यजुर्वेद - अध्याय 17/ मन्त्र 45
ऋषिः - अप्रतिरथ ऋषिः
देवता - इषुर्देवता
छन्दः - आर्ष्यनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
316
अव॑सृष्टा॒ परा॑ पत॒ शर॑व्ये॒ ब्रह्म॑सꣳशिते। गच्छा॒मित्रा॒न् प्र प॑द्यस्व॒ मामीषां॒ कञ्च॒नोच्छि॑षः॥४५॥
स्वर सहित पद पाठअव॑सृ॒ष्टेत्यव॑ऽसृष्टा। परा॑। प॒त॒। शर॑व्ये। ब्रह्म॑सꣳशित॒ इति॒ ब्रह्म॑ऽसꣳशिते। गच्छ॑। अ॒मित्रा॑न्। प्र। प॒द्य॒स्व॒। मा। अ॒मीषा॑म्। कम्। च॒न। उत्। शि॒षः॒ ॥४५ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसँशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषाङ्कं चनोच्छिषः ॥
स्वर रहित पद पाठ
अवसृष्टेत्यवऽसृष्टा। परा। पत। शरव्ये। ब्रह्मसꣳशित इति ब्रह्मऽसꣳशिते। गच्छ। अमित्रान्। प्र। पद्यस्व। मा। अमीषाम्। कम्। चन। उत्। शिषः॥४५॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे शरव्ये ब्रह्मसंशिते सेनानीपत्नि! त्वमवसृष्टा सती परापतामित्रान् गच्छ, तेषां हनने विजयं प्रपद्यस्वामीषां शत्रूणां मध्ये कञ्चन मोच्छिषो हननेन विना कञ्चिदपि मा त्यजेः॥४५॥
पदार्थः
(अवसृष्टा) प्रेरिता (परा) (पत) याहि (शरव्ये) शरेषु बाणेषु साध्वी स्त्री तत्सम्बुद्धौ (ब्रह्मसंशिते) ब्रह्मभिश्चतुर्वेदविद्भिः प्रशंसिते शिक्षया सम्यक् तीक्ष्णीकृते (गच्छ) (अमित्रान्) शत्रून् (प्र) (पद्यस्व) प्राप्नुहि (मा) निषेधे (अमीषाम्) दूरस्थानां विरोधिनाम् (कम्) (चन) कञ्चिदपि (उत्) (शिषः) उदूर्ध्वं शिष्टं त्यजेत्॥४५॥
भावार्थः
सभापत्यादिभिः यथा युद्धविद्यया पुरुषाः शिक्षणीयास्तथा स्त्रियश्च, यथा वीरपुरुषा युद्धं कुर्युस्तथा स्त्रियोऽपि कुर्वन्ति। ये शत्रवो युद्धे हताः स्युस्तदवशिष्टाश्च शाश्वते बन्धने कारागृहे स्थापनीयाः॥४५॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (शरव्ये) बाणविद्या में कुशल (ब्रह्मसंशिते) वेदवेत्ता विद्वान् से प्रशंसा और शिक्षा पाये हुए सेनाधिपति की स्त्री! तू (अवसृष्टा) प्रेरणा को प्राप्त हुई (परा, पत) दूर जा (अमित्रान्) शत्रुओं को (गच्छ) प्राप्त हो और उनके मारने से विजय को (प्र, पद्यस्व) प्राप्त हो, (अमीषाम्) उन दूर देश में ठहरे हुए शत्रुओं में से मारने के विना (कम्, चन) किसी को (मा) (उच्छिषः) मत छोड़॥४५॥
भावार्थ
सभापति आदि को चाहिये कि जैसे युद्धविद्या से पुरुषों को शिक्षा करें, वैसे स्त्रियों को भी शिक्षा करें। जैसे वीरपुरुष युद्ध करें, वैसे स्त्री भी करे। जो युद्ध में मारे जावें, उनसे शेष अर्थात् बचे हुए कातरों को निरन्तर कारागार में स्थापन करें॥४५॥
विषय
भयंकर सेना का शत्रु पीड़न का कार्य ।
भावार्थ
हे ( शरव्ये ) हिंसक या प्राणघातक साधनों की बनी हुई शरव्ये ! शर वर्षाने वाली कले! हे ( ब्रह्मसंशिते ) बड़े भारी बल वीर्य से अति तीक्ष्ण, वेग वाली की गयी तू ( अवसृष्टा ) छोड़ी या चलाई जा कर ( परापत ) दूर तक जा और ( गच्छ ) इधर भी जा और ( अमित्रान् ) शत्रुओं तक ( प्र पद्यस्व) आगे बढ़ी चली जा और उनतक पहुंच । ( अमीषां ) उन शत्रुओं में से ( कञ्चन ) किसी को भी ( मा उत् शिषः ) जीता बचा न छोड़ । अनेक बाणों या गोलियों को एकही साथ छोड़ने वाली तोप के समान कोई कला 'शरव्या' कहाती प्रतीत होती है । शरमयी इषुः शख्य इति उव्वटः। 'शरमयी हेतिः शरव्या' इति महीधरः । 'इषु' या हेति' जो किसी साधन को दूर फेंके वह कला 'इषु' या 'हेति' कहाती है । अथवा - हे ( ब्रह्मसंशिते शरव्ये ) विद्वानों से प्रशंसित बाणविद्या की विदुषि स्त्रि ! तू प्रेरित होकर जा, शत्रुओं को मार, उनमें से किसी को न छोड़ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
४५-४६ अप्रतिरथ ऋषिः । प्रजापतिः विवस्वान्वेत्येके । इषुर्देवता । आर्ष्यनुष्टुप् । गांधारः ॥
विषय
लक्ष्य दृष्टि
पदार्थ
संसार में न फँसने व निरन्तर आगे और आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने सामने एक लक्ष्य [ध्येय] रखे। लक्ष्य ओझल हुआ और मनुष्य भटका । यह लक्ष्य ही 'शरव्या' है। २. यह लक्ष्य बड़ा सोच-समझकर बनाया जाना चाहिए । मन्त्र में कहते हैं कि यह 'ब्रह्मसंशित' हो, ज्ञान से तीव्र बनाया जाए। हे (ब्रह्मसंशिते) = ज्ञान से तीव्र बनाये गये (शरव्ये) = लक्ष्य ! तू (अवसृष्टा) [ अवसृज् to make, create ] = हमारे जीवनों से उत्पन्न होकर (परापत) = खूब दूर बढ़ चल। लक्ष्य के सदा सामने होने पर हमारी तीव्र गति व शीघ्र प्रगति क्यों न होगी ? लक्ष्य का न होना अथवा लक्ष्य का भूला हुआ होने के कारण ही प्रगति रुकी रहती है । ३. लक्ष्य का संकेत उत्तरार्ध में इस प्रकार करते हैं कि (गच्छ) = तू जा (अमित्रान्) = स्नेह न करने की भावना को, ईर्ष्या-द्वेषादि की भावना को, औरों से जलने की भावना को (प्रद्यस्व) = विशेषरूप से आक्रान्त कर। (मामीषाम्) = इन द्वेषादि की निकृष्ट भावनाओं में से (कञ्चन) = किसी को (न उच्छिषः) = शेष मत छोड़। इन भावनाओं में से एक-एक को ढूँढकर तू समाप्त करनेवाला बन।
भावार्थ
भावार्थ - १. हमारा जीवन लक्ष्य-दृष्टि से शून्य न हो। २. हम द्वेषादि की भावना को समूल नष्ट कर दें।
मराठी (2)
भावार्थ
युद्धविद्येचे शिक्षण जसे पुरुषांना दिले जाते तसे राजाने स्त्रियांनाही द्यावे. जसे वीर पुरुष युद्ध करतात, तसेच स्त्रियांनीही करावे. युद्धात मृत झालेल्यांना सोडून (शत्रूपक्षाच्या) उरलेल्या भयभीत लोकांना सतत कारागृहात ठेवावे.
विषय
पुनश्च पुढील मंत्रात तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (राख्ये) बाणविद्येत प्रवीण (ब्रह्मसंशिते)ऽ आणि वेदज्ञ विद्वानांद्वारे प्रशंसा व प्रशिक्षण प्राप्त केलेली हे सेनापतीची पत्नी (वा सैन्याची महिला-पुरुष), तू (अवसृष्टा) उत्साहाद्वारे प्रेरित होऊन (परा, पत) दूर जा (पूर्ण जोषाने दूर दूरपर्यंत असलेल्या शत्रूवर आक्रमण कर) आणि (अमित्रान्) (गच्छ) शत्रूंना त्याच्याठिकाणी जाऊन बंदिस्त कर. त्यांना ठार करून विजय (प्र पघस्व) प्राप्त कर. (लक्षात असू दे की) (अमीषाम्) त्या दूर देशस्य वैरींना ठार केल्याशिवाय (येऊ नको) वा (कं चन) कोणाला (एकादेखील शत्रूला) (मा) (उच्छिप:) जिवंत सोडू नकोस. ॥45॥
भावार्थ
भावार्थ - सभापती (राजा) चे कर्तव्य आहे की त्याने ज्याप्रमाणे पुरुषांना प्रशिक्षण देऊन पुरुष-सेना निर्माण करावी, तद्वत स्त्रियांनादेखील प्रशिक्षित करावे. ज्याप्रमाणे वीर पुरुष युद्धात भाग घेतात, तद्वत स्त्रियांनीदेखील युद्धश्रेत्र वीरत्वाने गाजवावा. जे शत्रूसैनिक युद्धानंतर जिवंत वाचतील, त्या भीरू माणसांना कैदेत टाकावे. ॥45॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O wife of the commander-in-chief, expert in the art of archery, trained by a learned person knowing the Vedas, on persuasion, go afar, encounter the foes, achieve victory by slaying them. Let not even one of those distant foes escape.
Meaning
Valiant women’s corps, trained by the military experts of the Vedas, commanded and exhorted by the leader, shooting like an arrow, go far and fall upon the enemies. Go deep and take them all, do not spare any one of them.
Translation
O arrow, whetted by prayers, fly when discharged forcefully; come down on the adversaries, strike them true, and spare not one of the enemy. (1)
Notes
Śaravye, a missile made of reed. Brahmasamnsite, made more destructive with (scientific) knowledge. Uvata suggests, तीक्ष्णीकृते, made more fatal with mantra (prayer).
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (শরব্যে) বাণবিদ্যায় কুশল (ব্রহ্মসংশিতে) বেদবেত্তা বিদ্বান্ হইতে প্রশংসা এবং শিক্ষা প্রাপ্ত সেনাধিপতির স্ত্রী! তুমি (অবসৃষ্টা) প্রেরণা প্রাপ্ত (পরা, পত) দূরে গমন করিয়া (অমিত্রান্) শত্রুদিগকে (গচ্ছ) প্রাপ্ত হও এবং তাহাদের বধ করিয়া বিজয় (প্র, পদ্যস্ব) লাভ কর । (অমীষাম্) সেই সব দূর দেশে স্থিত শত্রুদিগের মধ্যে না বধ করিয়া (কং, চন) কাহাকেও (মা) (উচ্ছিষ্টঃ) ছাড়িও না ॥ ৪৫ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–সভাপতি আদির উচিত যে, যেমন যুদ্ধবিদ্যা দ্বারা পুরুষ শিক্ষা গ্রহণ করিবে সেই রূপ নারীগণও শিক্ষা করুক । যেমন বীরপুরুষ যুদ্ধ করিবে সেইরূপ নারীগণও করিবে । যাহারা যুদ্ধে নিহত হয়, তদ্ব্যতীত অবশিষ্ট যে সব আহতগণ থাকিবে তাহাদিগকে কারাগারে নিক্ষেপ কর ॥ ৪৫ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
অব॑সৃষ্টা॒ পরা॑ পত॒ শর॑ব্যে॒ ব্রহ্ম॑সꣳশিতে ।
গচ্ছা॒মিত্রা॒ন্ প্র প॑দ্যস্ব॒ মামীষাং॒ কঞ্চ॒নোচ্ছি॑ষঃ ॥ ৪৫ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
অবসৃষ্টেত্যস্যাপ্রতিরথ ঋষিঃ । ইষুর্দেবতা । আর্ষ্যনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
গান্ধারঃ স্বরঃ ॥
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