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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 55
    ऋषिः - बन्धुर्ऋषिः देवता - मनो देवता छन्दः - निचृत् गायत्री, स्वरः - षड्जः
    124

    पुन॑र्नः पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु॒ दैव्यो॒ जनः॑। जी॒वं व्रात॑ꣳसचेमहि॥५५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पुनः॑। नः॒। पि॒त॒रः॒। मनः॑। ददा॑तु। दैव्यः॑। जनः॑। जी॒वम्। व्रा॑तम्। स॒चे॒म॒हि॒ ॥५५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवँ व्रातँ सचेमहि ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पुनः। नः। पितरः। मनः। ददातु। दैव्यः। जनः। जीवम्। व्रातम्। सचेमहि॥५५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 55
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    पुनर्मनः शब्देन बुद्धिरुपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे पितरो जनका विद्याप्रदाश्च भवच्छिक्षया दैव्यो जनो विद्वान् नोऽस्मभ्यं पुनः पुनर्मनोधारणावतीं बुद्धिं ददातु, येन वयं जीवं व्रातं सचेमहि समवेयाम॥५५॥

    पदार्थः

    (पुनः) अस्मिन् जन्मनि पुनर्जन्मनि वा (नः) अस्मभ्यम् (पितरः) पान्त्यन्नसुशिक्षाविद्यादानेन तत्सम्बुद्धौ (मनः) धारणावतीं बुद्धिम् (ददातु) प्रयच्छतु (दैव्यः) यो देवेषु विद्वत्सु जातो विद्वान्। अत्र देवाद्यञञौ (अष्टा॰४.१.८५) इति वार्तिकेन प्राग्दीव्यतीयान्तर्गते जातेऽर्थे यञ् प्रत्ययः। (जनः) यो विद्याधर्माभ्यां परोपकारान् जनयति प्रकटयति (जीवम्) ज्ञानसाधनयुक्तम् (व्रातम्) व्रतानां सत्यभाषणादीनां समूहस्तत् (सचेमहि) समवेयाम। अयं मन्त्रः (शत॰२.६.१.३९) व्याख्यातः॥५५॥

    भावार्थः

    नहि मनुष्याणां विदुषां मातापित्राचार्याणां च सुशिक्षया विना मनुष्यजन्मसाफल्यं सम्भवति, न च मनुष्यास्तया विना पूर्णं जीवनं कर्म च समवैतुं शक्नुवन्ति, तस्मात् सर्वदा मातापित्राचार्यैः स्वसन्तानानि सम्यगुपदेशेन शरीरात्मबलवन्ति कर्त्तव्यानीति॥५५॥

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    विषयः

    पुनर्मनःशब्देन बुद्धिरुपदिश्यते ।।

    सपदार्थान्वयः

    रे पितरः !=जनका ! विद्याप्रदाश्च पान्त्यन्नसुशिक्षाविद्यादानेन तत्सम्बुद्धौ ! भवच्छिक्षया दैव्यः यो देवेषु=विद्वत्सु जातो जनो यो विद्याधर्माभ्यां परोपकारान् जनयति=प्रकटयति [सः]विद्वान् नः=अस्मभ्यं पुनः पुनः अस्मिन् जन्मनि पुनर्जन्मनि वा मनः=धारणातीं बुद्धिं ददातु प्रयच्छतु ।

    येन वयं जीवं ज्ञानसाधनयुक्तं व्रातं व्रतानां=सत्यभाषणादीनां समूहस्तत्सचेमहि=समवेयाम ।। ३ । ५५ ।।

    [हे पितरः=जनका ! विद्याप्रदाश्च भवाच्छिक्षया.....विद्वान्  नः=अस्मभ्यं पुनः पुनर्मनः=धारवतीं बुद्धिं ददातु]

    पदार्थः

    (पुनः) अस्मिन् जन्मनि पुनर्जन्मनि वा (नः) अस्मभ्यम् (पितरः) पान्त्यन्नसुशिक्षाविद्यादानेन तत्संबुद्धौ (मनः) धारणावतीं बुद्धिम् (ददातु) प्रयच्छतु (दैव्यः) यो देवेषु=विद्वत्सु जातो विद्वान् । अत्र देवाद्यञञौ ॥ [अ० ४ ।१ ।८५ ॥ इति वार्तिकेन प्राग्दीव्यतीयान्तर्गते जातेर्थे यञ् प्रत्ययः (जनः) यो विद्याधर्माभ्यां परोपकारान् जनयति=प्रकटयति (जीवम्) ज्ञानसाधनयुक्तम् (व्रातम्) व्रतानां=सत्यभाषणादीनां समूहस्तत् (सचेमहि ) समवेयाम ॥ अयं मंत्रः शत० २ ।६ ।१ ।३९ व्याख्यातः ॥ ५५ ।।

    भावार्थः

    नहि मनुष्याणां, विदुषां मातापित्राचार्याणां च सुशिक्षया बिना मनुष्यजन्म साफल्यं सम्भवति,

    [येन वयं जीवं व्रातं सचेमहि=समवेयाम]

    न च मनुष्यास्तया बिना पूर्णं जीवनं कर्म च समवैतुं शक्नुवन्ति ।

    [तात्पर्यमाह--]

    तस्मात्--सर्वदा मातापित्राचार्यैः स्वसन्तानानि सम्यगुपदेशेन शरीरात्मबलवन्ति कर्त्तव्यानीति ।। ३ । ५५ ।।

    प्रमाणार्थ

    भा० पदार्थः-- पितर:=विद्वांसो मातापित्राचार्या: । जीवम्=मनुष्यजन्म, जीवनम् । व्रातम्=कर्म ।

    विशेषः

    बन्धुः । मनः=बुद्धिः ॥ निचृद्गायत्री। षड्जः ॥

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    हिन्दी (5)

    विषय

    फिर मन शब्द से बुद्धि का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे (पितरः) उत्पादक वा अन्न, शिक्षा वा विद्या को देकर रक्षा करने वाले पिता आदि लोग आपकी शिक्षा से यह (दैव्यः) विद्वानों के बीच में उत्पन्न हुआ (जनः) विद्या वा धर्म से दूसरे के लिये उपकारों को प्रकट करने वाला विद्वान् पुरुष (नः) हम लोगों के लिये (पुनः) इस जन्म वा दूसरे जन्म में (मनः) धारणा करने वाली बुद्धि को (ददातु) देवे, जिससे (जीवम्) ज्ञानसाधनयुक्त जीवन वा (व्रातम्) सत्य बोलने आदि गुण समुदाय को (सचेमहि) अच्छे प्रकार प्राप्त करें॥५५॥

    भावार्थ

    विद्वान् माता-पिता आचार्यों की शिक्षा के विना मनुष्यों का जन्म सफल नहीं होता और मनुष्य भी उस शिक्षा के विना पूर्ण जीवन वा कर्म के संयुक्त करने को समर्थ नहीं हो सकते। इस से सब काल में विद्वान् माता-पिता और आचार्यों को उचित है कि अपने पुत्र आदि को अच्छे प्रकार उपदेश से शरीर और आत्मा के बल वाले करें॥५५॥

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    विषय

    व्रतमय जीवन

    पदार्थ

    १. मन के विषय में बन्धु की प्रार्थना आगे इस प्रकार होती है कि ( पितरः ) = आचार्य व ( दैव्यः जनः ) = सब दिव्य वृत्तियोंवाले लोग ( नः ) = हमें ( पुनः ) = फिर ( मनः ) = मन को ( ददातु ) = दें। यह हमारा मन सांसारिक विषयों में भटककर ‘हमारा’ न रह गया था। आचार्यों से व दिव्य वृत्तिवाले जनों से उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करके हम अपने मन को विषय-व्यावृत्त करके फिर से प्राप्त करनेवाले बनें। 

    २. इस मन को विषयों से लौटाकर हम ( व्रातम् ) = [ व्रतसमूहसमन्वितम् ] व्रतों से युक्त ( जीवम् ) = जीवन को ( सचेमहि ) = प्राप्त करें। हमारा मन व्रतों की रुचिवाला हो। ये व्रत ही हमारे जीवन को सुन्दर बनाते हैं। व्रत ही मन को दृढ़ करते हैं और तब वह दृढ़ मनरूपी लगाम ही इन्द्रियरूप घोड़ों को सुसारथि की भाँति वश में कर सकेगी।

    भावार्थ

    भावार्थ — हमारा मन दिव्य वृत्तिवाला हो और उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति में लगा हो।

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    विषय

    फिर मन शब्द से बुद्धि का उपदेश किया जाता है ।।

    भाषार्थ

    हे (पितरः) अन्न आदि तथा विद्या दान से रक्षा करने वाले माता पिता तथा गुरुजनो ! आपकी शिक्षा से (दैव्यः) विद्वानों में उत्पन्न हुआ (जनः) विद्या और धर्म से परोपकार करने वाला जो विद्वान् मनुष्य है, वह (नः) हमें ( पुनः) इस जन्म में वा दूसरे जन्म में (मनः) धारणावती बुद्धि को (ददातु) प्रदान करे।

     जिससे हम लोग (जीवम्) ज्ञान से सम्पन्न जीवन को (व्रातम्) सत्यभाषण आदि व्रतों से (सचेमहि) समवेत (संयुक्त) रहें ।। ३ । ५५ ।।

    भावार्थ

    विद्वानों की तथा माता, पिता और आचार्य जनों की उत्तम शिक्षा के बिना मनुष्यों का यह मानव-जन्म सफल नहीं हो सकता,

      और--उस उत्तम शिक्षा के बिना मनुष्य पूर्ण जीवन और कर्म को प्राप्त नहीं कर सकते ।

    इसलिये--सदा माता, पिता और चार्य लोग अपनी सन्तानों को उत्तम उपदेश से शरीर और आत्मा से बलवान् बनावें ।। ३ । ५५ ।।

    प्रमाणार्थ

    (दैव्यः) यहाँ देव शब्द से 'देवाद्यञञौ' (अ० । १ ।८५) वार्त्तिक से प्राग्दीव्यतीय प्रकरण के अन्तर्गत जात=(उत्पन्न) अर्थ में 'यञ्' प्रत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ६ । १ । ३९) में की गई है ॥ ३ ॥ ५५ ॥

    भाष्यसार

    मन शब्द से बुद्धि का उपदेश--पितर अर्थात् विद्वान् माता, पिता और आचार्य लोगों की उत्तम शिक्षा और विद्या के बिना मानव-जीवन सफल नहीं हो सकता। इसलिए पितर लोग मनुष्यों को इस जन्म में और आगामी जन्मों में भी मन अर्थात् मेधा बुद्धि प्रदान करें। क्योंकि पितर जनों की उत्तम शिक्षा के बिना जीवन की पूर्णता और सत्य भाषण आदि शुभ कर्मों की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। इसलिये माता, पिता और आचार्य जन अपने सन्तानों के मन अर्थात् बुद्धि को अपने सदुपदेश से शुद्ध करके उन्हें शारीरिक और आत्मिक बल से सम्पन्न करें ।। ३ । ५५ ।।

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    पदार्थ

    पदार्थ = हे  ( पितर: ) = पालन करनेवाले पूज्य महापुरुषो ! ( दैव्यः जनः ) = देव विद्वानों में सुशिक्षित, परमात्मा का अनन्य भक्त और योगीराज महात्मा पुरुष  ( नः ) = हमें  ( पुन: ) = बार-बार  ( मनः ददातु ) = ज्ञान का प्रदान करे, हम लोग  ( जीवम् ) = जीवन और  ( व्रातम् ) = उत्तम कर्मों को  ( सचेमहि ) = प्राप्त हों। 

    भावार्थ

    भावार्थ = हे हमारे पूज्य पालन-पोषण करनेवाले महापुरुषो! परमात्मा की दया और आप महापुरुषों के आशीर्वाद से हमें ऐसा योगीराज वेदवेत्ता विद्वान् ब्रह्मनिष्ठ सन्त महात्मा, संसार के कामी क्रोधी पुरुषों से भिन्न, शान्तात्मा महापुरुष प्राप्त हो, जिसके यथार्थ उपदेशों से, हम अपने जीवन और आचरणों को सुधारते हुए, परमेश्वर के अनन्य भक्त बनकर अपने जन्म को सफल करें ।

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    विषय

    ज्ञान और दीर्घायु की प्राप्ति ।

    भावार्थ

    -हे ( पितरः ) पालक पूजनीय पुरुषो ! ( दैव्यः जनः ) देवों, विद्वानों में सुशिक्षित या देव परमेश्वर में निष्ट आचार्य या देव, ईश्वरीय दिव्य शक्तियों, ईश्वर प्रदत्त आध्यात्म प्राणों का वशीकर्ता, विज्ञ ( जनः ) जन ( नः ) हमें ( पुनः ) पुन: २ ( मनः ) ज्ञान ( ददातु ) प्रदान करे । हम लोग ( जीवं ) जीवन और (व्रातम् ) उत्तम व्रतों, कर्मों को ( सचे- महि ) प्राप्त हों । अर्थात् राज्य के पालक लोगों के प्रबन्ध से विद्वान् पुरुषों से हम ज्ञान प्राप्त करें, दीर्घ जीवन जीवें और सत्कर्म करें || शत० २ । ६ । १ । ३९ ॥ 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    बन्धुःऋषिः । मनो देवता । निचृद् गायत्री । षड्जः स्वरः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    विद्वान आई-वडील व गुरू यांच्या संस्कारावाचून मनुष्य जन्म सफल होत नाही. माणसे ही अशा प्रकारच्या संस्कारावाचून पूर्ण जीवन जगण्यास किंवा कर्म करण्यास समर्थ होऊ शकत नाहीत. त्यासाठी विद्वान माता-पिता व आचार्य यांनी आपल्या पुत्रांना चांगला उपदेश करून त्यांचे शरीर व आत्मबल वाढवावे.

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    विषय

    missing

    शब्दार्थ

    missing

    भावार्थ

    माता-पिता आणि आचार्यांचे हे उचित कर्त्तव्य आहे की त्यांनी आपल्या पुत्र, शिष्यांदींना चांगला उपदेश देऊन त्यांचे शरीर व आत्मा बलवान बनवावेत ॥55॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O venerable elders, may this man endowed with godly qualities, give us in this and the next life, intellect whereby we may enjoy a long life and perform noble deeds.

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    Meaning

    May this wonderful sagely man, with the blessings of our forefathers who protected, prepared and shaped him, help us regain, here and hereafter, a noble mind and intelligence, so that with him we live a virtuous life of discipline and holy vows.

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    Translation

    O elders and enlightened ones, may you give us again the spirit, so that we may live with family of the living. (1)

    Notes

    Daivyo janah, the enlightened ones. Jivam vratam, the family or community of the living (people): Sachemahi,सेवेमहि; join; live with.

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    बंगाली (2)

    विषय

    পুনর্মনঃ শব্দেন বুদ্ধিরুপদিশ্যতে ॥
    পুনরায় মন শব্দ দ্বারা বুদ্ধির উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (পিতরঃ) উৎপাদক অথবা অন্ন, শিক্ষা বা বিদ্যা প্রদান করিয়া রক্ষাকারী পিতাদি জন আপনার শিক্ষা দ্বারা এই (দৈব্যঃ) বিদ্বান্দিগের মধ্যে উৎপন্ন হইয়া (জনঃ) বিদ্যা বা ধর্ম দ্বারা অপরের উপকার কে প্রকাশ কারী বিদ্বান্ পুরুষ (নঃ) আমাদিগের জন্য (পুনঃ) এই জন্ম বা দ্বিতীয় জন্মে (মনঃ) ধারণাকারিণী বুদ্ধিকে (দদাতু) দিবেন যদ্দ্বারা (জীবম্) জ্ঞানসাধনযুক্ত জীবন বা (ব্রাতম্) সত্য বলা ইত্যাদি গুণ সমুদায় (সচেমহি) ভালমত প্রাপ্ত করিতে পারে ॥ ৫৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- বিদ্বান্ মাতা-পিতা, আচার্য্যের শিক্ষা ব্যতীত মনুষ্যের জন্ম সফল হয়না এবং মনুষ্যও সেই শিক্ষা ব্যতীত পূর্ণ জীবন বা কর্ম সংযুক্ত করিতে সমর্থ হইতে পারে না । এইজন্য সর্ব কালে বিদ্বান্ মাতা-পিতা ও আচার্য্যের উচিত যে, স্বীয় পুত্রাদিকে ভাল প্রকার উপদেশ দিয়া শরীরও আত্মবল যুক্ত করিবেন ॥ ৫৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    পুন॑র্নঃ পিতরো॒ মনো॒ দদা॑তু॒ দৈব্যো॒ জনঃ॑ ।
    জী॒বং ব্রাত॑ꣳসচেমহি ॥ ৫৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    পুনর্ন ইত্যস্য বন্ধুর্ঋষিঃ । মনো দেবতা । পিপীলিকামধ্যা নিচৃদ্গায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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    পদার্থ

    পুনর্নঃ পিতরো মনো দদাতু দৈব্যো জনঃ । জীবং ব্রতংসচেমহি।। ৫৪।।

    (যজু ৩।৫৫)

    পদার্থঃ হে (পিতরঃ) পালনকারী পূজনীয় মহাপুরুষ, (দৈব্যঃ জনঃ) বিদ্বানদের মধ্যে সুশিক্ষিত, পরমাত্মার অনন্য ভক্ত এবং যোগী রাজ মহাত্মা পুরুষ! (নঃ) আমাদেরকে (পুনঃ) বার বার (মনঃ দদাতু) জ্ঞান প্রদান করুন। আমরা (জীবম্) সফল জীবন এবং (ব্রতম্) উত্তম কর্মসমূহকে যেন (সচেমহি) প্রাপ্ত হই।

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ হে আমাদের পূজনীয় পালন-পোষণকারী মহাপুরুষগণ! পরমাত্মার দয়া এবং মহাপুরুষদের আশীর্বাদে যোগীরাজ, বেদবেত্তা বিদ্বান, ব্রহ্মনিষ্ঠ মহাত্মা পুরুষ, সংসারের কাম-ক্রোধযুক্ত পুরুষ থেকে ভিন্ন শান্তাত্মা মহাপুরুষদের যেন আমরা প্রাপ্ত হই। তাঁদের যথার্থ উপদেশ দ্বারা আমরা জীবন এবং আচরণকে সংশোধনের মাধ্যমে পরমেশ্বরের অনন্য ভক্ত হয়ে যেন নিজের জীবনকে সফল করতে পারি।।৫৪।।

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