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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 52
    ऋषिः - गोतम ऋषिः देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - विराट् पङ्क्ति, स्वरः - पञ्चमः
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    सु॒स॒न्दृशं॑ त्वा व॒यं मघ॑वन् वन्दिषी॒महि॑। प्र नू॒नं पू॒र्णब॑न्धुर स्तु॒तो या॑सि॒ वशाँ॒२ऽअनु॒ योजा॒ न्विन्द्र ते॒ हरी॑॥५२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सु॒सं॒दृश॒मिति॑ सुऽसं॒दृश॑म्। त्वा॒। व॒यम्। मघ॑व॒न्निति॒ मघ॑ऽवन्। व॒न्दि॒षी॒महि॑। प्र। नू॒नम्। पू॒र्णब॑न्धुर॒ इति॑ पू॒र्णऽब॑न्धुरः। स्तु॒तः। या॒सि॒। वशा॑न्। अनु॑। योज॑। नु। इ॒न्द्र॒। ते॒। हरी॒ऽइति॒ हरी॑ ॥५२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सुसन्दृशं त्वा वयम्मघवन्वन्दिषीमहि । प्र नूनम्पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सुसंदृशमिति सुऽसंदृशम्। त्वा। वयम्। मघवन्निति मघऽवन्। वन्दिषीमहि। प्र। नूनम्। पूर्णबन्धुर इति पूर्णऽबन्धुरः। स्तुतः। यासि। वशान्। अनु। योज। नु। इन्द्र। ते। हरीऽइति हरी॥५२॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 52
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    स इन्द्रः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे मघवन्निन्द्र! वयं सुसंदृशं त्वा त्वां वन्दिषीमहि अस्माभिः स्तुतः पूर्णबन्धुरः संस्त्वं वशान् कामान् यासि प्रापयसि ते तव हरी त्वमनु प्रयोजेत्येकः॥१॥५२॥ वयं सुसंदृशं मघवन् मघवन्तं पूर्णबन्धुरं त्वा तमिमं सूर्यलोकं नूनं वन्दिषीमहि। स्तुतः प्रकाशितगुणः सन्नयं वशानुत्कृष्टव्यवहारसाधकान् कामान् यासि प्रापयति। हे विद्वंस्त्वं यथा तेऽस्येन्द्रस्य हरी अस्मिन् जगति युङ्क्तः, तथैव विद्यासिद्धिकराण्यनुप्रयोजेति द्वितीयः॥२॥५२॥

    पदार्थः

    (सुसंदृशम्) यः सुष्ठु पश्यति दर्शयति वा तम् (त्वा) त्वां तं वा (वयम्) मनुष्याः (मघवन्) परमोत्कृष्टधनयुक्तेश्वर! धनप्राप्तिहेतुर्वा (वन्दिषीमहि) नमेम स्तुवीमहि (प्र) प्रकृष्टार्थे (नूनम्) निश्चयार्थे (पूर्णबन्धुरः) यः पूर्णश्चासौ बन्धुरश्च सः। पूर्णस्य जगतो बन्धुरो बन्धनहेतुर्वा (स्तुतः) स्तुत्या लक्षितः (यासि) प्राप्नोषि प्रापयति वा। अत्र पक्षे व्यत्ययः (वशान्) कामयमानान् पदार्थान् (अनु) पश्चात् (योज) योजय युङ्क्ते वा। अत्रापि पूर्ववद् व्यत्ययदीर्घत्वे। (नु) उपमार्थे (इन्द्र) जगदीश्वर सूर्यस्य वा (ते) तवास्य वा (हरी) बलपराक्रमौ धारणाकर्षणे वा। अयं मन्त्रः (शत॰२.६.१.३८) व्याख्यातः॥५२॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषोपमालङ्कारौ। मनुष्यैः सर्वजगद्धितकारी जगदीश्वरो वन्दितव्यो नैवेतरः। यथा सूर्यो मूर्तद्रव्याणि प्रकाशयति तथोपासितः सोऽपि भक्तजनात्मसु विज्ञानोत्पादनेन सर्वान् सत्यव्यवहारान् प्रकाशयति तस्मान्नैवेश्वरं विहाय कस्यचिदन्यस्योपासनं कर्तव्यमिति॥५२॥

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    विषयः

    स इन्द्रः कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    सपदार्थान्वयः

                                                                           [ईश्वरपक्षः]

    हे मघवन् ! परमोत्कृष्ट धनयुक्तेश्वर ! इन्द्र ! जगदीश्वर ! वयं मनुष्याः ससंदृशं यः सुष्ठु पश्यति तं त्वां [नूनं] निश्चयेन वन्दिषीमहि नमेम स्तुवीमहि ।

    अस्माभिः स्तुतः स्तुत्या लक्षितः पूर्णबन्धुरः यः पूर्णश्चासौ बन्धुरश्च सः संस्त्वं [नु] यथा वशान्=कामान् कामयमानान् पदार्थान् [प्र] यासि प्रापयसि (प्रकृष्टं प्राप्नोषि) । ते=तव हरी बलपराक्रमौ त्वम् [अनुयोज]= अनुप्रयोजश्चत्=योजय । इत्येकः ।।

    [सूर्यपक्षः]

     वयं मनुष्याः सुसंदृशं सुष्ठु दर्शयति तं मघवन्=मघवन्तं धनप्राप्तिहेतुं [पूर्ण बन्धुरः]=पूर्णबन्धुरं पूर्णस्य जगतो बन्धुरं=बन्धनहेतुं त्वा=तमिमं [इन्द्र ]=सूर्यलोकं नूनं निश्चयेन वन्दिषीमहि स्तुवीमहि ।

    स्तुतः=प्रकाशितगुणः स्तुत्या लक्षितः सन्नयं वशान्=उत्कृष्टव्यवहारसाधकान् कामान् कामयमानान् पदार्थान् [प्र] यासि=प्रापयति (प्रकृष्टं प्रापयति ) ।

    हे विद्वंस्त्वं [नु]=यथा  ते=अस्येन्द्रस्य हरी धारणाकर्षणे अस्मिन् जगति युङ्क्तः, तथैव विद्यासिद्धिक- राण्यनुप्रयोगेति द्वितीयः ।।३ ।५२ ।।

    [ हे......इन्द्र ! वयं सुसंदृशं  त्वा=त्वां [नूनं ] वन्दिषीमहि]

    पदार्थः

    (सुसंदृशम्) यः सुष्ठु पश्यति दर्शयति वा तम् (त्वा) त्वां तं वा (वयम्) मनुष्याः (मघवन्) परमोत्कृष्टधनयुक्तेश्वर, धनप्राप्तिहेतुर्वा (वन्दिषीमहि) नमेम=स्तुवीमहि (प्र) प्रकृष्टार्थे (नूनम् ) निश्चयार्थे (पूर्णबन्धुरः) यः पूर्णश्चासौ बन्धुरश्च सः, पूर्णस्य जगतो बन्धुरो=बन्धनहेतुर्वा (स्तुतः) स्तुत्या लक्षितः (यासि) प्राप्नोषि प्रापयति वा । अत्र पक्षे व्यत्ययः (वशान्) कामयमानान् पदार्थान् (अनु) पश्चात् (योज) योजय युङ्क्ते वा। त्रापि पूर्ववद् व्यत्ययदीर्घत्वे (नु) उपमार्थे (इन्द्र) जगदीश्वर सूर्यस्य वा (ते) तवास्य वा (हरी) बलपराक्रमौ धारणाकर्षणे वा ॥ अयं मंत्रः शत० २ ।६ ।१ ।३८ व्याख्यातः॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषोपमालङ्कारौ ॥ मनुष्यैः सर्वजगद्धितकारी जगदीश्वरो वन्दितव्यो नैवेतरः ।

    यथा सूर्यो मूर्तद्रव्याणि प्रकाशयति तथोपासितः सोपि भक्तजनात्मसु विज्ञानोत्पादनेन सर्वान् सत्यव्यवहारान् प्रकाशयति तस्मान्नैश्वरं विहाय कस्यचिदन्यस्योपासनं कर्त्तव्यमिति ।। ३ ।५२।।

    प्रमाणार्थ

    (यासि) प्राप्नोषि, प्रापयति वा । यहाँ पक्ष में व्यत्यय है। (योजा) योजय युङ्क्ते वा । यहाँ भी पूर्ववत् व्यत्यय और दीर्घ है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ ।६ ।१ । ३८) में की गई है । ३ । ५२ ॥

    [ईश्वरपक्षः]

    भावार्थ पदार्थः

    भा० पदार्थ:--सुसंदृशम्=मूर्तद्रव्यप्रकाशकम् [सूर्यम्], भक्तजनात्मसु विज्ञानोत्पादनेन सर्वसत्यव्यवहार प्रकाशकम् (ईश्वरम्) ।

    विशेषः

    गोतमः ।इन्द्रः=इन्द्रः सूर्यश्च ॥ विराट् पंक्तिः । पंचमः ।।

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    हिन्दी (4)

    विषय

    वह इन्द्र कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे (मघवन्) उत्तम-उत्तम विद्यादि धनयुक्त (इन्द्र) परमात्मन्! (वयम्) हम लोग (सुसंदृशम्) अच्छे प्रकार व्यवहारों के देखने वाले (त्वा) आपकी (नूनम्) निश्चय करके (वन्दिषीमहि) स्तुति करें तथा हम लोगों से (स्तुतः) स्तुति किये हुए आप (वशान्) इच्छा किये हुए पदार्थों को (यासि) प्राप्त कराते हो और (ते) अपने (हरी) बल पराक्रमों को आप (अनुप्रयोज) हम लोगों के सहाय के अर्थ युक्त कीजिये॥१॥५२॥ (वयम्) हम लोग (सुसंदृशम्) अच्छे प्रकार पदार्थों को दिखाने वा (मघवन्) धन को प्राप्त कराने तथा (पूर्णबन्धुरः) सब जगत् के बन्धन के हेतु (त्वा) उस सूर्यलोक की (नूनम्) निश्चय करके (वन्दिषीमहि) स्तुति अर्थात् इसके गुण प्रकाश करते हैं। (स्तुतः) स्तुति किया हुआ यह हम लोगों को (वशान्) उत्तम-उत्तम व्यवहारों को सिद्धि कराने वाली कामनाओं को (यासि) प्राप्त कराता है (नु) जैसे (ते) इस सूर्य के (हरी) धारण-आकर्षण गुण जगत् में युक्त होते हैं, वैसे आप हम लोगों को विद्या की सिद्धि करने वाले गुणों को (अनुप्रयोज) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये॥२॥५२॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को सब जगत् के हित करने वाले जगदीश्वर ही की स्तुति करनी और किसी की न करनी चाहिये, क्योंकि जैसे सूर्यलोक सब मूर्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करता है, वैसे उपासना किया हुआ ईश्वर भी भक्तजनों के आत्माओं में विज्ञान को उत्पन्न करने से सब सत्यव्यवहारों को प्रकाशित करता है। इससे ईश्वर को छोड़कर और किसी की उपासना कभी न करनी चाहिये॥५२॥

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    विषय

    गोतम का प्रभुस्तवन

    पदार्थ

    १. पिछले मन्त्र के शब्दों के अनुसार जब गोतम प्रभु का स्तवन करता है तब कहता है कि हे ( मघवन् ) = [ मघ = मख ] इस सृष्टिरूप यज्ञ के रचनेवाले प्रभो! ( सुसन्दृशम् ) = अत्यन्त सुन्दर दर्शनवाले ( त्वा ) = आपकी ( वयम् ) = हम ( वन्दिषीमहि ) = वन्दना करते हैं। प्रभु इस सृष्टि के रचयिता तो हैं ही, यह सृष्टि इस यज्ञरूप प्रभु का एक यज्ञ भी है। प्रभु ने इसे प्रकृति से बनाया और जीव की उन्नति के लिए बनाया, परन्तु जब हम उस प्रभु को प्रकृति व जीव से अलग सोचने का प्रयत्न करते हैं तो इतना ही कह सकते हैं कि वे अत्यन्त सुन्दर हैं, ‘सुसन्दृश’ हैं। प्रभु का दर्शन अत्यन्त रमणीय है, आसेचनक है, वहाँ पहुँचकर मन ऊबता नहीं। 

    २. हे ( पूर्णबन्धुर ) = पूर्ण है लोक-लोकान्तरों का बन्धन जिसका ऐसे प्रभो! आप ( स्तुतः ) = स्तुति किये जाने पर ( वशान् अनुयासि ) = अपने मन को वश में करनेवालों को अनुकूलता से प्राप्त होते हैं। जितना-जितना हम अपने मन को वश में करते हैं, उतना- उतना हम आपको प्राप्त करने के पात्र बनते जाते हैं। आप पूर्णबन्धुर है। वृष्टि की क्रिया में ही किस प्रकार तीनों लोक परस्पर सम्बद्ध हैं। द्युलोक के सूर्य से पृथिवीलोक का जल वाष्पीभूत होता है और उन वाष्पों से अन्तरिक्षलोक में मेघों का निर्माण होता है। 

    ३. इस पूर्णबन्धुर प्रभु से गोतम कहता है कि हे ( इन्द्र ) = मेरी इन्द्रियों के अधिष्ठाता प्रभो! आप इन ( ते हरी ) = अपने इन्द्रियरूप घोड़ों को ( योज नु ) = निश्चय से ज्ञानयज्ञों में जोते रखिए। ये मेरी इन्द्रियाँ कर्मों में लगी रहेंगी तभी तो ‘पवित्र’ बनी रहेंगी।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम अपने में अत्यन्त सुन्दर प्रभु की स्तुति करते हैं। वे प्रभु पूर्णबन्धुर हैं। इस सृष्टि के लोकों को परस्पर बाँधनेवाले हैं, वे स्तोता को ही प्राप्त होते हैं।

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    विषय

    वह इन्द्र कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।

    भाषार्थ

    हे (मघवन्) अत्यन्त उत्तम धन से युक्त (इन्द्र) जगदीश्वर! (वयम्) हम लोग (सुसन्दृशम्) अच्छे प्रकार से देखने वाले (त्वा) आपकी (नूनम्) निश्चय से (वन्दिषीमहि) अभिवादन और स्तुति करते हैं।

      हमसे (स्तुतः) स्तुति किये हुये (पूर्णबन्धुरः) पूर्ण स्नेह से भरपूर होकर आप [नु]=जैसे (वशान्) अभीष्ट पदार्थों को (यासि) प्राप्त कराते हो, प्रदान करते हो, वैसे ही कृपा करके (ते) आप अपने (हरी) बल पराक्रम को (अनुयोज) हम लोगों की सहायता में लगाओ । यह मन्त्र का पहला अर्थ है ।

      (वयम्) हम लोग ( सुसन्दृशम् ) अच्छे प्रकार दिखाने वाला (मघवन्) धनों के प्रापक (पूर्ण बन्धुरः) सम्पूर्ण जगत् को बान्धने वाले (त्वा) इस (इन्द्र) सूर्य लोक की (नूनम्) दृढ़ता से (वन्दिषीमहि ) स्तुति करते हैं ।

      (स्तुतः) सूर्य के गुणों को प्रकाशित करने से यह (वशान्) उत्तम व्यवहारों को सिद्ध करने वाली कामनाओं को एवं कमनीय पदार्थों को (यासि) प्राप्त कराता है।

     हे विद्वन् ! आप (नु) जैसे (ते) इस सूर्य के (हरी) धारण और आकर्षण शक्ति इस जगत् में उपयोगी हैं, वैसे ही विद्या के सिद्धिकारक गुणों को (अनुप्रयोज) प्रयोग में लाओ ।। ३ । ५२ ।।

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेष और उपमा अलङ्कार हैं। सब मनुष्य सब जगत् के हितकारी जगदीश्वर का अभिवादन और स्तुति करें, दूसरे की नहीं।

    जैसे सूर्य मूर्त द्रव्यों को प्रकाशित करता है, वैसे ही उपासना से वह जगदीश्वर भी भक्त जनों की आत्माओं में विज्ञान उत्पन्न करके सब सत्य व्यवहारों को प्रकाशित करता है, इसलिये ईश्वर को छोड़ कर किसी दूसरे की उपासना न करें ॥ ३ । ५२ ।।

    प्रमाणार्थ

    (यासि) प्राप्नोषि, प्रापयति वा । यहाँ पक्ष में व्यत्यय है। (योजा) योजय युङ्क्ते वा । यहाँ भी पूर्ववत् व्यत्यय और दीर्घ है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ६ । १ । ३८) में की गई है । ३ । ५२ ॥

    भाष्यसार

    १. इन्द्र (ईश्वर) कैसा है—इन्द्र अर्थात् ईश्वर परम उत्कृष्ट धन से युक्त, सब जगत् का हितकारी, भक्त जनों की आत्माओं में विज्ञान उत्पन्न करके सब सत्य व्यवहारों को प्रकाशित करने वाला है। इसलिये वह अभिवादन और स्तुति के योग्य है। स्तुति से वह उपासकों का पूर्ण बन्धु बनकर सब कमनीय पदार्थ प्रदान करता है तथा साथ-साथ बल और पराक्रम भी देता है। इसलिये ईश्वर को छोड़ कर अन्य कोई उपासनीय नहीं है ।

    २. इन्द्र (सूर्य) कैसा है— इन्द्र अर्थात् सूर्य मूर्त्त द्रव्यों का प्रकाशक, धन प्राप्ति का हेतु, सम्पूर्ण जगत् को बन्धन में रखने वाला है। स्तुति करने से अर्थात् सूर्य के गुणों को प्रकाशित करने से वह उत्तम व्यवहार को सिद्ध करने वाले कमनीय पदार्थों को प्राप्त करता है। यह धारण और आकर्षण शक्तियों से युक्त है।

    ३. अलंकार --इस मन्त्र में श्लेष और उपमा दो अलङ्कार हैं। श्लेष अलङ्कार होने से इन्द्र शब्द से ईश्वर और सूर्य अर्थ का ग्रहण किया जाता है। 'नु' पद मन्त्र में उपमा वाचक है तथा सूर्य से विद्वान् की उपमा की गई है और सूर्य से ईश्वर की भी उपमा की गई है इसलिये उपमा अलङ्कार है ।

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    विषय

    सर्वनिरीक्षक राजा का आदर।

    भावार्थ

    हे ( मघवन् ) ऐश्वर्यचन् ! ( सुसंदृशम् ) उत्तम रूप से सब को देखने हारे (त्वा) तुझको ( वयं ) हम ( वन्दिषीमहि ) अभिवादन करते हैं। तू ( पूर्णबन्धुरः ) पूर्ण रूप से सबका पालने हारा, एवं सबको व्यवस्था में रखने हारा होकर ( स्तुतः ) सबसे प्रशंसित होकर ( नूनम् ) निश्चय से ( वशान् अनु ) कामना योग्य समस्त पदार्थों को ( प्रयासि ) प्राप्त कर और हे ( इन्द्र ) राजन् ! तू अपने ( हरी ) रथ में अश्वों के समान दूरगामी एवं नाना पदार्थ प्राप्त कराने वाले बल पराक्रम दोनों को ( योज नु ) नियुक्त कर । अर्थात् जिस प्रकार रथ पर सब उपकरण लगा कर ही अपने घोड़े जोड़ता है, उसी प्रकार राष्ट्र में सब व्यवस्था करके अपने बल पराक्रम का प्रयोग कर । शत० २ । ६ । १ । ३३ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषि: । इन्द्रो देवता । विराट् पंक्तिः । पञ्चमः स्वरः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेष व उपमालंकार आहेत. माणसांनी सर्व जगाचे हित करणाऱ्या जगदीश्वराचीच स्तुती केली पाहिजे, इतरांची नव्हे. कारण सूर्य जसा सर्व पदार्थांना प्रकाशित करतो तशी उपासना केल्यावर परमेश्वर भक्तांच्या आत्म्यांमध्ये सत्य ज्ञानाचा प्रकाश करतो व त्याद्वारे सत्य व्यवहार प्रकट होतात यासाठी परमेश्वराला सोडून दुसऱ्या कुणाची उपासना करता कामा नये.

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    विषय

    तो, इन्द्र कसा आहे, यावषियी पुढील मंत्रात सांगितले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (या मंत्राचे दोन अर्थ आहेत-एक विद्वानाप्रत विनंती दुसरा-सूर्याचा महिमा)- (मधवन्) उत्तमोत्तम विद्या आदी धनांनी समृद्ध (इन्द्र) हे विद्वान महाशय, (वयम्) आम्ही (सुसद्दशम्) उत्तम प्रकारे कार्य-व्यवहार आदींचे निरीक्षण करणारे जे आपण, अशा (ते) आपली (नूनम्) अवश्यमेव (वंदिषीमहि) स्तुती करतो. आमच्याकडून (स्तुतः) स्तुती व प्रार्थना ऐकून आपण आम्हाला (मशान) ईप्सित पदार्थांचे दान करता. हे विद्वान व शूरवीर मनुष्या (ते) आपल्या (हरी) शक्ती आणि पराक्रमांचा उपयोग आपण (अनुप्रयोज) आमच्या सहाय्याकरिता अवश्य करा. ॥52॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात श्‍लेष आणि उपमा या दोन अलंकारांचा उपयोग केला आहे. मनुष्यांनी सर्व जगाचे हित करणार्‍या जगदीश्‍वराचीच स्तुती करावी, अन्य कोणाचीही करू नये. कारण असे की ज्याप्रमाणे सूर्यलोक सर्व आकारवान् पदार्थांना प्रकाशित करतो, (व त्याच्या प्रकाशामुळेच सर्व पदार्थ दिसतात) त्याप्रमाणे उपासकांची उपासना ऐकून परमेश्‍वर देखील भक्तजनांच्या अंतःकरणात विज्ञानाचा प्रकाश करतो आणि त्यामुळे सर्व सत्यव्यवहाराचा प्रकाश उद्वित होतो म्हणून ईश्‍वरा व्यतिरिक्त अन्य कोणाचीही उपासना कदापी करूं नये. ॥52॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    We revere Thee, O God of Bounty, Who art fair to see. Being praised by us, O best companion, Thou fulfillest all our desires. O Lord, yoke Thy vigour and prowess for us.

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    Meaning

    Lord of the world/President of the assembly. Indra, lord of all the wealth and power, brilliant and blissful to the eye, we sing songs of praise for you. Sung and celebrated, full of love and kindness, everything inbound with you, you proceed to us with all the gifts and blessings for us. Saddle your horses fast, Indra. Rise up, nation, with all your might and mind.

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    Translation

    O bountiful self, we praise you, since you look benignly on all. Thus praised by us, and fully equipped, may you ride on your chariot (һuman body). May you proceed on righteous path, and put your senses in control. (1)

    Notes

    Susandrk, one who looks benignly on all. Disimahi, we praise. Purnabandhura, equipped fully. Vaśan anu, along the right path.

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    बंगाली (1)

    विषय

    স ইন্দ্রঃ কীদৃশ ইত্যুপদিশ্যতে ॥
    সে ইন্দ্র কেমন, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (মঘবন্) উত্তম উত্তম বিদ্যাদি ধনযুক্ত (ইন্দ্র) পরমাত্মন্ । (বয়ম্) আমরা (সুসংদৃশম্) ভাল প্রকার ব্যবহার লক্ষ্যকারী (ত্বা) আপনাকে (নূনম) নিশ্চয় করিয়া (বন্দিষীমহি) স্তুতি করি তথা আমাদিগের হইতে (স্তুতঃ) স্তুত আপনি (বশান্) ইচ্ছিত পদার্থগুলিকে (য়াসি) প্রাপ্ত করান এবং (তে) নিজের (হরী) বল-পরাক্রমকে আপনি (অনুপ্রয়োজ) আমাদিগের সাহায্যে যুক্ত করুন ॥ ১ ॥ (বয়ম্) আমরা (সুসংদৃশম্) ভাল ভাবে পদার্থগুলি দেখাইবার বা (মঘবন্) ধন প্রাপ্ত করিবার তথা (পূর্ণবন্ধুরঃ) সকল জগতের বন্ধনের হেতু (ত্বা) সেই সূর্য্যলোকের (নূনম্) নিশ্চয় করিয়া (বন্দিষীমহি) স্তুতি অর্থাৎ ইহার গুণ প্রকাশ করিয়া (স্তুতঃ) স্তুত এই আমাদিগকে (বশান্) উত্তম-উত্তম ব্যবহার সিদ্ধি কারক কামনাগুলিকে (য়াসি) প্রাপ্ত করে (নু) যেমন (তে) এই সূর্য্যের (হরী) ধারণ আকর্ষণ গুণ জগতে যুক্ত হয় সেইরূপ আপনি আমাদিগকে বিদ্যা সিদ্ধিকারক গুণগুলিকে (অনুপ্রয়োজ) ভাল রকম প্রাপ্ত করুন ॥ ৫২ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে শ্লেষ ও উপমালঙ্কার আছে । মনুষ্যদিগকে সকল জগতের হিতকারী জগদীশ্বরেরই স্তুতি করা উচিত, অন্য কাহারও নহে কেননা যেমন সূর্য্যলোক সকল মূর্ত্তিমান দ্রব্যের প্রকাশ করে সেইরূপ উপাসনা কৃত ঈশ্বরও ভক্তগণের আত্মায় বিজ্ঞান উৎপন্ন করিয়া সব সত্যব্যবহারকে প্রকাশিত করে । সুতরাং ঈশ্বরকে ত্যাগ করিয়া অন্য কাহারও উপাসনা করা উচিত নহে ॥ ৫২ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    সু॒সং॒দৃশং॑ ত্বা ব॒য়ং মঘ॑বন্ বন্দিষী॒মহি॑ ।
    প্র নূ॒নং পূ॒র্ণব॑ন্ধুর স্তু॒তো য়া॑সি॒ বশাঁ॒২ऽঅনু॒ য়োজা॒ ন্বি᳖ন্দ্র তে॒ হরী॑ ॥ ৫২ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    সুসংদৃশমিত্যস্য গোতম ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । বিরাট্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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