यजुर्वेद - अध्याय 20/ मन्त्र 79
ऋषिः - विदर्भिर्ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - भुरिक् पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
48
अहा॑व्यग्ने ह॒विरा॒स्ये ते स्रु॒चीव घृ॒तं च॒म्वीव॒ सोमः॑।वा॒ज॒सनि॑ꣳ र॒यिम॒स्मे सु॒वीरं॑ प्रश॒स्तं धे॑हि य॒शसं॑ बृ॒हन्त॑म्॥७९॥
स्वर सहित पद पाठअहा॑वि। अ॒ग्ने॒। ह॒विः। आ॒स्ये᳖। ते॒। स्रु॒ची᳖वेति॑ स्रु॒चिऽइ॑व। घृ॒तम्। च॒म्वी᳖वेति॑ च॒म्वी᳖ऽइव। सोमः॑। वा॒ज॒सनि॒मिति॑ वाज॒ऽसनि॑म्। र॒यिम्। अ॒स्मे इत्य॒स्मे। सु॒वीर॒मिति॑ सु॒ऽवीर॑म्। प्र॒श॒स्तमिति॑ प्रश॒स्तम्। धे॒हि॒। य॒शस॑म्। बृ॒हन्त॑म् ॥७९ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अहाव्यग्ने हविरास्ये ते स्रुचीव घृतञ्चम्वीव सोमः । वाजसनिँ रयिमस्मे सुवीरम्प्रशस्तन्धेहि यशसम्बृहन्तम् ॥
स्वर रहित पद पाठ
अहावि। अग्ने। हविः। आस्ये। ते। स्रुचीवेति स्रुचिऽइव। घृतम्। चम्वीवेति चम्वीऽइव। सोमः। वाजसनिमिति वाजऽसनिम्। रयिम्। अस्मे इत्यस्मे। सुवीरमिति सुऽवीरम्। प्रशस्तमिति प्रशस्तम्। धेहि। यशसम्। बृहन्तम्॥७९॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे अग्ने विद्वन्! येन त्वया सोमो हविस्त आस्ये घृतं स्रुचीव चम्वीव हविरहावि, स त्वमस्मे प्रशस्तं सुवीरं वाजसनिं यशसं बृहन्तं रयिं धेहि॥७९॥
पदार्थः
(अहावि) हूयते (अग्ने) विद्वन् (हविः) होतुमर्हम् (आस्ये) मुखे (ते) तव (स्रुचीव) यथा स्रुङ्मुखे (घृतम्) आज्यम् (चम्वीव) यथा चम्वौ यज्ञपात्रे (सोमः) ऐश्वर्यसम्पन्नः (वाजसनिम्) वाजस्य सनिर्विभागो यस्य तस्मिन् (रयिम्) राज्यश्रियम् (अस्मे) अस्मासु (सुवीरम्) शोभना वीरा यस्मात् तम् (प्रशस्तम्) उत्कृष्टम् (धेहि) (यशसम्) कीर्तिकरम् (बृहन्तम्) महान्तम्॥७९॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। गृहस्थैस्तेषामेव भोजनादिना सत्कारः कर्त्तव्यो येऽध्यापनोदेशसुकर्मानुष्ठानै- र्जगति बलवीर्यकीर्त्तिधनविज्ञानानि वर्द्धयेयुः॥७९॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (अग्ने) उत्तम विद्यायुक्त पुरुष! जिस तूने (सोमः) ऐश्वर्ययुक्त (हविः) होम करने योग्य वस्तु (ते) तेरे (आस्ये) मुख में (घृतम्) (स्रुचीव) जैसे घृत स्रुच् के मुख में और (चम्वीव) जैसे यज्ञ के पात्र में होम के योग्य वस्तु वैसे (अहावि) होमा है, वह तू (अस्मे) हम लोगों में (प्रशस्तम्) बहुत उत्तम (सुवीरम्) अच्छे वीर पुरुषों के उपयोगी और (वाजसनिम्) अन्न, विज्ञान आदि गुणों का विभाग (यशसम्) कीर्त्ति करनेहारी (बृहन्तम्) बड़ी (रयिम्) राज्यलक्ष्मी को (धेहि) धारण कर॥७९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। गृहस्थ पुरुषों को चाहिये कि उन्हीं का भोजन आदि से सत्कार करें, जो लोग पढ़ाना, उपदेश और अच्छे कर्मों के अनुष्ठान से जगत् में बल, पराक्रम, यश, धन और विज्ञान को बढ़ावें॥७९॥
विषय
उसके कर्त्तव्य ।
भावार्थ
हे (अग्ने) अग्ने ! तेजस्विन् ! सर्वप्रकाशक ! (ते) तेरे (आस्ये) शत्रु के उखाड़ फेंकने वाले बल के निमित्त ( हविः ) ग्रहण करने योग्य समस्त राष्ट्र (स्रुचि घृतम् इव) स्रुवे में घृत के समान और (चम्वि ) यज्ञ- पात्र में (सोमः इव) सोम के समान, अथवा ( चम्वि ) सेना के ऊपर (सोमः) उसके आज्ञापक के समान, अथवा (चम्वि सोमः) पृथ्वी पर राजा के समान ( अहावि ) प्रदान किया या धरा जाता है वह तू (अस्मे ) हम पर ( वाजसनिम् ) संग्राम द्वारा प्राप्त होने योग्य अथवा बहुत जन और ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाले ( रयिम् ) ऐश्वर्य को ( धेहि ) दे और हम पर (प्रशस्तं सुवीरम् ) उत्तम, बढ़िया सुस्वभाव के वीर ( यशसम् ) यशस्वी ( बृहन्तम् ) बड़े पुरुष को ( धेहि ) स्थापित कर ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्निर्देवता । भुरिक् पंक्तिः । पंचमः ॥
विषय
रयि-वीर्य-यश
पदार्थ
१. हे (अग्ने) = अग्निकुण्ड में आहुत अग्ने ! (ते आस्ये) = तेरे मुख में (हविः अहावि) = मुझ से घृत की आहुति दी जाती है। (स्रुचि इव घृतम्) = जैसे चम्मच में घी तथा (चम्वि इव सोमः) = यज्ञपात्र में जिस प्रकार सोम होता है। हवन की तैयारी के साथ ही 'हवि, घृत व सोम' आदि को एकत्र करता है और अग्नि से कहता है कि 'चम्मच में घृत है,यज्ञपात्र में सोम है और तेरे मुख में हवि है'। चम्मच में घृत सदा रहता है, चमू नामक यज्ञपात्र में सोम, इसी प्रकार तेरे मुख में मुझसे नित्य हवि डाली जाती है। मेरी यह होम की प्रक्रिया सतत रहती है, विञ्छिन्न नहीं होती । २. हे अग्ने ! इस प्रकार आहुत हुआ हुआ तू [क] (वाजसनिम्) = अन्नादि आवश्यक सामग्री को प्राप्त करानेवाले (रयिम्) = धन को, [ख] (प्रशस्तं सुवीरम्) = प्रशंसा के योग्य उत्तम शक्ति को, जिस शक्ति से मेरी प्रशंसा ही प्रशंसा होती है, उस शक्ति को तथा [ग] (बृहन्तं यशसम्) = सदा बढ़ते हुए यश को अस्मे हमारे लिए धेहि धारण कर। अग्निहोत्र से वर्षा होकर अन्नादि की समृद्धि से धन बढ़ता है, रोगकृमियों के संहार से नीरोगता द्वारा बल बढ़ता है और त्यागवृत्ति की भावना बढ़ने से जीवन यशस्वी बनता है।
भावार्थ
भावार्थ- सतत होम के तीन लाभ हैं- १. समय पर वर्षा होने से अन्नादि के ठीक उत्पादन से धन की वृद्धि २. वायुशुद्धि व कृमिसंहार द्वारा नीरोगता से शक्ति की वृद्धि ३. तथा त्याग - भावना के वर्धन से यश की वृद्धि ।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. गृहस्थांनी अशा लोकांचाच सन्मान करावा व त्यांना भोजन द्यावे, जे लोक अध्यापन व उपदेश आणि चांगल्या कर्माचे अनुष्ठान करून जगात बल, पराक्रम, यश, धन व विज्ञान यांची वृद्धी करतात.
विषय
पुन्हा त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (अग्ने) उत्तम विद्यासंपन्न मनुष्य (यज्ञकर्ता श्रेष्ठ पुरूष) आपण (सोमः) ऐश्वर्यशाली, गुणवान (हविः) होम करण्यास योग्य असा जो पदार्थ (अहावि) होमकुंडामधे टाकला आहे, तो (ते) आपल्या (आस्ये) मुखामधे ज्याप्रमाणे (घृतम्) घृत (शोभते) अथवा (स्रुचीव) ज्याप्रमाणे स्रुचा (विशिष्ट आकाराचा यज्ञासाठी उपयोगात आणला जाणारा पात्र, चमचा) मधे घृत शोभते अथवा (चम्वीव) अन्य यज्ञपात्रात होम करण्यास उपयुक्त असे पदार्थ उत्तम दिसतात (त्याप्रमाणे तो आहुत पदार्थ यज्ञ कुंडात टाकल्यानंतर सुशोभित होतो) हे यज्ञकर्ता विद्वान मनुष्य, आपण (अस्मे) आम्हा (गृहस्थ जनांकरिता) (प्रशस्तम्) अत्युत्तम् (सुवीरम्) वीरांसाठी उपयुक्त आणि (वाजसनिम्) अन्नधान्य, (त्यांविषयीचे शास्त्र व तंत्र) (असे तयार करा की ज्यायोगे ते धान्यादी पदार्थ) आम्हासाठी (यशसम्) कीर्ती देणारे आणि (रयिम्) राज्यलक्ष्मी वा धनसंपत्ती (धेहि) होतील (आपण त्या वस्तूचे उपयोग अशाप्रकारे करा की ते सर्वांकरिता उपयोगी ठरतील) ॥79॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात उपमा अलंकार आहे. गृहस्थ जनांसाठी हेच उचित कर्म आहे की त्यांनी त्या लोकांचा भोजन (निवास, सेवा आदी) द्वारा सत्कार - (आतिथ्य, सेवा आदी कार्ये) करावीत की जे त्यांना अध्यापन करतात, सदुपदेश देतात आणि (यज्ञादी) सत्कर्मांद्वारे या जगात बल, पराक्रम, कीर्ती, धन आणि विज्ञान, यांची वृद्धी करतात ॥79॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O learned person, within thy mouth is poured the offering, as Soma into cup, ghee into ladle. Vouchsafe us wealth, strength-winning, blest with heroes, and wealth lofty, praised by men, and full of splendour.
Meaning
Agni, rich libations of havi, fragrant materials as ghee in the ladle and soma in the cup are offered into your fiery mouth. We pray create for us and bless us with plenty of food and victorious generosity, noble war¬ like children, wealth and prosperity and resounding honour of universal order.
Translation
О fire divine, I have poured oblations in your mouth as the purified butter is poured into ladle and the cure-juice into mug. May you grant us wealth that brings power; bless us with good sons, and bestow upon us good and great fame. (1)
Notes
Śruci, in the ladle, or spoon. Camvi, चम्वां, in the mug or cup. Vajasanim rayim, wealth that brings power.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে (অগ্নে) উত্তম বিদ্যাযুক্ত পুরুষ ! যে তুমি (সোমঃ) ঐশ্বর্য্যযুক্ত (হবিঃ) হোম করিবার যোগ্য বস্তু (তে) তোমার (আস্যে) মুখে (ঘৃতম্ স্রুচীব) যেমন ঘৃত স্রুচের মুখে এবং (চম্বীব) যেমন যজ্ঞের পাত্রে হোমের যোগ্য বস্তু সেইরূপ (অহাবি) হোম করিয়াছ সেই তুমি (অস্মে) আমাদের মধ্যে (প্রশস্তম্) বহু উত্তম (সুবীরম্) উত্তম বীর পুরুষদের উপযোগী এবং (বাজসনিম্) অন্ন বিজ্ঞানাদি গুণগুলির বিভাগ (য়শসম্) কীর্ত্তিকারিণী (বৃহন্তম্) বৃহৎ (রয়িম) রাজ্যলক্ষ্মীকে (ধেহি) ধারণ কর ॥ ৭ঌ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমালঙ্কার আছে । গৃহস্থ পুরুষদের উচিত যে, তাহাদেরকে ভোজনাদি দ্বারা সৎকার করুক, যাহারা অধ্যাপন, উপদেশ এবং শুভ কর্মের অনুষ্ঠান দ্বারা জগতে বল, পরাক্রম, যশ, ধনও বিজ্ঞানের বৃদ্ধি করে ॥ ৭ঌ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
অহা॑ব্যগ্নে হ॒বিরা॒স্যে᳖ তে স্রু॒চী᳖ব ঘৃ॒তং চ॒ম্বী᳖ব॒ সোমঃ॑ ।
বা॒জ॒সনি॑ꣳ র॒য়িম॒স্মে সু॒বীরং॑ প্রশ॒স্তং ধে॑হি য়॒শসং॑ বৃ॒হন্ত॑ম্ ॥ ৭ঌ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
অহাবীত্যস্য বিদর্ভির্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ভুরিক্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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