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यजुर्वेद अध्याय - 12

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  • यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 33
    ऋषिः - वत्सप्रीर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - निचृदार्षी त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    127

    अक्र॑न्दद॒ग्नि स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद् वी॒रुधः॑ सम॒ञ्जन्। सद्यो॒ ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धोऽअख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः॥३३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अक्र॑न्दत्। अ॒ग्निः। स्त॒नय॑न्नि॒वेति॑ स्त॒नय॑न्ऽइव। द्यौः। क्षामा॑। रेरि॑हत्। वी॒रुधः॑। स॒म॒ञ्जन्निति॑ सम्ऽअ॒ञ्जन्। स॒द्यः ज॒ज्ञा॒नः। वि। हि। ई॒म्। इ॒द्धः। अख्य॑त्। आ। रोद॑सीऽइति॒ रोद॑सी। भा॒नुना॑। भा॒ति॒। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥३३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अक्रन्ददग्नि स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन् । सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धोऽअख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अक्रन्दत्। अग्निः। स्तनयन्निवेति स्तनयन्ऽइव। द्यौः। क्षामा। रेरिहत्। वीरुधः। समञ्जन्निति सम्ऽअञ्जन्। सद्यः जज्ञानः। वि। हि। ईम्। इद्धः। अख्यत्। आ। रोदसीऽइति रोदसी। भानुना। भाति। अन्तरित्यन्तः॥३३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 12; मन्त्र » 33
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    राज्यप्रबन्धः कथं कार्य्य इत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे प्रजाजनाः! युष्माभिर्यथा द्यौरग्निः स्तनयन्निवाक्रन्दद्, वीरुधः समञ्जन् क्षामा रेरहित् जज्ञान इद्धः सद्यो व्यख्यत् भानुना हि रोदसी अन्तराभाति, तथा स राजा भवितुं योग्योऽस्तीति वेद्यम्॥३३॥

    पदार्थः

    (अक्रन्दत्) विजानाति (अग्निः) शत्रुदाहको विद्वान् (स्तनयन्निव) विद्युद्वद् गर्जयन् (द्यौः) विद्यान्यायप्रकाशकः (क्षामा) भूमिम् (रेरिहत्) भृशं युध्यस्व (वीरुधः) वनस्थान् वृक्षान् (समञ्जन्) सम्यक् रक्षन् (सद्यः) तूर्णम् (जज्ञानः) राजनीत्या प्रादुर्भूतः (वि) (हि) खलु (ईम्) सर्वतः (इद्धः) शुभलक्षणैः प्रकाशितः (अख्यत्) धर्म्यानुपदेशान् प्रकथयेः (आ) (रोदसी) अग्निभूमी (भानुना) पुरुषार्थप्रकाशेन (भाति) (अन्तः) राजधर्म्ममध्ये स्थितः। [अयं मन्त्रः शत॰६.८.१.११ व्याख्यातः]॥३३॥

    भावार्थः

    अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। नहि वनवृक्षरक्षणेन वृष्टिबाहुल्यमारोग्यं तडिद्व्यवहारवद् दूरसमाचारग्रहणेन शत्रुविनाशनेन राज्ये विद्यान्यायप्रकाशेन च विना सुराज्यं च जायते॥३३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    राज्य का प्रबन्ध कैसे करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे प्रजा के लोगो! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे (द्यौः) सूर्य प्रकाशकर्त्ता है, वैसे विद्या और न्याय का प्रकाश करने और (अग्निः) पावक के तुल्य शत्रुओं का नष्ट करनेहारा विद्वान् (स्तनयन्निव) बिजुली के समान (अक्रन्दत्) गर्जता और (वीरुधः) वन के वृक्षों की (समञ्जन्) अच्छे प्रकार रक्षा करता हुआ (क्षामा) पृथिवी पर (रेरिहत्) युद्ध करे (जज्ञानः) राजनीति से प्रसिद्ध हुआ, (इद्धः) शुभ लक्षणों से प्रकाशित (सद्यः) शीघ्र (व्यख्यत्) धर्मयुक्त उपदेश करे तथा (भानुना) पुरुषार्थ के प्रकाश से (हि) ही (रोदसी) अग्नि और भूमि को (अन्तः) राजधर्म में स्थिर करता हुआ (आभाति) अच्छे प्रकार प्रकाश करता है, वह पुरुष राजा होने के योग्य है, ऐसा निश्चित जानो॥३३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वन के वृक्षों की रक्षा के विना बहुत वर्षा और रोगों की न्यूनता नहीं होती, और बिजुली के तुल्य दूर के समाचारों शत्रुओं को मारने और विद्या तथा न्याय के प्रकाश के विना अच्छा स्थिर राज्य ही नहीं हो सकता॥३३॥

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    विषय

    मेघ - गर्जन

    पदार्थ

    १. ( अग्निः ) = सब उन्नतियों के साधक, प्रकाश देनेवाले प्रभु ( स्तनयन् इव द्यौः ) = गर्जते हुए मेघ के समान ( अक्रन्दत् ) = उच्च स्वर से वेदज्ञान का उच्चारण कर रहे हैं। २. जब हम उनकी वाणी को सुनते हैं तो ( क्षामा ) = हमारे इस शरीर को [ पृथिवी शरीरम् ] ( रेरिहत् ) = वे अत्यन्त आनन्दमय बना देते हैं। ३. ( वीरुधः ) = विशिष्ट रोहणों को व विविध शक्तियों के विकासों को वे ( समञ्जन् ) = हममें व्यक्त करते हैं, अर्थात् प्रभु की वाणी को सुनकर तदनुसार आचरण करने पर हमारी शक्तियों का विकास होता है और हमारा स्वस्थ व सुन्दर जीवन आनन्दमय बन जाता है। ४. ( जज्ञानः ) = प्रकट होते हुए वे प्रभु ( इद्धः ) = हृदयाकाश में दीप्त हुए ( हि ईम् ) = निश्चय से ( सद्यः ) = शीघ्र ही ( विअख्यत् ) = विशेषरूप से हमारे जीवन को प्रकाशमय बना देते हैं। ५. वे प्रभु ( रोदसी अन्तः ) = इस द्युलोक व पृथिवीलोक के अन्दर, अर्थात् सम्पूर्ण आकाश में ( भानुना ) = दीप्ति से ( आभाति ) = समन्तात् चमक रहे हैं, उसी के प्रकाश से सभी प्रकाशित हो रहे हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम उस प्रभु की वाणी को सुनें, हममें विविध शक्तियों का विकास होगा और हमारा जीवन चमक उठेगा।

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    विषय

    प्रजावत्सल विजयी राजा का आदर ।

    भावार्थ

    ( अग्नि: ) अग्नि विद्युत् जिस प्रकार ( अक्रन्दत ) गर्जना करता है । और ( द्यौ: ) जल दान करनेवाला मेघ जिस प्रकार ( स्तनयन् इव ) गर्जना करता है उसी प्रकार ( अग्निः ) ज्ञानी, विद्वान् गम्भीर स्वर से उपदेश करे और मेघ के समान समानभाव से सबको ज्ञान प्रदान करे. इसी प्रकार तेजस्वी राजा सिंह गर्जना करे और मेघ के समान गम्भीर ध्वनि करे । मेघ ( क्षामा ) क्षामा अर्थात् पृथ्वी को जिस प्रकार जलधारा रूप से प्राप्त होकर ( विरुधः सम् अञ्जन् ) नाना प्रकार से उत्पन्न होने वाली लताओं को प्रकट करता है उसी प्रकार वह तेजस्वी राजा भी ( क्षामा ) पृथिवी को ( रेरिहत् ) स्वयं भोग करता हुआ ( वीरुधः ) नाना प्रकार से उन्नतिशील प्रजाओं को ( सम् अञ्जन् ) ज्ञानादि से प्रकाशित करता है । वह ( सद्यः ) शीघ्र ही ( जज्ञानः ) प्रकट होकर अपने गुणों से ( इद्धः ) तेजस्वी एवं प्रकाशित होकर ( हि ) निश्चय से ( ईम् ) इस लोक को ( वि अख्यत् ) विशेष प्रकार से प्रकाशित करता है । और ( रोदसी ) आकाश और पृथिवी के ( अन्तः ) बीच में सूर्य के समान राजा प्रजा के बीच और विद्वान् पुत्र माता पिता के बीच ( भानुना ) अपनी कान्ति से (आ भाति ) प्रकाशित होता है ॥ शत० ६ । ७ । ३ ।।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. वनराजींचे रक्षण केल्याशिवाय रोग कमी होऊ शकत नाहीत व अधिक पाऊस पडू शकत नाही, तसेच शत्रूंना मारण्यासाठी, दूरचे वर्तमान कळण्यासाठी विद्युतप्रमाणे जलद कार्य केल्याशिवाय आणि विद्या व न्याय याखेरीज चांगले स्थिर राज्यही होऊ शकत नाही.

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    विषय

    राजाने आपल्या राज्याची व्यवस्था कशाप्रकारे करावी, याविषयी

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (प्रजेला विद्वज्जनांचा उपदेश) हे प्रजाजनहो ज्याप्रमाणे (घौ:) सूर्य प्रकाश देतो, त्याप्रमाणे तुम्हाला विद्या आणि न्याय देणारा तसेच (अग्नि:) पावकाप्रमाणे शत्रूंना नष्ट-ध्वस्त करणारा (तुमचा राष्ट्राध्यक्ष राजा) विद्वान असावा (स्तनयन्निव) विद्युतेप्रमाणे (अक्रन्दत्‌) कडकडाट करीत आणि (वीरुध:) वनाच्या वृक्षांची (समज्जन्‌) चांगल्या प्रकारे रक्षा करीत (क्षामा) या पृथ्वीवर (रेरिहत्‌) युद्ध करणारा पाहिजे. (जज्ञान!) राजनीतीत पुरुषात वा कीर्तिमंत हवा. (इद्ध:) शुभलक्षणांनी संपन्न असून (सद्य:) शीघ्र (व्यव्यत्‌) धर्ममय उपदेश देणारा पाहिजे. तसेच (भानुना) पुरुषार्थरुप प्रकाशाद्वारे (हि) विश्‍वयाने (रोदसी) अग्नी आणि भूमीचा (अन्त:) राजधर्मपूर्ततेसाठी उपयोग करीत (आभाति) चांगल्याप्रकारे कीर्तिमान होणारा असावा. असाच पुरुष राजा होण्यास पात्र आहे (असे जाणा) ॥33॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा आणि उपमा अलंकार आहेत. वनाचे आणि वृक्षांचे रक्षण केल्याशिवाय पुष्कळ वृष्टी होत नाही आणि रोगराईदेखील कमी होत नाही. विद्युतशक्तीपेक्षा तीव्र वेगाने दूरपर्यंत समाचार पाठविणारी आणि शत्रुंचा नाश करणारी अन्य विद्या वा साधन नाही. तसेच विद्या आणि न्याय यांच्या स्थापनेशिवाय उत्तम राज्याची स्थापना होणे देखील शक्य नाही. ॥33॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    He alone is fit to rule, who spreads knowledge, and administers justice, kills the foes, roars like the lightning, protects the forest trees, wages battles on the earth, is expert in statesmanship, and endowed with noble qualities, speedily preaches religion, keeps with his power under control, the Sun and Earth, and spreads around his lustre.

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    Meaning

    Agni roars and thunders like lightning in the sky as it proclaims its presence on the earth. Joining every bit of life and vegetation, it inspires all forms of existence with passion and vitality and thus manifests itself, protecting and promoting life. And it goes on blazing with its mighty splendour from the earth below to the highest heaven. (So does the scholar with his knowledge, the ruler with his power, and the commander with his force, shine and blaze all round, protecting, promoting and inspiring the nation and the environment with freedom, passion and enthusiasm).

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    Translation

    The fire roars like thunder in the sky, licking the earth and engulfing the plants. Being born, he quickly flares up and is known all around. He shines forth between heaven and earth. (1)

    Notes

    Same as Yaj. XII. 6.

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    बंगाली (1)

    विषय

    রাজ্যপ্রবন্ধঃ কথং কার্য়্য ইত্যুপদিশ্যতে ॥
    রাজ্যের ব্যবস্থা কীভাবে করিবে এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে প্রজাগণ ! তোমাদের উচিত যে, যেমন (দ্যৌঃ) সূর্য্য প্রকাশকর্ত্তা সেইরূপ বিদ্যা ও ন্যায়ের প্রকাশক এবং (অগ্নিঃ) পাবকতুল্য শত্রুদিগের নাশকারী বিদ্বান্ (স্তনয়ন্নিব) বিদ্যুতের সমান (অক্রন্দৎ) গর্জন করে এবং (বীরুধঃ) বনের বৃক্ষকে (সমঞ্জন্) সমুচিত রক্ষা করিয়া (ক্ষামা) পৃথিবীর উপরে (রেরিহৎ) যুদ্ধ করে (জজ্ঞানঃ) রাজনীতিতে প্রসিদ্ধ (ইদ্ধঃ) শুভ লক্ষণ দ্বারা প্রকাশিত (সদ্যঃ) শীঘ্র (ব্যখ্যৎ) ধর্মযুক্ত উপদেশ করে এবং (ভানুনা) পুরুষার্থের প্রকাশ দ্বারা (হি)(রোদসী) অগ্নিও ভূমিকে (অন্তঃ) রাজধর্মে স্থির করিয়া (আভাতি) সম্যক্ প্রকারে প্রকাশ করে সেই পুরুষ রাজা হইবার যোগ্য – এমন নিশ্চিত জানিবে ॥ ৩৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমা ও বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । বনের বৃক্ষের রক্ষা ব্যতীত বহু বর্ষা ও রোগের নূ্যনতা হয় না এবং বিদ্যুতের তুল্য দূরবর্তী সমাচার দ্বারা শত্রুদিগকে বধ করিবার এবং বিদ্যা তথা ন্যায়ের প্রকাশ ব্যতীত স্থির সুরাজ্য স্থাপিত হইতে পারে না ॥ ৩৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অত্র॑ôন্দদ॒গ্নি স্ত॒নয়॑ন্নিব॒ দ্যৌঃ ক্ষামা॒ রেরি॑হদ্ বী॒রুধঃ॑ সম॒ঞ্জন্ ।
    সদ্যো॒ জ॑জ্ঞা॒নো বি হীমি॒দ্ধোऽঅখ্য॒দা রোদ॑সী ভা॒নুনা॑ ভাত্য॒ন্তঃ ॥ ৩৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অক্রন্দদিত্যস্য বৎসপ্রীর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । নিচৃদার্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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