्षयः। १० पराशरः। ११ पुरुहन्मा। १२ मेध्यातिथिः काण्वः। १३ वसिष्ठः। १४ त्रितः। १५ ययातिर्नाहुषः। १६ पवित्रः। १७ सौभरिः काण्वः। १८ गोषूत्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १९ तिरश्चीः॥ देवता—३,४, ९, १०, १४—१६ पवमानः सोमः। ५, १७ अग्निः। ६ मित्रावरुणौ। ७ मरुत इन्द्रश्च। ८ इन्द्राग्नी। ११–१३, १८, १९ इन्द्रः॥ छन्दः—१–८, १४ गायत्री। ९ बृहती सतोबृहती द्विपदा क्रमेण। १० त्रिष्टुप्। ११, १३ प्रगाथंः। १२ बृहती। १५, १९ अनुष्टुप। १६ जगती। १७ ककुप् सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक् ॥ स्वरः—१—८, १४ षड्जः। ९, ११–१३ मध्यमः। १० धैवतः। १५, १९ गान्धारः। १६ निषादः। १७, १८ ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ जीवात्मनः पुनर्जन्मविषयमाह।
पदार्थः
(आत् अह) देहत्यागानन्तरं खलु, सूक्ष्मशरीरसमाविष्टा एते मरुतः प्राणाः पूर्वजन्मकृतकर्मसंस्कारानुसारम् (स्वधाम् अनु) भोगम् अनुलक्ष्य, इन्द्रेण जीवात्मना सहचारिताः (यज्ञियम्) देहयज्ञसंचालनार्हम्। [यज्ञमर्हति इति यज्ञियः, ‘यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ। अ० ५।१।७१’ इति घः प्रत्ययः।] (नाम) कर्म (दधानाः) धारयन्तः (पुनः) पुर्वजन्मवत् भूयोऽपि (गर्भत्वम्) मातुर्गर्भे स्थितिम् (एरिरे) प्राप्नुवन्ति। [आङ्पूर्वः ईर गतौ कम्पने च अदादिः, लिटि रूपम्] ॥२॥२
भावार्थः
पञ्च प्राणाः, पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि, पञ्च सूक्ष्मभूतानि, मनो बुद्धिश्चेति सप्तदशलिङ्गकं सूक्ष्मशरीरं जीवात्मना सह मृत्योरनन्तरमपि तिष्ठति। पूर्वजन्मकर्मसंस्कारानुसारेण फलानि भोक्तुं सूक्ष्मशरीरेण सह जीवात्मा पुनर्जन्म ग्रहीतुं मातुर्गर्भं प्रविशति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १।६।४, अथ० २०।४०।३, ६९।१२ सर्वत्र देवताः मरुतः।
इंग्लिश (2)
Meaning
The soul, roaming in the atmosphere, and after enjoying the bliss of salvation, assuming its sacrificial nature, takes birth again through air.
Translator Comment
This verse preaches, that the soul after relinquishing its body, roams in the atmosphere, before it attains to salvation. After enjoying the bliss of final beatitude, it returns and through air, water or food is reborn. Salvation is not eternal, it is for a limited, though long period. As soul it finite, the result of its efforts cannot be infinite; hence soul returns after enjoying the bliss of salvation, and is reborn. This is Vedic doctrine.
Meaning
Bearing the sacred vapours of yajna as is their wont and nature, the winds rise to the sky, hold the clouds in their womb, and after the rain carry on the cycle with the sun-rays and yajna-fire. (Rg. 1-6-4)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (आत् अह) બસ, અન્તર પરમાત્મા સમાન ગુણ પ્રાપ્ત કરીને મુક્તગણ (स्वधाम् अनु) પોતાની ધૃતિ-સ્થિતિ અનુસાર (पुनः गर्भत्वम् एरिरे) પુનઃ પરમાત્માના ગર્ભભાવને પ્રાપ્ત થઈ જાય છે તેની અંદર વિરાજમાન થાય છે. (यज्ञियं नाम दधानाः) સંગમનીય આત્મસમર્પણ નમ્ર ભાવને ધારણ કરતાં. (૨)
भावार्थ
ભાવાર્થ : ઉપાસનાથી ઉપાસકજન ઉપાસ્ય પરમાત્માના ગુણ ધારણ કરીને, પોતાની ધૃતિ સ્થિતિસ્વજ્ઞાન ગતિને અનુસાર પરમાત્માની અંદર પુનઃ પ્રાપ્તિ અનુભવ કરે છે; જેમ સંસારમાં આવવા પૂર્વે મોક્ષમાં રહેતો હતો સંગમનીય આત્મસમર્પણરૂપ નમ્ર ભાવને ધારણ કરતા રહેતો હતો. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
पाच प्राण, पाच ज्ञानेंद्रिये, पाच सूक्ष्म भूत, मन व बुद्धी हे सतरा लिंगयुक्त सूक्ष्मशरीर, जीवात्माबरोबर मृत्यूनंतरही राहते. पूर्वजन्मीच्या कर्मांच्या संस्कारानुसार फळ भोगण्यासाठी सूक्ष्म शरीराबरोबर जीवात्मा पुनर्जन्म प्राप्त करण्यासाठी मातेच्या गर्भात प्रवेश करतो. ॥२॥
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