यजुर्वेद - अध्याय 18/ मन्त्र 69
ऋषिः - इन्द्रविश्वामित्रावृषी
देवता - इन्द्रो देवता
छन्दः - आर्षी त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
87
स॒हदा॑नुम्पुरुहूत क्षि॒यन्त॑मह॒स्तमि॑न्द्र॒ सम्पि॑ण॒क् कुणा॑रुम्। अ॒भि वृ॒त्रं वर्द्ध॑मानं॒ पिया॑रुम॒पाद॑मिन्द्र त॒वसा॑ जघन्थ॥६९॥
स्वर सहित पद पाठस॒हदा॑नु॒मिति॑ स॒हऽदा॑नुम्। पु॒रु॒हू॒तेति॑ पुरुऽहूत। क्षि॒यन्त॑म्। अ॒ह॒स्तम्। इ॒न्द्र॒। सम्। पि॒ण॒क्। कुणा॑रुम्। अ॒भि। वृ॒त्रम्। वर्द्ध॑मानम्। पिया॑रुम्। अ॒पाद॑म्। इ॒न्द्र॒। त॒वसा॑। ज॒घ॒न्थ॒ ॥६९ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सहदानुम्पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सम्पिणक्कुणारुम् । अभि वृत्रँवर्धमानम्पियारुमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ ॥
स्वर रहित पद पाठ
सहदानुमिति सहऽदानुम्। पुरुहूतेति पुरुऽहूत। क्षियन्तम्। अहस्तम्। इन्द्र। सम्। पिणक्। कुणारुम्। अभि। वृत्रम्। वर्द्धमानम्। पियारुम्। अपादम्। इन्द्र। तवसा। जघन्थ॥६९॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्जनैः कथम्भवितव्यमित्युपदिश्यते॥
अन्वयः
हे पुरुहूतेन्द्र! यथा सूर्यः सहदानुं क्षियन्तं कुणारुमहस्तं पियारुमपादमभिवर्द्धमानं वृत्रं सम्पिणक् तथा हे इन्द्र! शत्रूँस्तवसा जघन्थ॥६९॥
पदार्थः
(सहदानुम्) यः सहैव ददाति तम् (पुरुहूत) बहुभिस्सज्जनैः सत्कृत (क्षियन्तम्) गच्छन्तम् (अहस्तम्) अविद्यमानौ हस्तौ यस्य तम् (इन्द्र) शत्रुविदारक सेनेश (सम्) (पिणक्) पिनष्टि (कुणारुम्) शब्दयन्तम्। अत्र ‘क्वण शब्दे’ इत्यस्माद्धातोरौणादिक आरुः प्रत्ययः। (अभि) (वृत्रम्) मेघमिव (वर्द्धमानम्) (पियारुम्) पानकारकम् (अपादम्) पादेन्द्रियरहितम् (इन्द्र) सभेश (तवसा) बलेन। तव इति बलनामसु पठितम्॥ (निघं॰२.९) (जघन्थ) जहि॥६९॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः सूर्यवत्प्रतापिनो भवन्ति, तेऽजातशत्रवो जायन्ते॥६९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्यों को कैसा होना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थ
हे (पुरुहूत) बहुत विद्वानों से सत्कार को प्राप्त (इन्द्र) शत्रुओं को नष्ट करनेहारे सेनापति! जैसे सूर्य (सहदानुम) साथ देनेहारे (क्षियन्तम्) आकाश में निवास करने (कुणारुम्) शब्द करने वाले (अहस्तम्) हस्त से रहित (पियारुम्) पान करनेहारे (अपादम्) पादेन्द्रियरहित (अभि) (वर्द्धमानम्) सब ओर से बढ़े हुए (वृत्रम्) मेघ को (सम्, पिणक्) अच्छे प्रकार चूर्णीभूत करता है, वैसे हे (इन्द्र) सभापति! आप शत्रुओं को (तवसा) बल से (जघन्थ) मारा करो॥६९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान प्रतापयुक्त होते हैं, वे शत्रुरहित होते हैं॥६९॥
विषय
दुष्टों को दण्ड देने का विधान ।
भावार्थ
हे ( पुरुहूत) बहुत प्रजाजनों से सत्कार को प्राप्त करने हारे ! ( इन्द्र ) इन्द्र ! शत्रुओं के विदारक सेनापते ! ( सहदानुम् ) बल से प्रजाओं का खण्डन या नाश करने वाले या अपने सहवासी का नाश करने वाले, ( क्षियन्तम् ) समीप बसे, समीप बसे, ( कुणारुम् ) कुत्सित वचन बोलने वाले दुष्ट पुरुष को तू ( अहस्तम् ) बे-हाथ का, निहत्था, निःशस्त्र करके ( संपिणक) अच्छी प्रकार कुचल डाल । जिससे वह समीप के लोगों को हानि न पहुँचा सके और (वृत्रम् ) घेरनेवाले, ( पियारुम् ) मद्यपी अथवा हिंसाकारी (अभिवर्धमानम् ) सब ओर बढ़नेवाले दुष्ट पुरुष को ( अपादम् ) बे-पांव का लंगड़ा करके (तबसा) अपने बल से (जघन्थ) विनष्ट कर। जिससे वह शक्ति में बढ़कर प्रजाओं का नाश न करे ।
टिप्पणी
६८–७५—वार्त्रहत्याय सप्तर्चमिन्द्रोऽपश्यत् । चित्याग्निदेवताकम् ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
इन्द्रो विश्वामित्रश्च ऋषी । इन्द्रो देवता । आर्षी त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
वृत्र
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार जीव प्रभु के नाम का आवर्तन करते हुए कहता है कि हे (इन्द्र) = इन्द्रियों की विजय करानेवाले प्रभो! (सहदानुम्) = [दाप् लवने] बल का लवन [छेदन] करनेवाले, (क्षियन्तम्) = बल के नाश से हमारा नाश करनेवाले (कुणारुम्) = [कणयति = रोदयति ] दुर्गति के द्वारा रोदन करानेवाले और अन्त में (पियारुम्) = [पियतिहिंसाकर्मा] सब दैवी वृत्तियों को समाप्त कर देनेवाले (वर्द्धमानम्) = निरन्तर बढ़ते हुए (वृत्रम्) = इस ज्ञान के आवरक कामरूप वृत्र का हे पुरुहूत पालन व पूरण करनेवाली पुकारवाले प्रभो! आप (अहस्तम्) = हस्तरहित करके - हननशक्तिशून्य करके (संपिणक्) = पीस डालते हैं तथा (अपादम्) = पादों व गति से शून्य करके (तवसा) = बल के द्वारा (अभिजघन्थ) = सम्यक् समाप्त कर देते हैं । २. यह वासना ज्ञान पर परदा डालनेवाली होने से 'वृत्र' है। यह हमारे बल का छेदन कर देने से 'सहदानु' है! क्षयकारिणी होने से 'क्षियन्' है। अन्त में बुरी भाँति रुलानेवाली होने से 'कुणारुम्' है। सब दैवी वृत्तियों को समाप्त कर देने से यह 'पियारु' है। सदा बढ़ने व फैलनेवाली होने से 'वर्धमान' है। ३. प्रभु के नाम का स्मरण हममें बल उत्पन्न करता है, और उस तवस्-बल से इस वृत्र की हननशक्ति को समाप्त कर देता है, इस वृत्र को 'अहस्त' कर देता है । [ हन् से हस्त = Hand ] । प्रभु के नाम-स्मरण से यह वासना 'अपाद'गतिशून्य हो जाती है, मानो इसके पाँव ही नहीं रहते। ४. इस प्रकार वे प्रभु सचमुच 'इन्द्र' हैं, हमारे इन कामादि शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले हैं। वे प्रभु 'पुरुहूत' हैं, उनको पुकारना हमारा पालन व पूरण करता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु नाम-स्मरण से हमारी वासना हाथ-पाँव से रहित होकर विनष्ट हो जाए। वासना हमारा हनन करनेवाली न हो, हमारे हृदयक्षेत्र से उसकी चहल-पहल दूर चली जाए।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे सूर्याप्रमाणे पराक्रमी असतात ती शत्रूरहित असतात.
विषय
माणसांनी कसे असावे, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - प्रजाजन म्हणत आहेत (पुरुहूत) अनेक विद्वानांद्वारे सत्कृत होणार्या (इन्द्र) आणि शत्रूंचा नाश करणार्या हे सेनापती, ज्याप्रमाणे सूर्य (सहदानुम्) त्याला साथ देणार्या वा त्याच्यासह प्राणिमात्राना जलाचे दान करणार्या मेघाला ध्वस्त करतो, तसेच सूर्य (क्षियन्तम्) आकाशात निवास करणार्या (कुणारुम्) गडगडाट करणार्या (अहस्तम्) हात नसतांनाही कर्म करणार्या (पियारूम्) जल पिणार्या (अपादम्) पाय नसणार्या आणि (अभि) (वर्द्धमानम्) सर्व दिशांनी प्रसार पावणार्या (मेघम्) मेघसमूहाला (से पिणक्) पूर्णपणे ध्वस्त वा छिन्न भिन्न करतो, तद्वत हे (इन्द्र) सभापती, आपणही (तवसा) शक्तीद्वारा शत्रूला (जघन्थ) नष्ट करीत रहा ॥69॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा जे मनुष्य सूर्याप्रमाणे प्रतापयुक्त असतात, ते शत्रुशून्य होतात. अर्थात जगात त्यांच्या कुणी शत्रू जीवित राहत नाही. ॥69॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O Commander, much invoked, kill thou the foes with thy strength, as the sun slays its companion the advancing cloud, that moves in the atmosphere, roars, is without hands, imbibes water and is without feet.
Meaning
Indra, lord of lightning power, disarm, wither and crush the rival negative forces, lurking within, mischievous, growing, vociferous, and like the cloud, withholding the waters of progress. Indra, blazing with the thunderbolt like the sun, break up the cloud and destroy the mischief with your might.
Translation
O resplendent one, invoked by the multitude, may you crush the strength- arousing enemy, who moves forward shouting abuses, after disarming him. May you, O resplendent one, slay the evil foe, that waxes in all spheres and causes injury (to the enlightened ones), by making him footless. (1)
Notes
Sahadānum, सहो बलं ददाति य: तम्, to one who arouses our strength, i. e. the enemy. Kṣiyantam, आगच्छंतं, coming close or coming forward. Kuṇārum, क्वणति दुर्वचनो वदति य: तं , to one, who shouts abuses. Piyārum, to one that causes injury; violent. Ahastam, having disarmed him. Apādam, making him footless, i. e. giving him no chance to run away. Tavasā,बलेन, by force.
बंगाली (1)
विषय
পুনর্জনৈঃ কথম্ভবিতব্যমিত্যুপদিশ্যতে ॥
পুনঃ মনুষ্যদিগকে কেমন হওয়া উচিত এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (পুরুহূত) বহু বিদ্বান্ দ্বারা সৎকার প্রাপ্ত (ইন্দ্র) শত্রুদিগের নাশকারী সেনাপতি! যেমন সূর্য্য (সহদানুম্) সঙ্গ দাতা (ক্ষিয়ন্তাম্) আকাশে নিবাসকারী (কুণারুম্) শব্দকারী (অহস্তম্) হস্তরহিত (পিয়ারুম্) পানকারী (অপাদম্) পাদেন্দ্রিয়রহিত (অভি) (বর্দ্ধমানম্( সব দিক দিয়া বৃদ্ধি প্রাপ্ত (বৃত্রম্) মেঘকে (সং, পিনক্) উত্তম প্রকার চূর্ণীভূত করে সেইরূপ হে (ইন্দ্র) সভাপতি! আপনি শত্রুদিগকে (তবসা) শক্তি দ্বারা (জঘন্থ) বধ করুন ॥ ৬ঌ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে সব মনুষ্য সূর্য্য সমান প্রতাপযুক্ত হয় তাহারা শত্রুরহিত হয় ॥ ৬ঌ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
স॒হদা॑নুং পুরুহূত ক্ষি॒য়ন্ত॑মহ॒স্তমি॑ন্দ্র॒ সং পি॑ণ॒ক্ কুণা॑রুম্ ।
অ॒ভি বৃ॒ত্রং বর্দ্ধ॑মানং॒ পিয়া॑রুম॒পাদ॑মিন্দ্র ত॒বসা॑ জঘন্থ ॥ ৬ঌ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সহদানুমিত্যস্যেন্দ্রবিশ্বামিত্রাবৃষী । ইন্দ্রো দেবতা । আর্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal