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यजुर्वेद अध्याय - 15

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  • यजुर्वेद - अध्याय 15/ मन्त्र 26
    ऋषिः - परमेष्ठी ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - भुरिगार्षी त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    78

    अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठोऽअध्व॒रेष्वीड्यः॑। यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं वि॒शेवि॑शे॥२६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒यम्। इ॒ह। प्र॒थ॒मः। धा॒यि॒। धा॒तृभि॒रिति॑ धा॒तृऽभिः॑। होता॑। यजि॑ष्ठः। अ॒ध्व॒रेषु॑। ईड्यः॑। यम्। अप्न॑वानः। भृग॑वः। वि॒रु॒रु॒चुरिति॑ विऽरु॒रु॒चुः। वने॑षु। चि॒त्रम्। वि॒भ्व᳖मिति॑ वि॒ऽभ्व᳖म्। वि॒शेवि॑श॒ इति॑ वि॒शेऽवि॑शे ॥२६ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्हाता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वँविशेविशे ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अयम्। इह। प्रथमः। धायि। धातृभिरिति धातृऽभिः। होता। यजिष्ठः। अध्वरेषु। ईड्यः। यम्। अप्नवानः। भृगवः। विरुरुचुरिति विऽरुरुचुः। वनेषु। चित्रम्। विभ्वमिति विऽभ्वम्। विशेविश इति विशेऽविशे॥२६॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 15; मन्त्र » 26
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्याह॥

    अन्वयः

    य इहाध्वरेष्वीड्यो यजिष्ठो होता प्रथमोऽयमग्निर्धातृभिर्धायि यं वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशेऽप्नवानो भृगवो विरुरुचुस्तं सर्वे मनुष्या अङ्गीकुर्य्युः॥२६॥

    पदार्थः

    (अयम्) (इह) (प्रथमः) विस्तीर्णोऽग्निः (धायि) ध्रियते (धातृभिः) धारकैः (होता) आदाता (यजिष्ठः) अतिशयेन यष्टा (अध्वरेषु) अहिंसनीयव्यवहारेषु (ईड्यः) अन्वेषितुं योग्यः (यम्) (अप्नवानः) रूपवन्तः। अप्नमिति रूपना॰॥ (निघं॰३।५) अत्र छान्दसो वर्णलोप इति मतोस्तलोपः (भृगवः) परिपक्वविज्ञानाः (विरुरुचुः) विरोचन्ते प्रकाशन्ते (वनेषु) रश्मिषु (चित्रम्) अद्भुतम् (विभ्वम्) व्यापकम् (विशेविशे) प्रजायै प्रजायै॥२६॥

    भावार्थः

    विद्वांसोऽग्निविद्यां धृत्वाऽन्येभ्यः प्रदद्युः॥२६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    जो (इह) इस जगत् में (अध्वरेषु) रक्षा के योग्य व्यवहारों में (ईड्यः) खोजने योग्य (यजिष्ठः) अतिशय करके यज्ञ का साधक (होता) घृतादि का ग्रहणकर्त्ता (प्रथमः) सर्वत्र विस्तृत (अयम्) यह प्रत्यक्ष अग्नि (धातृभिः) धारणशील पुरुषों ने (धायि) धारण किया है, (यम्) जिस को (वनेषु) किरणों में (चित्रम्) आश्चर्यरूप से (विभ्वम्) व्यापक अग्नि को (विशेविशे) समस्त प्रजा के लिये (अप्नवानः) रूपवान् (भृगवः) पूर्णज्ञानी (विरुरुचुः) विशेष करके प्रकाशित करते हैं, उस अग्नि को सब मनुष्य स्वीकार करें॥२६॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग अग्निविद्या को आप धारके दूसरों को सिखावें॥२६॥

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    विषय

    दावानल के समान उग्र राजा ।

    भावार्थ

    ( अयम् ) यह ( प्रथम ) सर्व श्रेष्ठ पुरुष (अध्वरेषु यजिष्टः होता ) यज्ञों में, यज्ञ करने वालों में सबसे उत्तम यश करने वाले होता के समान (अध्वरेषु) अहिंसा रहित राष्ट्र के पालन के कार्यों में या युद्धों में ( यजिष्ठ: ) सबसे उत्तम संगति या व्यवस्था करने हारा, (होता) दान- शील होकर ( ईष्य: ) स्तुति करने योग्य है। वही ( धातृभिः ) राष्ट्र के धारण करने वाले पुरुषों द्वारा ( इह ) इस राष्ट्र शासन के मुख्य पद पर ( धायि ) स्थापित किया जाता है । ( अप्नवानः भुगवः ) ज्ञानी विद्वान् जिस प्रकार ( वनेषु ) वनों में ( विभ्वं ) व्यापक अग्नि को ( विरुरुदुः ) विविध उपायों से उसी प्रकार ( वनेषु) रश्मियों में ( चित्रम् ) अद्भुत तेजस्वी, (दिभ्वम् ) विविध सामर्थ्यों से सम्पन्न ( यम् ) जिस प्रधान पुरुष को आश्रय लेकर प्रकाशित करते हैं, प्रज्वलित करते हैं ( विशे विशे) प्रजा के हित के लिये ( अप्नवानः भृगवः ) रूप विज्ञान थाली तेजस्वी पुरुष ( विरुरुचुः ) विविध प्रकार से प्रकाशित करते हैं। उसके लिये अपने २ गुण और शिल्प प्रकट करते हैं ।

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    विषय

    [ उस प्रभु के लिए ] वनेषु चित्रम्

    पदार्थ

    १. (अयं प्रथमः) = यह आद्य पुरुष-सृष्टि बनने से पहले ही वर्त्तमान स्वयम्भू परमात्मा (इह) = इस मानव-जीवन में (धातृभिः) = धाताओं-लोकहित में लगे व्यक्तियों से धायि = धारण किया जाता है। प्रभु का धारण वही कर पाते हैं जो अधिक-से-अधिक लोकहित में प्रवृत्त होते हैं। २. इन धाताओं से अपने हृदयों में उस प्रभु का धारण होता है जो [क] (होता) = सब-कुछ देनेवाला है-उस दाता प्रभु का स्मरण करते हुए ये भी देनेवाले बनते हैं। [ख] (यजिष्ठ:) = सर्वाधिक पूज्य है सबके साथ सङ्गतीकरणवाला है और वस्तुतः संसार के सभी पदार्थों व इन्द्रियादि का देनेवाला है। जिसका दान निरतिशय है। इस प्रभु का स्मरण करते हुए ये भक्त भी अधिक-से-अधिक प्राणियों के सम्पर्क में आते हैं और उनके कष्टों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। [ग] (अध्वरेष्वीड्यः) = हिंसाशून्य महान् यज्ञों में वह प्रभु ही स्तुति के योग्य है। वस्तुतः उस प्रभु की कृपा से ही सब यज्ञ पूर्ण होते हैं। प्रभु का इस रूप में स्मरण करता हुआ भक्त यज्ञों की सफलता में गर्ववाला नहीं हो जाता। ३. ये प्रभु वे हैं (यम्) = = जिनको [क] (अप्नवानः) = उत्तम यज्ञिय कर्मोंवाले और अतएव उत्तम रूपवाले [ अप्न=A sacrificial act; shape ] (भृगवः) = ज्ञानविदग्ध [भ्रस्ज पाके] तेजस्वी पुरुष (विरुरुचुः) = [रोचयामासुः -म० ] अपने हृदय - मन्दिर में दीप्त किया करते हैं। [ख] जो प्रभु (वनेषु) = सम्भजनशील भक्त पुरुषों में [वन संभक्तौ] अथवा जितेन्द्रिय पुरुषों में [वन् = win] (चित्रम्) = [चित्+र ] ज्ञान देनेवाले हैं तथा [२] (विशेविशे) = प्रत्येक प्रजा में (विभ्वम्) = व्यापक रूप से विद्यमान हैं अथवा प्रत्येक व्यक्ति में विभुत्व शक्ति से युक्त हैं। उस उस को वह वह शक्ति प्राप्त करा रहे हैं। बुद्धिमानों की वे बुद्धि हैं तो बलवानों के वे बल हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु धाताओं से औरों का धारण करनेवालों से धारण किया जाता है। उपासकों को वे प्रभु ज्ञान देते हैं, वे सबको शक्ति प्राप्त कराते हैं।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    विद्वानांनी अग्निविद्या स्वतः शिकून इतरांनाही शिकवावी.

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    विषय

    पुढील मंत्रातही तोच विषय प्रतिपादित आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (इह) या जगात (हा भौतिक अग्नी) अध्वरेषु) करणीय कार्यात व व्यवहारात उपयोगी असून (ईऽय:) अधिक संशोधन व प्रयोग करण्यास योग्य आहे. तसेच (यजिष्ठ:) यज्ञसाधक असून (होता) घृत आदी पदार्थांचा ग्रहणकर्ता आहे. (प्रथम:) हा अग्नी सर्वत्र व्यापक आहे (अयम्) या अशा (उपयोगी अग्नीला) (धातृभि:) धारणशील पुरुषांनी (धायि) धारण केले आहे (याचे उपयुक्त ज्ञान-विज्ञान प्राप्त केले आहे) (यम्) अशा ज्या अग्नीचा (वनेषु) सूर्य किरणांमधे (चित्रम्) अति अद्भुत रुपाने अवस्थित (विभ्वम्) व्यापकल गुणाला (अप्नवान:) (भृगव:) पूर्ण ज्ञानी विद्वज्जन (विशेविशे) समस्त प्रजेकरिता (अप्नवान्:) रुपवान करतात (किरणात गुप्त असलेल्या अग्नीला प्रत्यक्ष करून) (विरूचु:) प्रत्यक्ष उपयोगात आणात आणि त्यापासून मिळणारे लाभ अधिकाधिक प्रकट करतात. तेव्हाच सर्व मनुष्य त्या अग्नीला स्वीकार करतात (अशाच्या विद्युत, ऊर्जा आदी रुपाचा प्रयोग करतात) ॥26॥

    भावार्थ

    भावार्थ - विद्वानांनी (वैज्ञानिकांनी) स्वत: अग्निविद्या जाणावी, योग्य रीतीने धारण करावी (उपयोगात आणावी) आणि त्यापासून होणारे लाभ इतरांनाही सांगावेत ॥26॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    In this world, this visible fire, serviceable in works of protection, worthy of investigation, the paramount accomplisher of sacrifice (yajna), the recipient of ghee, and ubiquitous, is acknowledged by the learned. The beautiful persons, adequately advanced in knowledge expound for all people this fire pervading the beams wondrously.

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    Meaning

    This agni here, first and foremost power of nature, lighted and established in the vedi by dedicated saints and sages, is worthiest of reverence and esteem. It is most valuable for development through creative and constructive acts of yajna. Present as it is, wonderful and universal, in the rays of the sun and currents of energy, the most intelligent and versatile men of genius develop it for the general good of the people.

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    Translation

    This invoker of Nature’s bounties, adored in worship, has been assigned a foremost place by the performers of noble deeds. This is the cosmic fire, marvellous in action and sovereign over all, whom the wise Sages, and their descendants harness for domestic purposes and for the benefit of mankind. (1)

    Notes

    Repeated from III. 15.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনঃ স কীদৃশ ইত্যাহ ॥
    পুনঃ সে কেমন হইবে, এই বিষয়ে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।

    पदार्थ

    পদার্থঃ–যে (ইহ) এই জগতে (অধ্বরেষু) রক্ষার যোগ্য ব্যবহারে (ইড্যঃ) অনুসন্ধান করিবার যোগ্য (য়জিষ্ঠঃ) অতিশয় করিয়া যজ্ঞের সাধক (হোতা) ঘৃতাদির গ্রহণকর্ত্তা (প্রথমঃ) সর্বত্র বিস্তৃত (অয়ম্) এই প্রত্যক্ষ অগ্নি (ধাতৃভিঃ) ধারণশীল পুরুষ সকল (ধায়ি) ধারণ করিয়াছে (য়ম্) যাহাকে (বনেষু) কিরণগুলিতে (চিত্রম্) আশ্চর্য্যরূপে (বিভ্বম্) ব্যাপক অগ্নিকে (বিশেবিশে) সমস্ত প্রজার জন্য (অপ্নবান্) রূপবান্ (ভুগবঃ) পূর্ণজ্ঞানী (বিরুরুচুঃ) বিশেষ করিয়া প্রকাশিত করেন, সেই অগ্নিকে সকল মনুষ্য স্বীকার করুক ॥ ২৬ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–বিদ্বান্গণ অগ্নিবিদ্যাকে স্বয়ং ধারণ করিয়া অন্যদেরকে শিখাইবেন ॥ ২৬ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অ॒য়মি॒হ প্র॑থ॒মো ধা॑য়ি ধা॒তৃভি॒র্হোতা॒ য়জি॑ষ্ঠোऽঅধ্ব॒রেষ্বীড্যঃ॑ ।
    য়মপ্ন॑বানো॒ ভৃগ॑বো বিরুরু॒চুর্বনে॑ষু চি॒ত্রং বি॒ভ্বং᳖ বি॒শেবি॑শে ॥ ২৬ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অয়মিহেত্যস্য পরমেষ্ঠী ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ভুরিগার্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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