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यजुर्वेद अध्याय - 1

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  • यजुर्वेद - अध्याय 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - स्वराट्बृहती,ब्राह्मी उष्णिक्, स्वरः - ऋषभः
    519

    इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु॒ श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्न्या॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गं प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽअ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्ते॒नऽई॑शत॒ माघश॑ꣳसो ध्रु॒वाऽअ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मानस्य प॒शून् पा॑हि॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒षे। त्वा॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। वा॒यवः॑। स्थ॒। दे॒वः। वः॒। स॒वि॒ता। प्र। अ॒र्प॒य॒तु॒। श्रे॑ष्ठतमा॒येति॒ श्रे॑ष्ठऽतमाय। कर्म्म॑णे। आ। प्या॒य॒ध्व॒म्। अ॒घ्न्याः॒। इन्द्रा॑य। भा॒गं। प्र॒जाव॑ती॒रिति॑। प्र॒जाऽव॑तीः। अ॒न॒मी॒वाः। अ॒य॒क्ष्माः। मा। वः॒। स्ते॒नः। ई॒श॒त॒। मा अ॒घश॑ꣳसः॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः। ध्रुवाः। अस्मिन्। गोप॑ता॒विति॒ गोऽप॑तौ। स्या॒त॒। ब॒ह्वीः। यज॑मानस्य। प॒शून्। पा॒हि॒ ॥१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागम्प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा व स्तेनऽईशत माघशँसो धु्रवाऽअस्मिन्गोपतौ स्यात बह्वीः यजमानस्य पशून्पाहि ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इषे। त्वा। ऊर्ज्जे। त्वा। वायवः। स्थ। देवः। वः। सविता। प्र। अर्पयतु। श्रेष्ठतमायेति श्रेष्ठऽतमाय। कर्म्मणे। आ। प्यायध्वम्। अघ्न्याः। इन्द्राय। भागं। प्रजावतीरिति। प्रजाऽवतीः। अनमीवाः। अयक्ष्माः। मा। वः। स्तेनः। ईशत। मा अघशꣳसः इत्यघऽशꣳसः। ध्रुवाः। अस्मिन्। गोपताविति गोऽपतौ। स्यात। बह्वीः। यजमानस्य। पशून्। पाहि॥१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 1; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    हे मनुष्य लोगो! जो (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति करने वाला सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (देवः) सब सुखों के देने और सब विद्या के प्रसिद्ध करने वाला परमात्मा है, सो (वः) तुम हम और अपने मित्रों के जो (वायवः) सब क्रियाओं के सिद्ध करानेहारे स्पर्श गुणवाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियां (स्थ) हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्युत्तम (कर्मणे) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिये (प्रार्पयतु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे। हम लोग (इषे) अन्न आदि उत्तम-उत्तम पदार्थों और विज्ञान की इच्छा और (ऊर्जे) पराक्रम अर्थात् उत्तम रस की प्राप्ति के लिये (भागम्) सेवा करने योग्य धन और ज्ञान के भरे हुए (त्वा) उक्त गुणवाले और (त्वा) श्रेष्ठ पराक्रमादि गुणों के देने हारे आपका सब प्रकार से आश्रय करते हैं। हे मित्र लोगो! तुम भी ऐसे होकर (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त हो तथा हम भी हों। हे भगवन् जगदीश्वर! हम लोगों के (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये (प्रजावतीः) जिनके बहुत सन्तान हैं तथा जो (अनमीवाः) व्याधि और (अयक्ष्माः) जिनमें राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं हैं, वे (अघ्न्याः) जो-जो गौ आदि पशु वा उन्नति करने योग्य हैं, जो कभी हिंसा करने योग्य नहीं, जो इन्द्रियां वा पृथिवी आदि लोक हैं, उन को सदैव (प्रार्पयतु) नियत कीजिये। हे जगदीश्वर! आपकी कृपा से हम लोगों में से दुःख देने के लिये कोई (अघशंसः) पापी वा (स्तेनः) चोर डाकू (मा ईशत) मत उत्पन्न हो तथा आप इस (यजमानस्य) परमेश्वर और सर्वोपकार धर्म के सेवन करने वाले मनुष्य के (पशून्) गौ, घोड़े और हाथी आदि तथा लक्ष्मी और प्रजा की (पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये, जिससे इन पदार्थों के हरने को पूर्वोक्त कोई दुष्ट मनुष्य समर्थ (मा) न हो, (अस्मिन्) इस धार्मिक (गोपतौ) पृथिवी आदि पदार्थों की रक्षा चाहने वाले सज्जन मनुष्य के समीप (बह्वीः) बहुत से उक्त पदार्थ (ध्रुवाः) निश्चल सुख के हेतु (स्यात) हों। इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ-ब्राह्मण में की है, उसका ठिकाना पूर्व संस्कृत-भाष्य में लिख दिया और आगे भी ऐसा ही ठिकाना लिखा जायगा, जिसको देखना हो वह उस ठिकाने से देख लेवे॥१॥

    भावार्थ - विद्वान् मनुष्यों को सदैव परमेश्वर और धर्मयुक्त पुरुषार्थ के आश्रय से ऋग्वेद को पढ़ के गुण और गुणी को ठीक-ठीक जानकर सब पदार्थों के सम्प्रयोग से पुरुषार्थ की सिद्धि के लिये अत्युत्तम क्रियाओं से युक्त होना चाहिये कि जिससे परमेश्वर की कृपापूर्वक सब मनुष्यों को सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि हो। सब लोगों को चाहिये कि अच्छे-अच्छे कामों से प्रजा की रक्षा तथा उत्तम-उत्तम गुणों से पुत्रादि की शिक्षा सदैव करें कि जिससे प्रबल रोग, विघ्न और चोरों का अभाव होकर प्रजा और पुत्रादि सब सुखों को प्राप्त हों, यही श्रेष्ठ काम सब सुखों की खान है। हे मनुष्य लोगो! आओ अपने मिलके जिसने इस संसार में आश्चर्यरूप पदार्थ रचे हैं, उस जगदीश्वर के लिये सदैव धन्यवाद देवें। वही परम दयालु ईश्वर अपनी कृपा से उक्त कामों को करते हुए मनुष्यों की सदैव रक्षा करता है॥१॥


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    भाषार्थ -

    हे मनुष्यो ! यह (सविता) सब जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य-सम्पन्न जगदीश्वर (देवः) सब सुखों का दाता, सब विद्याओं का प्रकाशक भगवान् (वायवः स्थ) जो हमारे (वः) और तुम्हारे प्राण, अन्त:करण और इन्द्रियां हैं एवं सब क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु स्पर्श गुण वाले भौतिक प्राणादि हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) जो सबके उपकार के लिए कर्त्तव्य कर्म है उससे (प्रार्पयतु) अच्छे प्रकार संयुक्त करे।

    हम लोग (इषे) अन्न, उत्तम इच्छा तथा विज्ञान की प्राप्ति के लिए सविता देव रूप (त्वा) तुझ विज्ञानस्वरूप परमेश्वर को तथा (ऊर्जे) पराक्रम एवं उत्तम रस की प्राप्ति के लिए (भागम्) सेवनीय, धन और ज्ञान के पात्र (त्वा) अनन्त पराक्रम तथा आनन्द रस से भरपूर सदा आपकी शरण चाहते हैं। हे मनुष्यो! ऐसे होकर तुम (आप्यायघ्वम्) उन्नति को प्राप्त करो और हम उन्नति प्राप्त कर रहे हैं ।

    हे परमेश्वर ! आप कृपा करके हमें (इन्द्राय) परमैश्वर्य की प्राप्ति के लिए और (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) कर्म करने के लिए इन (प्रजावतीः) बहुत प्रजा वाली (अनमीवाः) व्याधिरहित (अयक्ष्माः) यक्ष्मा रोगराज से रहित (अघ्न्याः), बढ़ाने योग्य, अहिंसनीय गौ, इंद्रियाँ, पृथिवी आदि और जो पशु हैं, उनसे सदैव (प्रार्पयतु) संयुक्त कीजिये।

    हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमारे मध्य में कोई (अघशंसः) पाप का प्रशंसक, पापी और (स्तेनः) चोर (मा+ईशत्) कभी उत्पन्न न हो अथवा समर्थ न हो। और–

    आप इस (यजमानस्य) जीव के एवं परमेश्वर और सर्वोपकारक धर्म के उपासक विद्वान् (पशून्) गौ, घोड़े, हाथी आदि लक्ष्मी वा प्रजा की (पाहि) सदा रक्षा कीजिये, क्योंकि (वः) उन गौओं और इन पशुओं को (अघ शंसः) पापी (स्तेनः) चोर (मा+ईशत) हनन करने में समर्थ न हो। जिससे--

     (अस्मिन्) इस (गोपतौ) पृथिवी आदि की रक्षा के इच्छुक धार्मिक मनुष्य एवं गोस्वामी के पास (बह्वीः) बहुत सी गौवें (ध्रुवाः) स्थिर सुखकारक (स्यात) होवें॥ १।१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य सदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ के आश्रयसे, ऋग्वेद के अध्ययन से, गुण और गुणी को जानकर सब पदार्थों के प्रयोग से पुरुषार्थ सिद्धि के लिए अत्युत्तम क्रियाओं से संयुक्त रहें। जिससे--ईश्वर की कृपा से सबके सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि होवे, और शुभ कर्मों से प्रजा की रक्षा और शिक्षा सदा करें। जिससे -- कोई रोग-रूप विघ्न और चोर प्रबल न हो सके।

    और-- प्रजा सब सुखों को प्राप्त हो।

    जिसने यह विचित्र सृष्टि रची है, उस जगदीश्वर का आप सदैव धन्यवाद करें। ऐसा करने से आप की परमदयालु ईश्वर कृपा करके सदा रक्षा करेगा, ऐसा समझो॥ १।१॥

    भाष्यसार -

    १. ईश्वर का स्वरूप-- इस मन्त्र में सब जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य वाला होने से ईश्वर को ‘सविता’ तथा सब सुखों का दाता और सब विद्याओं का प्रकाशक होने से देवकहा गया है।

    २. ईश्वर-प्रार्थना -- हे सविता देव! आप हमारे प्राण, अन्तःकरणा और इन्द्रियों को सबसे श्रेष्ठ यज्ञकर्म में लगाइये। हम लोग अन्न और विज्ञान की प्राप्ति के लिए, बल-पराक्रम की सिद्धि के लिए आपको छोड़कर किसका आश्रय लेवें, क्योंकि आप ही सब प्रकार के ऐश्वर्य के देने वाले हैं। हे परमेश्वर! आपकी कृपा से हमारे गौ आदि पशु, इन्द्रियां तथा पृथिवी आदि के सभी पदार्थ रोग-रहित हों। आपके अनुग्रह से हमारे मध्य में कोई पापी, चोर कभी उत्पन्न न हो, वा समर्थ न हो सके। आप परमेश्वर के पूजक, सर्वोपकारी धर्मात्मा विद्वान् के हाथी-घोड़े आदि पशुओं तथा लक्ष्मी और प्रजा की सदा रक्षा कीजिये। आपकी कृपा से पृथिवी आदि के रक्षक धार्मिक मनुष्य के पास स्थिर सुखकारक गौ आदि पदार्थ सदा रहें॥

    ३. उत्तम कर्म-- सर्वोपकारक, अत्यन्त प्रशंसनीय यज्ञ॥

    अन्यत्र व्याख्यात -

    महर्षि ने ‘इषे त्वोर्जे’ मन्त्र का संस्कार-विधि के स्वस्तिवाचन में उल्लेख किया है (संस्कार०, पृ0-9, द्वि0स0)॥ महर्षि ने गोकरुणानिधिमें इस मन्त्र के एक अंश की व्याख्याइस प्रकार की है :--

    “यजुर्वेद के प्रथम ही मन्त्र में परमात्मा की आज्ञा है कि --‘अघ्न्या यजमानस्य पशून् पाहि’ हे पुरुष! तू इन पशुओं को कभी मत मार और यजमान अर्थात् सब के सुख देने वाले जनों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे और इसीलिए ब्रह्मा से ले के आज-पर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और अब भी समझते हैं और इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में मिलने पर न्यूनही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है, मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है, दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है। इससे यह ठीक है कि-- गो आदि पशुओं के नाश होने से राजा ओर प्रजा का भी नाश हो जाता है। क्योंकि जब पशु न्यून होते हैं तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी घटती होती है (दया0 ल0 ग्र0 संग्रह, पृ0४०५)॥१॥

    विशेष -

    परमेष्ठी प्रजापतिः ।सविता = ईश्वरः। इषे त्वेत्यारभ्य भागपर्य्यन्तस्य स्वराड्बृहतीछन्दः, मध्यमः स्वरः। अग्रे सर्वस्य ब्राह्म्युष्णिक्छन्दः, ऋषभः स्वरः।।


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    अन्वयः - हे मनुष्या अयं सविता देवो भगवान् वायवस्थ यान्यस्माकं वो युष्माकं च प्राणान्तःकरणेन्द्रियाणि सन्ति तानि श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु। वयमिषेऽन्नायोत्तमेच्छायै सवितारं देवं त्वा त्वां तथोर्ज्जे पराक्रमोत्तमरसप्राप्तये भागं भजनीयं त्वा त्वां सततमाश्रयामः; एवं भूत्वा यूयमाप्यायध्वं वयं चाप्यायामहे। हे परमेश्वर! भवान् कृपयाऽस्माकमिन्द्राय परमैश्वर्य्यप्राप्तये श्रेष्ठतमाय कर्मणे चेमाः प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा गाः सदैव प्रार्पयतु। हे परमात्मन्! भवत्कृपयास्माकं मध्ये कश्चिदघशंसः पापी स्तेनश्चोरश्च मेशत कदाचिन्मोत्पद्यताम्। तथा त्वमस्य यजमानस्य जीवस्य पशून् पाहि सततं रक्ष। यतो वः ता गा इमान् पशूंश्चाघशंसः स्तेनो मेशत। हर्तुं समर्थो न भवेद् यतोऽस्मिन् गोपतौ पृथिव्यादिरक्षणमिच्छुकस्य धार्मिकमनुष्यस्य समीपे बह्वीर्बह्व्यो गावो ध्रुवाः स्यात भवेयुः॥१॥

    पदार्थः -
    (इषे) अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये। इषमित्यन्ननामसु पठितम् (निघं॰२.७) इषतीति गतिकर्मसु पठितम् (निघं॰२.१४) अस्माद्धातोः क्विपि कृते पदं सिध्यति (त्वा) विज्ञानस्वरूपं परमेश्वरम् (ऊर्ज्जे) पराक्रमोत्तमरसलाभाय। ‘ऊर्ग्रसः’ (शत॰५.१.२.८) (त्वा) अनन्तपराक्रमानन्दरसघनम् (वायवः) सर्वक्रियाप्राप्तिहेतवः स्पर्शगुणा भौतिकाः प्राणादयः। वायुरिति पदनामसु पठितम् (निघं॰५.४) अनेन प्राप्तिसाधका वायवो गृह्यन्ते। वा गतिगन्धनयोरित्यस्मात् (कृवापा॰ उणा॰१।१) अनेनाप्युक्तार्थो गृह्यते (स्थ) सन्ति। अत्र पुरुषव्यत्ययेन प्रथमपुरुषस्य स्थाने मध्यमपुरुषः (देवः) सर्वेषां सुखानां दाता सर्वविद्याद्योतकः। देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा यो देवः सा देवता (निरु॰७.१५) (वः) युष्माकं (सविता) सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्य्यवान् जगदीश्वरः (प्रार्पयतु) प्रकृष्टतया संयोजयतु (श्रेष्ठतमाय) अतिशयेन प्रशस्तः सोऽतिशयितस्तस्मै यज्ञाय (कर्म्मणे) कर्तुं योग्यत्वेन सर्वोपकारार्थाय (आप्यायध्वम्) आप्यायामहे वा। अत्र पक्षे व्यत्ययः (अघ्न्याः) वर्धयितुमर्हा हन्तुमनर्हा गाव इन्द्रियाणि पृथिव्यादयः पशवश्च। ‘अघ्न्या इति गोनामसु पठितम्’ (निघं॰२।११) (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययोगाय (भागम्) सेवनीयं भागानां धनानां ज्ञानानां वा भाजनम् (प्रजावतीः) भूयस्यः प्रजा वर्त्तन्ते यासु ताः। अत्र भूम्न्यर्थे मतुप् (अनमीवाः) अमीवो व्याधिर्न विद्यते यासु ताः। ‘अम रोगे’ इत्यस्माद् बाहुलकादौणादिक ‘ईवन्’ प्रत्ययः (अयक्ष्माः) न विद्यते यक्ष्मा रोगराजो यासु ताः। यक्ष इत्यस्मात्। अर्त्तिस्तु॰ (उणा॰१।१३८) अनेन ‘मन्’ प्रत्ययः (मा) निषेधार्थे (वः) ताः। अत्र पुरुषव्यत्ययः (स्तेनः) चोरः (ईशत) ईष्टां समर्थो भवतु। अत्र लोडर्थे लङ्। बहुलं छन्दसि [अष्टा॰२.४.७३] इति शपो लुगभावः (मा) निषेधार्थे (अघशꣳसः) योऽघं पापं शंसति सः (ध्रुवाः) निश्चलसुखहेतवः (अस्मिन्) वर्त्तमाने प्रत्यक्षे (गोपतौ) यो गवां पतिः स्वामी तस्मिन् (स्यात) भवेयुः (बह्वीः) बह्वयः अत्र। वा छन्दसि (अष्टा॰६।१।१०६) अनेन पूर्वसवर्णदीर्घादेशः (यजमानस्य) यः परमेश्वरं सर्वोपकारं धर्मं च यजति तस्य विदुषः (पशून्) गोऽश्वहस्त्यादीन् श्रियः प्रजा वा। श्रीर्हि पशवः (शत॰१.६.३.३६) प्रजा वै पशवः (शत॰१.४.६.१७) (पाहि) रक्ष॥ अयं मन्त्रः (शत॰१.५.४.१-८) व्याख्यातः॥१॥

    भावार्थः - मनुष्यैः सदैव धर्म्यं पुरुषार्थमाश्रित्यर्ग्वेदाध्ययनेन गुणगुणिनौ ज्ञात्वा सर्वपदार्थानां संप्रयोगेण पुरुषार्थसिद्धये श्रेष्ठतमाभिः क्रियाभिः संयुक्तैर्भवितव्यम्। यत ईश्वरानुग्रहेण सर्वेषां सुखैश्वर्य्यस्य वृद्धिः स्यात्। तथा सम्यक् क्रियया प्रजाया रक्षणशिक्षणे सदैव कर्त्तव्ये। यतो नैव कश्चिद् रोगाख्यो विघ्नश्चोरश्च प्रबलः कदाचिद् भवेत् प्रजाश्च सर्वाणि सुखानि प्राप्नुयुः। येनेयं विचित्रा सृष्टी रचिता तस्मै जगदीश्वराय सदैव धन्यवादा वाच्याः। एवं कुर्वतो भवतः परमदयालुरीश्वरः कृपया सदैव रक्षयिष्यतीति मन्तव्यम्॥१॥


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    सपदार्थान्वयः -

    हे मनुष्याः ! अयंसविता सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्य्यवान्‌ जगदीश्वरः, देवः=भगवान्‌ सर्वेषां सुखानां दाता, सर्वविद्याद्योतकः, वायव स्थ=यान्यस्माकं वः= युष्माकं चप्राणान्तःकरणेन्द्रियाणि सन्ति तानि (वायवः=सर्वक्रियाप्राप्तिहेतवः स्पर्शगुणा भौतिकाः प्राणादयः) श्रेष्ठतमाय अतिशयेन प्रशस्तः सोऽतिशयितस्तस्मै यज्ञाय कर्मणे कर्तुं योग्यत्वेन सर्वोपकारार्थायप्रार्पयतु प्रकृष्टतया संयोजयतु।

    वयमिषे = अन्नायोत्तमेच्छायैअन्नविज्ञानयोःप्राप्तये सवितारं देवं त्वा=त्वां विज्ञानस्वरूपंपरमेश्वरं तथोर्जे=पराक्रमोत्तमरसप्राप्तये पराक्रमोत्तमरसलाभाय भागम्=भजनीयं सेवनीयंभागानाम्=धनानां ज्ञानानां वा भाजनं त्वा=त्वाम्‌अनन्तपराक्रमानन्दरसघनं सततमाश्रयामः। एवंभूत्वा यूयमाप्यायध्वं वयं चाप्यायामहे।

    हे परमेश्वर ! भवान्‌ कृपयाऽस्माकमिन्द्राय=परमैश्वर्यप्राप्तये परमैश्वर्य्ययोगाय श्रेष्ठतमाय कर्मणेचेमाः प्रजावतीः भूयस्यः प्रजा वर्तन्ते यासु ताः,अनमीवाः अमीवः=-व्याधिर्न विद्यते यासु ताः, अयक्ष्माः न विद्यते यक्ष्मा रोगराजो यासु ताः [अघ्न्याः]=गाः वर्धयितुमर्हा हन्तुमनर्हा गावः, इन्द्रियाणि, पृथिव्यादय:, पशवश्च [एतानि] सदैवप्रार्पयतु।

    हे परमात्मन्‌ ! भवत्कृपयास्माकं मध्ये कश्चिदघशंसः=पापी योऽघं=पापं शंसति सः,स्तेनः=चोरश्च मेशत=कदाचिन्मोत्पद्यतां मेष्टां=मा समर्थो भवतु।तथात्वमस्य यजमानस्य=जीवस्य यः परमेश्वर सर्वोपकारं धर्मं च यजति तस्य विदुषः, पशून्‌गोऽश्वहस्त्यादीन्, श्रियः, प्रजा वा पाहि=सततं रक्षयतो वः=ता गा, इमान् पशूंश्चाघशंसः स्तेनोमेशत=हन्तुं समर्थो न भवेत्‌, यत:--

    अस्मिन् वर्तमाने प्रत्यक्षे गोपतौ=पृथिव्यादिरक्षणमिच्छुकस्य धार्मिक मनुष्यस्य समीपे यो गवांपतिः स्वामी तस्मिन्, बह्वीः=बह्वयो गावो ध्रुवाःनिश्चलसुखहेतवः स्यात=भवेयुः।। १। १।।

    पदार्थः -

    (इषे) अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये। इषमित्यन्ननामसु पठितम्॥ निघं० २।७॥ इषतीति गतिकर्मसु पठितम्॥ निघं० २। १४॥ अस्माद्धातोः क्विपि कृते पदं सिध्यति (त्वा) विज्ञानस्वरूपं परमेश्वरम् (ऊर्ज्जे) पराक्रमोत्तमरसलाभाय। ऊर्ग्रसः॥ श० ५।१।२।८॥ (त्वा) अनन्तपराक्रमानन्दरसघनम् (वायवः) सर्वक्रियाप्राप्तिहेतवः स्पर्शगुणा भौतिकाः प्राणादयः। वायुरिति पदनामसु पठितम्॥ निघं० ५।४॥ अनेन प्राप्तिसाधका वायवो गृह्यन्ते। वा गतिगन्धनयोरित्यस्मात् कृवापा०॥ उ० १।१॥ अनेनाप्युक्तार्थो गृह्यते (स्थ) सन्ति। अत्र पुरुषव्यत्ययेन प्रथमपुरुषस्य स्थाने मध्यमपुरुषः। (देवः) सर्वेषां सुखानां दाता, सर्वविद्याद्योतक:। देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा यो देवः सा देववता॥ निरु॰ ७। १५॥ (वः) युष्माकं (सविता) सर्वजगदुत्पादकः सकलैश्वर्य्यवान् जगदीश्वरः (प्रार्पयतु) प्रकृष्टतया संयोजयतु (श्रेष्ठतमाय) अतिशयेन प्रशस्त: सोऽतिशयितस्तस्मै यज्ञाय (कर्म्मणे) कर्तुं योग्यत्वेन सर्वोपकारार्थाय (आप्यायध्वम्) आप्यायामहे वा। अत्र पक्षे व्यत्ययः (अघ्न्याः) वर्धयितुमर्हा हन्तुमनर्हा गाव इन्द्रियाणि पृथिव्यादयः पशवश्च। अघ्न्या इति गोनामसु पठितम्॥ निघं० २।११॥ (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययोगाय (भागम्) सेवनीयं भागानां धनानां ज्ञानानां वा भाजनम् (प्रजावतीः) भूयस्यः प्रजा वर्त्तन्ते यासु ताः। अत्र भूम्न्यर्थ मतुप् (अनमीवाः) अमीवो व्याधिर्न विद्यते यासु ताः। अम रोगे इत्यस्माद्बाहुलकादौणादिक ईवन् प्रत्ययः (अयक्ष्माः) न विद्यते यक्ष्मा रोगराजो यासु ता:। यक्ष इत्यस्मात्। अर्त्तिस्तु०॥ उ० १।१३८॥ अनेन मन्प्रत्ययः (मा) निषेधार्थे (वः) ताः। अत्र पुरुषव्यत्ययः। (स्तेनः) चोरः (ईशत) ईष्टां समर्थो भवतु। अत्र लोडर्थे लङ्। बहुलं छन्दसीति शपो लुगभावः (मा) निषेधार्थे (अघशसः) योऽघं पापं शंसति सः। (ध्रुवाः) निश्चलसुखहेतवः। (अस्मिन्) वर्तमाने प्रत्यक्षे (गोपतौ) यो गवां पतिः स्वामी तस्मिन् (स्यात) भवेयुः (बह्वीः) बह्वयः। अत्र वा छन्दसि॥ अ०६।१।१०६॥ अनेन पूर्वसवर्णदीर्घादेशः (यजमानस्य) यः परमेश्वरं सर्वोपकारं धर्मं च यजति तस्य विदुषः (पशून्) गोऽश्वहस्त्यादीन् श्रियः प्रजा वा। श्रीर्हि पशवः॥ श० १।६।३।३

    भावार्थः -

    [ ऋग्वेदाध्ययनानन्तरं यजुर्वेदाध्ययन-प्रयोजनमाह--अयं सविता देवः=भगवान्‌ वायवःस्थ, श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु]

    भावार्थः-- मनुष्यै: सदैव धर्म्यं पुरुषार्थमाश्रित्यर्ग्वेदाध्ययनेन गुणगुणिनौ ज्ञात्वा सर्वपदार्थानांसंप्रयोगेण पुरुषार्थसिद्धये श्रेष्ठतमाभिः क्रियाभिःयुक्तैर्भवितव्यम्‌।

    [हे परमेश्वर! भवान्‌ कृपयाऽस्माकमिन्द्राय=परमैश्वर्यप्राप्तये श्रेष्ठतमाय कर्मणे चेमाः

    प्रजावतीरनमीवा [अध्न्या:] गाः सदैव प्रार्पयतु]

    यत ईश्वरानुग्रहेण सर्वेषां सुखैश्वर्यस्य वृद्धि:स्यात्, तथा-सम्यक्‌ क्रियया प्रजाया रक्षणशिक्षण सदैव कर्त्तव्ये।

    [अस्माकं मध्ये कश्चिदघशंसः=पापी स्तेनः=चोरश्च मेशत]

    यतो नैव कश्चिद्; रोगाख्यो विघ्नश्चोरश्च प्रबलःकदाचिद् भवेत्‌।

    [अस्मिन्‌ गोपतौ'....बह्वीः=बह्वयो गावो ध्रुवाः स्यात=भवेयुः]

    प्रजाश्च सर्वाणि सुखानि प्राप्नुयुः।

    [त्वमस्य यजमानस्य = जीवस्य पशून्‌ पाहि]

    येनेयं विचित्रा सृष्टी रचिता तस्मै जगदीश्वरायसदैव धन्यवादा वाच्याः। एवं कुर्वतो भवतः परमदयालुरीश्वरः कृपया सदैव रक्षयिष्यतीति मन्तव्यम्‌॥ १। १॥

    भावार्थ पदार्थः -

    भावार्थ पदार्थ:--कर्मणे = क्रियायै। इन्द्राय = सुखैश्वर्यस्य वृद्धये। ईशत--प्रबलो भवेत्‌।

    विशेषः -

    परमेष्ठीप्रजापतिः। सविताईश्वरः। इषेत्वेत्यारभ्यभागपर्यन्तस्यस्वराड्बृहतोछन्दः, मध्यमःस्वरः। अग्रेसर्वस्यब्राह्म्युष्णिक्छन्दः, ऋषभःस्वरः।।


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    O, Lord, we resort to Thee for the supply of foodstuffs and vigour. May the Creator, the fountain of happiness and knowledge, inspire us for the performance of noblest deeds with our organs. May the cows, which should never be killed, be healthy and strong. For the attainment of prosperity and wealth, may the cows be full of calves, free from consumption and other diseases. May a thief and a sinner be never born amongst us. May the lord of land and cattle be in constant and full possession of these. May Ye protect the cattle, wealth and progeny of the virtuous soul.


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Be vibrant as the winds and thank the Lord Creator, Savita, for the gifts of food and energy, light and life, for the body, mind and soul. Pray that you dedicate yourself to the noblest action, yajna, and play your part in the service of the Lord. Be blest with the best of health and wealth in plenty, cows, healthy, strong and fertile, sacred, not to be killed. No thief to rule over you, no sinner to boss over you ! Growing in power and prosperity, be firm and loyal to this Lord of the Nation and protect the wealth and honour of the yajamana.


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    भावार्थ - विद्वान माणसांनी परमेश्वराच्या आश्रयाने धर्मयुक्त पुरुषार्थ करावा व ऋग्वेदाचा अभ्यास करून गुण व गुणवान यांना योग्यप्रकारे जाणावे. सर्व पदार्थांचा चांगल्याप्रकारे उपयोग करून अत्युत्तम कार्य करावे. जेणेकरून परमेश्वराच्या कृपेने सर्व माणसांचे ऐश्वर्य वाढावे व त्यांना सुख प्राप्त व्हावे. सर्व माणसांनी चांगले कार्य करावे व प्रजेचे रक्षण करावे. भयंकर रोग, संकटे, चोर, डाकू इत्यादी दुष्ट गोष्टी नष्ट व्हाव्यात आणि संतानांना उत्तम गुणांनी शिक्षित करावे. अर्थात् प्रजा, पुत्र इत्यादी सुखी व्हावेत. अशा प्रकारचे श्रेष्ठ कर्म ही सुखाची खाण आहे. हे माणसांनो! ज्या परमेश्वराने या सृष्टीत आश्चर्यकारक पदार्थ निर्माण केलेले आहेत, त्याबद्दल आपण सर्वांनी कृतज्ञ राहिले पाहिजे. वरील चांगले कार्य करताना अत्यंत दयाळू परमेश्वर माणसांचे सदैव रक्षण करतो.


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