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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 918
    ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    29

    मा꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ नो न꣣रे꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ मा꣡भिश꣢꣯स्तये । मा꣡ नो꣢ रीरधतं नि꣣दे꣢ ॥९१८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । पा꣣पत्वा꣡य꣢ । नः꣣ । नरा । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । मा । अ꣣भि꣡श꣢स्तये । अ꣣भि꣢ । श꣣स्तये । मा꣢ । नः꣣ । रीरधतम् । निदे꣢ ॥९१८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये । मा नो रीरधतं निदे ॥९१८॥


    स्वर रहित पद पाठ

    मा । पापत्वाय । नः । नरा । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । मा । अभिशस्तये । अभि । शस्तये । मा । नः । रीरधतम् । निदे ॥९१८॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 918
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे आत्मा और मन से प्रार्थना करते हैं।

    पदार्थ

    हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (नरा) नेतृत्व करनेवाले तुम दोनों (मा) न तो (पापत्वाय) पाप कर्म के, (मा) न (अभिशस्तये) हिंसा के और (मा) न ही (नः) हमें (निदे) निन्दक के (रीरधतम्) वश में करो ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिए कि आत्मा और मन को उद्बोधन देकर पाप, हिंसा, निन्दा आदि से मुक्ति पायें ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर के स्वरूप, परमेश्वर-स्तुति, परमात्म-प्राप्ति, आत्मा-मन तथा प्रसङ्गतः राजा और प्रधानमन्त्री का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ पञ्चम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥

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    पदार्थ

    (इन्द्राग्नी नरा) हे ऐश्वर्यवन् ज्ञानप्रकाशवन् परमात्मन्! मेरे जीवननेता! (नः) हमें (पापत्वाय मा रीरधतम्) मानस पाप के लिए पापवश न करें*64 (अभिशस्तये मा) हिंसा करने के लिए शारीरिक पाप के वश न कर (नः-मा निदे) हमें निन्दा के लिए वाणी विषयक पापवश न करना॥३॥

    टिप्पणी

    [*64. “रध्यतिर्वशगमने” [निरु॰ ६.३२]।]

    विशेष

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    विषय

    पाप, हिंसा व निन्दा से ऊपर

    पदार्थ

    हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश की देवताओ ! (नरा) = आप दोनों ही मुझे इस जीवन-पथ पर आगे ले-चलनेवाले हो और (न:) = हमें (पापत्वाय) = किसी पाप कर्म के लिए (मा) = मत (रीरधतम्) = वश में करो। हम पाप करने के लिए विवश न हो जाएँ । २. (अभिशस्तये) = हिंसा के लिए अथवा दोषारोपण के लिए (मा) = मत वशीभूत करो। हम किसी की हिंसा न करें—किसी पर व्यर्थ दोषारोपण न करें। ३. (नः) = हमें (निदे) = निन्दा के लिए, घृणा के लिए, उपहास के लिए [censure, despise, mock] (मा) = मत वश में करो ।

    वस्तुतः बल और ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति–‘ब्रह्म और क्षत्र' के विकासवाला व्यक्ति करता है, न हिंसा, न निन्दा ! इन बातों की ओर उसका झुकाव नहीं रहता।

    भावार्थ

    मैं ब्रह्म व क्षत्र का विकास करके पाप, हिंसा व निन्दा से ऊपर उठूँ ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (नरा) नेताओ ! (इन्द्राग्नी) गुरु, शिष्य ! या अध्यापक उपदेशक ! या परमेश्वर और आचार्य ! सूर्य और अग्नि के समान ब्रह्म और जीव ! आप दोनों (नः) हमें (पापत्वाय) पापकार्य के लिये और (अभिशस्तये) पराधीनता या हिंसा कार्य के लिये और (निदे) निन्दाजनक कार्य, या निन्दा करने के लिये (मा रीरधतं) कभी किसी के वश में न होने दें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ आकृष्टामाषाः। २ अमहीयुः। ३ मेध्यातिथिः। ४, १२ बृहन्मतिः। ५ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ६ सुतंभर आत्रेयः। ७ गृत्समदः। ८, २१ गोतमो राहूगणः। ९, १३ वसिष्ठः। १० दृढच्युत आगस्त्यः। ११ सप्तर्षयः। १४ रेभः काश्यपः। १५ पुरुहन्मा। १६ असितः काश्यपो देवलो वा। १७ शक्तिरुरुश्च क्रमेण। १८ अग्निः। १९ प्रतर्दनो दैवोदासिः। २० प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः, अथर्वाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः स्तौ तयोर्वान्यतरः। देवता—१—५, १०–१२, १६-१९ पवमानः सोमः। ६, २० अग्निः। ७ मित्रावरुणो। ८, १३-१५, २१ इन्द्रः। ९ इन्द्राग्नी ॥ छन्द:—१,६, जगती। २–५, ७–१०, १२, १६, २० गायत्री। ११ बृहती सतोबृहती च क्रमेण। १३ विराट्। १४ अतिजगती। १५ प्रागाधं। १७ ककुप् च सतोबृहती च क्रमेण। १८ उष्णिक्। १९ त्रिष्टुप्। २१ अनुष्टुप्। स्वरः—१,६, १४ निषादः। २—५, ७—१०, १२, १६, २० षड्जः। ११, १३, १५, १७ मध्यमः। १८ ऋषभः। १९ धैवतः। २१ गान्धारः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथात्ममनसी प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे (इन्द्राग्नी) आत्ममनसी ! (नरा) नरौ नेतारौ युवाम् (मा) नैव (पापत्वाय) पापकर्मणे, (मा) नैव (अभिशस्तये) हिंसायै, (मा) नैव च (नः) अस्मान् (निदे) निन्दकाय (रीरधतम्) वशे कुरुतम्। [रध हिंसासंराध्योः, दिवादिः, ण्यन्ताल्लुङि रूपम्। ‘बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि’ इत्यडभावः] ॥३॥

    भावार्थः

    आत्ममनसी उद्बोध्य मनुष्यैः पापहिंसानिन्दादिभ्यो मुक्तिः प्राप्तव्या ॥३॥ अस्मिन् खण्डे परमेश्वरस्वरूपस्य, परमेश्वरस्तुतेः, परमात्मप्राप्तेः, आत्ममनसोः, प्रसङ्गतश्च नृपतिप्रधानमन्त्रिणो विषयवर्णना- देतत्खण्डस्य पूर्वखण्डेन संगतिर्वेद्या ॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ७।९४।३।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Preacher and Teacher, the leaders of humanity, induce us not to sin, violence and slander !

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    Meaning

    Indragni, leaders of humanity, pioneers of progress and enlightenment, deliver us not to the sinner, not to the tyrant, not to the reviler. Let us be free. (Rg. 7-94-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्द्राग्नी नरा) હે ઐશ્વર્યવાન જ્ઞાનપ્રકાશવાન પરમાત્મન્ ! મારા જીવનનેતા ! (नः) અમને (पापत्वाय मा रीरधतम्) માનસ પાપને માટે પાપવશ ન કર, (आभिशस्तये मा) હિંસા કરવાને માટે શારીરિક પાપને વશ ન કર, (नः मा निदे) અમને નિંદાને માટે વાણી વિષયક પાપ વશ ન થવા દે-ન કર. (૩)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी आत्मा व मनाला उद्बोधन करून पाप, हिंसा, निंदा इत्यादीपासून मुक्त व्हावे. ॥३॥

    टिप्पणी

    या खंडात परमेश्वराचे स्वरूप परमेश्वर स्तुती परमात्म प्राप्ती, आत्मा-मन व प्रसंगत: राजा व प्रधानमंत्री यांचा विषय वर्णित असल्यामुळे या खंडाची पूर्व खंडाबरोबर संगती जाणली पाहिजे

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