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यजुर्वेद अध्याय - 12
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यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 24
ऋषिः - वत्सप्रीर्ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - निचृदार्षी त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
108
उ॒शिक् पा॑व॒को अ॑र॒तिः सु॑मे॒धा मर्त्ये॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। इय॑र्त्ति धू॒मम॑रु॒षं भरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ द्यामिन॑क्षन्॥२४॥
स्वर सहित पद पाठउ॒शिक्। पा॒व॒कः। अ॒र॒तिः। सु॒मे॒धाः इति॑ सुऽमे॒धाः। मर्त्ये॑षु। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। नि। धा॒यि॒। इय॑र्त्ति। धू॒मम्। अ॒रु॒षम्। भरि॑भ्रत्। उत्। शु॒क्रेण॑। शो॒चिषा॑। द्याम्। इन॑क्षन् ॥२४ ॥
स्वर रहित मन्त्र
उशिक्पावकोऽअरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो निधायि । इयर्ति धूममरुषम्भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन् ॥
स्वर रहित पद पाठ
उशिक्। पावकः। अरतिः। सुमेधाः इति सुऽमेधाः। मर्त्येषु। अग्निः। अमृतः। नि। धायि। इयर्त्ति। धूमम्। अरुषम्। भरिभ्रत्। उत्। शुक्रेण। शोचिषा। द्याम्। इनक्षन्॥२४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यूयमीश्वरेण मर्त्येषु य उशिक् पावकोऽरतिः सुमेधाऽमृतोऽग्निर्निधायि, यः शुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन् धूममरुषं भरिभ्रदुदियर्त्ति तमीश्वरमुपाध्वमुपकुरुत वा॥२४॥
पदार्थः
(उशिक्) कामयमानः (पावकः) पवित्रकर्त्ता (अरतिः) ज्ञाता (सुमेधाः) शोभनप्रज्ञः (मर्त्येषु) (अग्निः) कारणाख्यः (अमृतः) अविनाशी (नि) (धायि) निधीयते (इयर्त्ति) प्राप्नोति (धूमम्) (अरुषम्) रूपम् (भरिभ्रत्) अत्यन्तं धरन् पुष्यन् (उत्) (शुक्रेण) आशुकरेण (शोचिषा) दीप्त्या (द्याम्) सूर्यम् (इनक्षन्) व्याप्नुवन्। इनक्षतीति व्याप्तिकर्मसु पठितम्॥ (निघं॰२.१८)॥२४॥
भावार्थः
मनुष्यैरीश्वरसृष्टानां पदार्थानां कारणकार्यपुरस्सरं विज्ञानं कृत्वा प्रज्ञोन्नेया॥२४॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! तुम लोग ईश्वर ने (मर्त्येषु) मनुष्यों में जो (उशिक्) मानने योग्य (पावकः) पवित्र करनेहारा (अरतिः) ज्ञान वाला (सुमेधाः) अच्छी बुद्धि से युक्त (अमृतः) मरणधर्मरहित (अग्निः) आकाररूप ज्ञान का प्रकाश (निधायि) स्थापित किया है, जो (शुक्रेण) शीघ्रकारी (शोचिषा) प्रकाश से (द्याम्) सूर्यलोक को (इनक्षन्) व्याप्त होता हुआ (धूमम्) धुएं (अरुषम्) रूप को (भरिभ्रत्) अत्यन्त धारण वा पुष्ट करता हुआ (उदियर्ति) प्राप्त होता है, उसी ईश्वर की उपासना करो वा उस अग्नि से उपकार लेओ॥२४॥
भावार्थ
मनुष्यों को चाहिये कि कार्य्य-कारण के अनुसार ईश्वर के रचे हुए सब पदार्थों को ठीक-ठीक जान के अपनी बुद्धि बढ़ावें॥२४॥
विषय
उशिक पावकः
पदार्थ
१. यह ( वत्सप्रीः ) = प्रभु का प्यारा ( उशिक् ) = [ वश् ] सबका भला चाहनेवाला होता है, किसी के अमङ्गल की भावना इसमें उत्पन्न नहीं होती। २. ( पावकः ) = यह सभी के जीवन को पवित्र बनाने का प्रयत्न करता है। ३. ( अरतिः ) = विषयों में रति व आसक्तिवाला नहीं होता। ४. ( सुमेधाः ) = उत्तम बुद्धिवाला अथवा उत्तम यज्ञोंवाला [ मेध = यज्ञ ] होता है ५. ( अग्निः ) = यह अग्रेणी—उन्नतिशील व्यक्ति ( मर्त्येषु ) = विषयों के पीछे मरनेवाले लोगों में ( अमृतः ) = विषयों के लिए अत्यन्त उत्सुक न होनेवाले के रूप में ( निधायि ) = रक्खा जाता है। प्रभु ही इस प्रकार के अमृत अग्नि को मर्त्यों में प्राप्त कराया करते हैं। इन्हें ही सामान्य जनता सुधारक के नाम से स्मरण करती है। ६. ( इयर्त्ति ) = यह व्यक्ति बड़ा गतिशील होता है। ७. ( धूमम् ) = वासनाओं को कम्पित करनेवाले ( अरुषम् ) = क्रोध से शून्य ज्ञान को ( भरिभ्रत् ) = निरन्तर धारण करता हुआ यह ( उत् ) = वासनाओं से ऊपर उठा हुआ ( शुक्रेण शोचिषा ) = प्रकाशमय अथवा क्रियायुक्त [ शुक् गतौ ] ज्ञान की दीप्ति से यह ( द्याम् ) = सारे द्युलोक को ( इनक्षन् ) = व्याप्त करता है, अर्थात् यह सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। वस्तुतः लोकहित का इससे अधिक उत्तम मार्ग नहीं है कि ज्ञान को फैलाकर उनके जीवन के मापक को ऊँचा कर दिया जाए। ज्ञान ही मनुष्य को वासनाओं से बचाकर इस योग्य बनाता है कि वह प्रभु के अधिक समीप पहुँच सके।
भावार्थ
भावार्थ — हमें सभी के भले की कामना करनी चाहिए, अतः स्वयं विषयों से ऊपर उठकर ज्ञान का प्रसार करनेवाला होना चाहिए।
विषय
अग्नि के समान राजा का वर्णन ।
भावार्थ
( मर्त्येषु ) मरणधर्मा देहों में ( अमृतः ) अविनाशी, अमृत स्वरूप जिस प्रकार विद्यमान है, उसी प्रकार मनुष्यों के बीच ( उशिक् ) सबका वशयिता, कान्तिमान्, ( पावक: ) सबको पवित्र करने वाला (अरतिः ) अत्यधिक मतिमान्, ( सुमेधाः) उत्तम बुद्धि सम्पन्न, विद्वान्, ( निधायि ) स्थापित किया जाय । (अग्नि ) जिस प्रकार ( अरुषं धूमम् इयर्त्ति ) कान्ति रहित धूम को छोड़ता है उसी प्रकार यह विद्वान् भी ( अरुषम् ) रोषरहित ( धूमम् ) शत्रुओं को अपने पराक्रम से कंपाने वाले वीर्य या बल को ( उत् इयर्त्ति ) उन्नत करता है । समस्त राष्ट्र को ( भरिभ्रत्) भरण पोषण करता हुआ शुक्रे शोचिषा ) अति उज्ज्वल प्रकाश से सूर्य ( द्याम् इनक्षन् ) जिस प्रकार आकाश को व्यापता है उसी प्रकार वह भी उज्ज्वल प्रकाश से ( द्याम् ) तेजस्वी लोकों को या ज्ञानवान् पुरुषों को प्राप्त होता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्निर्देवता । निचृदार्षी त्रिष्टुप् धैवतः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
माणसांनी कार्यकारणानुसार ईश्वराने निर्माण केलेल्या सर्व पदार्थांना यथायोग्यरीत्या जाणावे व आपली बुद्धी वाढवावी.
विषय
मनुष्यांनी काय करावे, याविषयी पुढील मंत्रात उपदेश केला आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, ईश्वराने (मर्त्येषु) मनुष्यांमध्ये (उशिक्) माननीय आणि (पावक:) पवित्र करणारे तसेच (अरति:) ज्ञानमय (सुमेधा:) उत्तम बुद्धीद्वारे ग्राह्य वा ग्रहणीय, तसेच (अमृत:) मरणधर्मरहित अविनाशी (अग्नि:) आका ज्ञान (निधायि) स्थापित केले आहे (परमेश्वराने मानवांना जे ज्ञानरुप जे पवित्र साधन दिले आहे) आणि जो ज्ञानाग्नी (शुक्रेण) शीघ्रकारी (शोचिषा) प्रकाशाद्वारे (घाम्) सूर्यलोकात (इनक्षमन्) व्याप्त होत होत (धूमन्) धुराचे (अरुषम्) रुप (भरिभ्रत्) धारण करीत (उदियर्ति) मनुष्यांना प्राप्त होतो (ज्ञानत्वरित गतिशील असून ते सूर्य, अंतरिक्ष आदीपर्यंत जाते, तसेच पृथ्वीवरील पदार्थांची जाणीव मनुष्यांना देते. धूर हे अग्नीचे लक्षण आहे - जेथे धूर तेथे अग्नी अवश्य आहे वा असायला पाहिजे. तद्वत रुपधारी पदार्थांच्या ज्ञानाच्या रुपाने अमूर्त ज्ञानाचे म्हणजे ज्ञानशक्तीचे अस्तित्व जाणवते) हे मनुष्यांनो तुम्ही अशा अग्नीचा जो निर्माता परमेश्वर त्याची उपासना करा अथवा त्या ज्ञानाग्नीपासून यथोचित लाभ घ्या ॥24॥
भावार्थ
भावार्थ - मनुष्यांनी जाणावे की ईश्वर सर्व सृष्टीचे कारण असून जगत व त्यातील पदार्थ कार्य आहेत. हे जाणून त्यांनी सर्व पदार्थांचे (विशेष अध्ययन, अभ्यास, निरीक्षण, शोध आदीद्वारे) करून आपली बुद्धी विकसित करावी ॥24॥
इंग्लिश (3)
Meaning
God has established among mortals, knowledge, which is acceptable, purifier, knowable, wise and immortal. The same knowledge, with its active brilliance, pervading the universe, and sustaining the world, dispels darkness devoid of light.
Meaning
Immortal agni, lovely and lovable, pure and purifier, intelligent and self-conscious, a holy presence, is existent in men and women. The same throws up the fiery smoke upward and with instantaneous light illuminates the sun and heaven.
Translation
That beautiful, purifying, unfriendly to sinners, full of wisdom and immortal fire divine has been established within the mortals. Sustaining the whole universe, he throws up irritating smoke while he fills the sky with pure brilliance. (1)
बंगाली (1)
विषय
পুনর্মনুষ্যৈঃ কিং কর্ত্তব্যমিত্যাহ ॥
মনুষ্যদিগকে কী করা উচিত সেই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! ঈশ্বর (মর্ত্যেষু) মনুষ্যদিগের মধ্যে (উশিক্) মানিবার যোগ্য (পাবকঃ) পবিত্রকারী (অরতিঃ) জ্ঞানযুক্ত (সুমেধাঃ) সুবুদ্ধিসম্পন্ন (অমৃতঃ) মরণ ধর্মরহিত (অগ্নিঃ) আকাররূপ জ্ঞানের প্রকাশ (নিধায়ি) স্থাপিত করিয়াছেন যাহা (শুক্রেণ) শীঘ্রকারী (শোচিষা) প্রকাশ দ্বারা (দ্যাম্) সূর্য্যলোককে (ইনক্ষন্) ব্যাপ্ত হইয়া (ধূমম্) ধূম্র (অরুষম্) রূপকে (ভরিভ্রৎ) অত্যন্ত ধারণ বা পুষ্ট করিয়া (উদিয়র্ত্তি) প্রাপ্ত হয় । সেই ঈশ্বরের উপাসনা কর অথবা সেই অগ্নি হইতে উপকার গ্রহণ কর ॥ ২৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগের উচিত যে, কার্য্য-কারণ অনুযায়ী ঈশ্বররচিত সব পদার্থকে সম্যক জানিয়া স্বীয় বুদ্ধি বৃদ্ধি কর ॥ ২৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
উ॒শিক্ পা॑ব॒কো অ॑র॒তিঃ সু॑মে॒ধা মর্ত্যে॑ষ্ব॒গ্নির॒মৃতো॒ নি ধা॑য়ি ।
ইয়॑র্ত্তি ধূ॒মম॑রু॒ষং ভরি॑ভ্র॒দুচ্ছু॒ক্রেণ॑ শো॒চিষা॒ দ্যামিন॑ক্ষন্ ॥ ২৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
উশিগিত্যস্য বৎসপ্রীর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । নিচৃদার্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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