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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 7
    ऋषिः - सर्पराज्ञी कद्रूर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - विराट् गायत्री, स्वरः - षड्जः
    255

    अ॒न्तश्च॑रति रोच॒नास्य प्रा॒णाद॑पान॒ती। व्य॑ख्यन् महि॒षो दिव॑म्॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒न्तरित्य॒न्तः। च॒र॒ति॒। रो॒च॒ना। अ॒स्य॒। प्रा॒णात्। अ॒पा॒न॒तीत्य॑पऽअ॒न॒ती। वि। अ॒ख्य॒न्। म॒हि॒षः। दिव॑म् ॥७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती व्यख्यन्महिषो दिवम् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अन्तरित्यन्तः। चरति। रोचना। अस्य। प्राणात्। अपानतीत्यपऽअनती। वि। अख्यन्। महिषः। दिवम्॥७॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 7
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    संस्कृत (2)

    विषयः

    सोऽग्निः कथंभूत इत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    याऽस्याग्नेः प्राणादपानती सती रोचना दीप्तिर्विद्युच्छरीरब्रह्माण्डयोरन्तश्चरति, स महिषोऽग्निर्दिवं व्यख्यत् विख्यापयति॥७॥

    पदार्थः

    (अन्तः) ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्ये (चरति) गच्छति (रोचना) दीप्तिः (अस्य) अग्नेः (प्राणात्) ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्य ऊर्ध्वगमनशीलात् (अपानती) अपानमधोगमनशीलं निष्पादयन्ती विद्युत् (वि) विविधार्थे (अख्यत्) ख्यापयति, अत्र लडर्थे लुङन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (महिषः) स्वगुणैर्महान् (दिवम्) सूर्यलोकम्॥७॥

    भावार्थः

    मानवैर्योऽग्निविद्युदाख्या सर्वान्तःस्था कान्तिर्वर्तते, सा प्राणापानाभ्यां सह संयुज्य सर्वान् प्राणापानाग्निप्रकाशगत्यादीन् चेष्टाव्यवहारान् प्रसिद्धीकरोतीति बोध्यम्॥७॥

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    विषयः

    सोग्निः कथंभूत इत्युपदिश्यते ।।

    सपदार्थान्वयः

    याऽस्य=अग्नेः प्राणात् ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्य ऊर्ध्वगमनशीलाद् अपानती अपानमधोगमनशीलं वायुं निष्पादयन्ती विद्युत् सतीरोचना=दीप्तिर्विद्युच्छरीरब्रह्माण्डयोरन्तः ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्ये चरति गच्छति।

     

    स महिष: स्वगुणैर्महान् अग्निः दिवं सूर्यलोकं व्यख्यत्=विख्यापयति विविधं ख्यापयति ॥

    [अस्य=अग्ने: प्राणादपानती सती रोचना दीप्तिर्विद्युच्छरीरब्रह्माण्डयोरन्तश्चरति ]

    पदार्थः

    (अन्तः) ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्ये (चरति) गच्छति (रोचना) दीप्ति: (अस्य ) अग्नेः (प्राणात्) ब्रह्माण्डशरीरयोर्मध्य ऊर्ध्वगममनशीलात् (अपानती) अपानमधोगमनशीलं वायुं निष्पादयन्ती विद्युत् (वि) विविधार्थे (अख्यत्) ख्यापयति । अत्र लडर्थे लुङन्तर्गतो ण्यर्थश्च (महिषः) स्वगुणैर्महान् (दिवम्) सूर्यलोकम् ।। ७ ।।

    भावार्थः

    मानवैर्योऽग्निर्विद्युदाख्या सर्वान्तःस्था कान्तिर्वर्तते सा प्राणापानाभ्यां सह संयुज्य सर्वान् प्राणापानाग्निप्रकाशगत्यादीन् चेष्टाव्यवहारान् प्रसिद्धीकरोतीति बोध्यम् ॥ ३ । ७ ।।

    भावार्थ पदार्थः

    रोचना=कान्तिः । व्यख्यत्=चेष्टाव्यवहारन् प्रसिद्धीकरोति॥

    विशेषः

    सर्पराज्ञी कद्रूः । अग्निः=[विद्युत्] । गायत्री । षड्जः ।

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    हिन्दी (4)

    विषय

    वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    जो (अस्य) इस अग्नि की (प्राणात्) ब्रह्माण्ड और शरीर के बीच में ऊपर जाने वाले वायु से (अपानती) नीचे को जाने वाले वायु को उत्पन्न करती हुई (रोचना) दीप्ति अर्थात् प्रकाशरूपी बिजुली (अन्तः) ब्रह्माण्ड और शरीर के मध्य में (चरति) चलती है, वह (महिषः) अपने गुणों से बड़ा अग्नि (दिवम्) सूर्यलोक को (व्यख्यत्) प्रकट करता है॥७॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो विद्युत् नाम से प्रसिद्ध सब मनुष्यों के अन्तःकरण में रहने वाली जो अग्नि की कान्ति है, वह प्राण और अपान वायु के साथ युक्त होकर प्राण, अपान, अग्नि और प्रकाश आदि चेष्टाओं के व्यवहारों को प्रसिद्ध करती है॥७॥

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    विषय

    ज्ञान का प्रकाश

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र की भावना के अनुसार वेदमाता को अपनाने पर ( अस्य ) = इस ‘वेदमातृभक्त’ के ( अन्तः ) = अन्दर—अन्तःकरण में ( रोचना ) = ज्ञान की दीप्ति ( चरति ) = प्रसृत होती है, अर्थात् इसका अन्तःकरण ज्ञानज्योति से जगमगा उठता है। 

    २. यह ( रोचना ) = ज्ञानदीप्ति विषयों के सात्त्विक रूप का दर्शन कराकर इसे विषयासक्ति से बचाती है। विषयासक्तियों से बचाव इसकी प्राणशक्ति की वृद्धि का कारण बनता है। ( प्राणात् ) = प्राणशक्ति के द्वारा यह रोचना इसके जीवन में से ( अपानती ) = सब दोषों को दूर करती है। इसका जीवन निर्मल हो उठता है। केवल शरीर ही नहीं, इसके मन व मस्तिष्क भी स्वस्थ हो जाते हैं। 

    ३. सब मलों से दूर हुआ यह ( महिषः ) = [ मह पूजायाम् ] प्रभु का पुजारी दिवम् = उस हृदयस्थ देदीप्यमान ज्योति को ( व्यख्यन् ) = विशेषरूप से देखता है। मल के आवरण ने उस ज्योति को इससे छिपाया हुआ था। आवरण हटा और ज्योति का प्रकाश हुआ।

    भावार्थ

    भावार्थ — हम वेदमाता को अपनाते हैं, तो अन्तःकरण प्रकाशित हो उठता है। प्राणशक्ति की वृद्धि से सब मल दूर हो जाते हैं और उपासक अन्तर्ज्योति—प्रभु को देखता है।

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    विषय

    वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।

    भाषार्थ

    जो (अस्य) इस अग्नि की (प्राणात्) ब्रह्माण्ड और शरीर में ऊर्ध्व गमनशील प्राण से (पानी) नीचे गमन करने वाली वायु को उत्पन्न करती हुई (रोचना) दीप्तिमय विद्युत् है, वह शरीर और ब्रह्माण्ड के (अन्तः) मध्य में (चरति) गति करती है। और वह (महिषः) अपने गुणों से महान् अग्नि (दिवम्) सूर्य लोक को ( व्यख्यत् ) नाना प्रकार से प्रसिद्ध करती है ।। ३ । ७ ।।

    भावार्थ

    जो अग्नि विद्युत् नाम से प्रसिद्ध सबके मध्य में कान्ति रूप में विद्यमान है वह प्राण और अपान के साथ संयुक्त होकर प्राण, अपान, अग्नि के प्रकाश की गति आदि चेष्टा एवं व्यवहारों को प्रकट करता है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना योग्य है ।। ३ । ७ ।।

    भा० पदार्थ:--रोचना= कान्तिः । व्यख्यत्=चेष्टाव्यवहारन् प्रसिद्धीकरोति॥

    प्रमाणार्थ

    (अख्यत्) ख्यापयति । यहाँ लट् अर्थ में लङ् लकार और अन्तर्भावित ण्यर्थ है । ३ । ७॥

    भाष्यसार

    अग्नि (भौतिक) कैसा है--अग्नि विद्युत् रूप है । यह ब्रह्माण्ड और शरीर में भी प्राण अर्थात् ऊर्ध्वगमनशील वायु, अपान अर्थात् अधोगमनशील वायु का साधक है। विद्युत् रूप अग्नि जो सब पदार्थों के मध्य में विद्यमान कान्ति रूप है, वह प्राण और अपान की सहायता से ऊर्ध्वगति, अधोगति आदि चेष्टाओं को सिद्ध करता है। अग्नि के प्रकाश की गति का भी साधक है। अपने इन उक्त गुणों के कारण अग्नि महान् है। द्युलोक की व्याख्या अग्नि है         

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    विषय

    सूर्य और पृथ्वी का सम्बन्ध ।

    भावार्थ

     ( अस्य ) इस महान् अग्नि की ही ( रोचना ) वायुरूप ज्योति, दीप्ति है जो (अन्तः) शरीर के भीतर इस ब्रह्माण्ड के भीतर ( प्राणात् ) प्राण रूप होने के पश्चात् ( अपानती ) अपान का स्वरूप धारण करती है । वही (महिषः ) अनन्त महिमा से युक्त होकर ( दिवम् )द्यौलोक को या प्रकाशमान सूर्य के तेज को ( वि अख्यत् ) विशेष रूप से बतलाता है । अर्थात ब्रह्माण्ड में वही वायु स्वयं प्रबल चलता और ऊपर उठता और मन्द होता और नीचे आता है। शरीर में वही प्राण, पुनः अपान रूप में बदलता है ! परन्तु यह उसी महान् अग्नि का तेज है, ब्रह्माण्ड में सूर्य की शक्ति से वायु नाना गतियों से चलता है। और शरीर में जाठर अग्नि के बल से प्राणों की विविध गति होती है ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वायुरूपोऽग्निर्देवता । गायत्री । षड्जः स्वरः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी हे जाणले पाहिजे की, विद्युतरूपी अग्नी माणसांच्या ठायी असतो तो प्राण, अपान वायूंबरोबर संयुक्त होऊन प्राण, अपान, भौतिक अग्नी व प्रकाश इत्यादींच्या व्यवहाराद्वारे प्रकट होतो.

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    विषय

    तो अग्नी कसा आहे, हा विषय पुढील मंत्रात सांगितला आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (अस्य) या अग्नीची जी कांती (प्राणात्) ब्रह्मांडात आणि शरीरात ऊर्ध्व गमनशील वायूच्या साह्याने (अपानगती) अधोगमनशील वायूला उत्पन्न करते, ती (रोचना) दीप्ती म्हणजे प्रकाशरूपाने दिसणारी विद्युत (अन्त:) ब्रह्मांडात आणि शरिरात (चरति) संचार करते. अशा प्रकारे (मीहष:) आपल्या गुणांद्वारे तो महान् अग्नी (दिवम्) सूर्यलोकास (व्यख्यत) प्रकाशित करतो (विद्युत हे अग्नीचेच एक व्यापी रूप आहे. अग्नीच व्यापक रूपाने शरिरात व ब्रह्मांडात व्याप्त आहे व तोच आपल्या विद्युत रूपाद्वारे सर्वव्यवहार संपन्न करतो) ॥7॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांनी हे तत्त्व नीट समजून घ्यावे की विद्युत नावाने प्रसिद्ध सर्व माणसांच्या अंत: करणात राहणारी अग्नीची जी कांती आहे, ती प्राण आणि अपानवायू संयुक्त होऊन प्राण, अपान, अग्नी आणि प्रकाश आदी द्वारे होणारे व्यवहारांना व कार्यांना प्रकटित करीत असते. ॥7॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The lustre of this fire, goes up and comes down in the space like exhalation and inhalation in the body. This great fire displays the Sun.

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    Meaning

    The power of Agni is light and energy/electricity which creates and produces the circuitous currents- going up as prana in the universe as well as in the body, and the complementary current going down as apana in the body as well as in the universe. This universal energy of Agni is a mighty power which is the light of heaven and burns in the sun.

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    Translation

    The radiance of this fire penetrates within just as outbreath comes from in-breath. Thus the great fire illuminates the Sky. (1)

    Notes

    Rochana, radiance Prana, in-breath. Араnа, out-breath. Mahisah, great (fire).

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    बंगाली (1)

    विषय

    সোऽগ্নিঃ কথংভূত ইত্যুপদিশ্যতে ॥
    সে অগ্নি কেমন, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- (অস্য) এই অগ্নির (প্রাণাৎ) ব্রহ্মাণ্ড ও শরীরের মধ্যে ঊর্ধ্বগমনশীল বায়ু হইতে (অপানতী) নিম্নগমনশীল বায়ুকে উৎপন্নকারী (রোচনা) দীপ্তি অর্থাৎ প্রকাশরূপী বিদ্যুৎ (অন্তঃ) ব্রহ্মাণ্ড ও শরীরের মধ্যে (চরতি) বিচরণ করে সে (মহিষঃ) স্বগুণ হইতে মহান্ অগ্নি (দিবম্) সূর্য্যলোককে (ব্যখ্যৎ) প্রকট করে ॥ ৭ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগকে জানা উচিত যে, বিদ্যুৎ নামে বিখ্যাত সকল মনুষ্যদিগের অন্তঃকরণে নিবাসকারী যে অগ্নির কান্তি আছে সে প্রাণ ও অপানবায়ুর সহিত যুক্ত হইয়া প্রাণ, অপান, অগ্নি ও প্রকাশাদি চেষ্টা সকলের ব্যবহারকে প্রসিদ্ধ করে ॥ ৭ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অ॒ন্তশ্চ॑রতি রোচ॒নাস্য প্রা॒ণাদ॑পান॒তী ।
    ব্য॑খ্যন্ মহি॒ষো দিব॑ম্ ॥ ৭ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অন্তরিত্যস্য সর্পরাজ্ঞী কদ্রূর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । বিরাড্ গায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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