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यजुर्वेद अध्याय - 3

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  • यजुर्वेद - अध्याय 3/ मन्त्र 8
    ऋषिः - सर्पराज्ञी कद्रूर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - गायत्री, स्वरः - षड्जः
    161

    त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रि॒ꣳशत्। धाम॑। वि। रा॒ज॒ति॒। वाक्। प॒त॒ङ्गाय॑। धी॒य॒ते॒। प्रति॑। वस्तोः॑। अह॑। द्युभि॒रिति॒ द्युऽभिः॑ ॥८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रिँशद्धाम विराजति वाक्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    त्रिꣳशत्। धाम। वि। राजति। वाक्। पतङ्गाय। धीयते। प्रति। वस्तोः। अह। द्युभिरिति द्युऽभिः॥८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 3; मन्त्र » 8
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    संस्कृत (2)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    मनुष्यैर्योऽग्निर्द्युभिः प्रतिवस्तोस्त्रिंशद्धाम धामानि विराजति प्रकाशयति, तस्मै पतङ्गाय पतनपातनादिगुणप्रकाशिताय प्रतिवस्तोः प्रतिदिनं विद्वद्भिरह वाग्धीयताम्॥८॥

    पदार्थः

    (त्रिंशत्) पृथिव्यादीनि त्रयस्त्रिंशतो वस्वादीनां देवानां मध्ये पठितानि। अन्तरिक्षमादित्यमग्निं च विहाय त्रिंशत्संख्याकानि (धाम) दधति येषु तानि धामानि। अत्र सुपां सुलुग्॰ [अष्टा॰७.१.३९] इति शसो लुक्। (वि) विशेषार्थे (राजति) प्रकाशयति, अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः। (वाक्) उच्यते यया सा। वागिति वाङ्नामसु पठितम्। (निघं॰१.११) (पतङ्गाय) पतति गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम् (प्रति) वीप्सायाम् (वस्तोः) दिनं दिनम्। वस्तोरित्यहर्नामसु पठितम्। (निघं॰१.९) (अह) विनिग्रहार्थे। अह इति विनिग्रहार्थीयः। (निरु॰१.५) (द्युभिः) प्रकाशादिगुणविशेषैः। दिवो द्योतनकर्मणामादित्यरश्मीनाम्। (निरु॰१३.२५)॥८॥

    भावार्थः

    या वाणी प्राणयुक्तेन शरीरस्थेन विद्युदाख्येनाग्निना नित्यं प्रकाश्यते, सा तद् गुणप्रकाशाय विद्वद्भिर्नित्यमुपदेष्टव्या श्रोतव्या चेति॥८॥

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    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    सपदार्थान्वयः

     मनुष्यैर्योऽग्निर्द्युभिः प्रकाशादिगुणविशेषैः प्रतिवस्तोः दिनं दिनं त्रिंशत् पृथिव्यादीनि, त्रयस्त्रिंशतो वस्वादीनां देवानां मध्ये पठितानि, अन्तरिक्षमादित्यमग्निं च विहाय त्रिंशत्संख्याकानि, धाम=धामानि दधति येषु तानि धामानि विराजति=प्रकाशयति विशेषेण प्रकाशयति ।

    तस्मै पतङ्गाय=पतनपातनादिगुणप्रकाशिताय, पतति=गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये प्रतिवस्तोः=प्रतिदिनं विद्वद्भिरह सविनिग्रहं वाक् उच्यते यया सा [धीयते]=धीयताम् धार्यताम् ॥ ३।८॥

    [मनुष्यैर्योऽग्निर्द्युभिः प्रतिवस्तो:...... त्रिंशद्धाम=धामानि विराजति=प्रकाशयति]

    पदार्थः

    पदार्थ:-- (त्रिंशत्) पृथिव्यादीनि, त्रयस्त्रिंशतो वस्वादीनां देवानां मध्ये पठितानि । अन्तरिक्षमादित्यमग्निं च विहाय त्रिंशत्संख्याकानि (धाम) दधति येषु तानि धामानि । अत्र सुपां सुलुगिति शसो लुक् (वि) विशेषार्थे (राजति) प्रकाशयति । अत्रांतर्गतो ण्यर्थः (वाक्) उच्यते यया सा । वागिति वाङ्नामसु पठितम् । निघं० । १ । ११ ।। (पतङ्गाय) पतति=गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम् (प्रति) वीप्सायाम् (वस्ताः) दिनं दिनम् । वस्तोरित्यहर्नामसु पठितम् ॥ निघं० १ ६ ॥ (अह) विनिग्रहार्थे । अह इति विनिग्रहार्थीयः ॥ निरु० १ ॥ ५ ॥ (द्युभिः) प्रकाशादिगुणविशेषैः । दिवो द्योतनकर्मणामादित्यरश्मीनाम् ॥ निरु० १३ ।२५ ॥ ८॥

    भावार्थः

     या वाणी प्राणयुक्तेन शरीरस्थेन विद्युदाख्येनाग्निना नित्यं प्रकाश्यते,

    [तस्मै पतङ्गाय=पतनपातनादिगुणप्रकाशिताय  प्रतिवस्तोः=प्रतिदिनं विद्वद्भिरह वाक् [धीयते]= धीयताम्]

       सा तद्गुणप्रकाशाय विद्वद्भिर्नित्यमुपदेष्टव्या श्रोतव्या चेति ॥ ३।८॥

    भावार्थ पदार्थः

    अग्निः=विद्युदाढ्यः । पतङ्गाय=तद्गुणप्रकाशाय । प्रतिवस्तोः=नित्यम् । धीयते=उपदिश्यते श्रूयते च ।।

    विशेषः

    सर्पराज्ञी कद्रूः । अग्निः=विद्युत्। गायत्री। षड्जः ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    मनुष्यों को जो अग्नि (द्युभिः) प्रकाश आदि गुणों से (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन (त्रिंशत्) अन्तरिक्ष, आदित्य और अग्नि को छोड़ के पृथिवी आदि को जो तीस (धाम) स्थान हैं, उनको (विराजति) प्रकाशित करता है, उस (पतङ्गाय) चलने-चलाने आदि गुणों से प्रकाशयुक्त अग्नि के लिये (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन विद्वानों को (अह) अच्छे प्रकार (वाक्) वाणी (धीयते) अवश्य धारण करनी चाहिये॥८॥

    भावार्थ

    जो वाणी प्राणयुक्त शरीर में रहने वाले बिजुलीरूप अग्नि से प्रकाशित होती है, उसके गुणों के प्रकाश के लिये विद्वानों को उपदेश वा श्रवण नित्य करना चाहिये॥८॥

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    विषय

    निरन्तर ‘जप’

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र के अनुसार जब यह उपासक उस प्रभु का दर्शन करता है तब ( त्रिंशत् धाम ) = तीसों मुहूर्त ( विराजति ) = इसका अन्तःकरण प्रभु-ज्योति से चमकता है। इसका हृदय सदा प्रकाशमय रहता है। 

    २. ( वाक् ) = इसकी वाणी ( पतङ्गाय ) = उस [ पतति गच्छति प्राप्नोति ] प्राप्त होनेवाले प्रभु के लिए ( धीयते ) = धारण की जाती है। यह निरन्तर उस प्रभु सूर्य-समप्रभ का ही जप करता है, उसके नाम का ही चिन्तन करता है। सदा प्रभु का स्मरण करने से इसका जीवन पवित्र बना रहता है। 

    ३. ( प्रतिवस्तोः ) = प्रतिदिन इसका जप चलता ही है [ वस्तोः = दिन ], ( अह ) = और निश्चय से ( द्युभिः ) = [ द्यु = दिन ] अधिक प्रकाश व खुशी—प्रसन्नता के दिनों में भी यह प्रभु-नाम-स्मरण करता है। उत्सव के दिनों में यह प्रभु-स्मरण हमारी प्रसन्नता को उच्छृङ्खल नहीं होने देता। प्रसन्नता में भी मर्यादा बनी रहती है।

    भावार्थ

    भावार्थ — तीसों मुहूर्त प्रभु का दर्शन चले, निरन्तर उसके नाम का स्मरण हो। प्रसन्नता के अवसरों पर हम विशेषतः प्रभु को न भूलें, इसी में जीवन की सार्थकता है।

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    विषय

    फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है।

    भाषार्थ

    जो अग्नि (द्युभिः) प्रकाश आदि गुण विशेषों से (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन ( त्रिंशत् ) पृथिवी आदि तैंतीस जो वसु आदि देवों में पढ़े गये हैं उनमें से अन्तरिक्ष, आदित्य और अग्नि इन तीनों को छोड़कर तीस (धाम ) धामों को (विराजति) विशेषतया प्रकाशित करता है।

    उस (पतङ्गाय) पतन-पातन आदि गुणों से प्रकाशित एवं गतिशील अग्नि के लिये (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन विद्वान् लोग (अह) संयम से (वाक्) वाणी को [धयते] धारण करें अर्थात् उक्त अग्नि के गुणों का उपदेश करें ॥ ३ ॥ ८ ॥

    भावार्थ

    जो वाणी प्राणयुक्त शरीर में स्थित विद्युत् नामक अग्नि के द्वारा नित्य प्रकाशित की जाती है,

    उस अग्नि के गुणों को प्रकाशित करने के लिये विद्वान् लोग उस वाणी का उपदेश और श्रवण नित्य किया करें ॥ ३ ॥८॥

    प्रमाणार्थ

    (धाम) धामानि । यहाँ'सुपां सुलुक्॰ [अ० ७ ।१।३९ ] से 'शस' प्रत्यय का लुक् है। (राजति) यहाँणिच् का अर्थ अन्तर्निहित है। (वाक्) 'वाक्' शब्द निघं० ( १ । ११) में वाणी नामों में पढ़ा है। (वस्तोः) 'वस्तो:' शब्द निघं० (१ । ९) में दिन नामों में पढ़ा है। (अह) निरु० (१ । ५) के अनुसार 'अह' शब्द का अर्थ विनिग्रह (नियमन) है (द्युभिः) निरु० ( १३ ।१५) के अनुसार प्रकाश करने वाली सूर्य की किरणों का नाम 'द्यु' है ।  ३। ॥८॥

    भाष्यसार

    अग्नि (भौतिक) कैसा है— यह विद्युत् रूप भौतिक अग्नि अपने प्रकाश आदि गुणों से पृथिवी आदि तीस धामों को प्रकाशित करने वाला, गतिशील तथा विद्वानों की वाणी से नित्य उपदेश करने के योग्य है ॥

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    विषय

    सूर्य और पृथ्वी का सम्बन्ध ।

    भावार्थ

     ईश्वररूप अग्नि । जो प्रकाशक अग्नि ( त्रिंशत् ) तीस ( धाम ) धारक पदार्थों को ( विराजति ) व्याप्त होकर उनको प्रकाशित करता है उसी ( पतङ्गाय ) व्यापक परमेश्वर के लिये ( वाक् ) वेद वाणी ( धीयते ) पढ़ा जाता है और उसको ( प्रति वस्तोः ) प्रतिदिन ( द्युभिः ) प्रकाशमान पदार्थों के द्वारा ( अह ) निश्चय से ( धीयते ) ध्यान, मनन करना चाहिये ॥ 
    त्रिंशत् धाम - दिन रात्र के ३० मुहूर्त ( उव्वट ) । जो वाणीदिन के तीसों मुहूर्त प्रकाशित होती न केवल वह अग्नि ( पतङ्ग ) के लिये है प्रत्युत प्रतिदिन उत्सवों के साथ भी वह बात उसी 'पतङ्ग' के लिये ही है । महीधर - या मास के तीसों दिन जो वाणी 'पतङ्ग' के लिये है वह प्रति दिन उत्सवों में भी उसी के लिये है ।। उक्त ६-८ शत० २ । १ । ४ । २९ ॥ 
    दयानन्द - जो अग्नि प्रतिदिन तीसों धर्म्मों के धारक पदार्थों को प्रकाशित करता है उस स्वयंगतिशील, अन्यों के प्रेरक अग्नि को धारण करना चाहिये । ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, इन्द्र, प्रजापति, इनमें से अन्तरिक्ष वह आदित्य अग्नि को छोड़ शेष ३० । पतङ्ग =अग्नि परमेश्वर है ॥

    टिप्पणी

    ८- इतः परं एको मन्त्रोऽधिकः काण्व परिशिष्ठे द्रष्टव्यः ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्निर्देवता । गायत्री । षड्जः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    प्राणमय शरीरात विद्युतरूपी अग्नीमुळे जी वाणी प्रकट होते ती तेजस्वी व्हावी म्हणून सदैव विद्वानांचा उपदेश ऐकला पाहिजे.

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    विषय

    तो अग्नी कसा आहे, हा विषय पुढच्या मंत्रात विशद केला आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - जो अग्नी (द्युभि:) आपल्या प्रकाशादी गुणांनी (प्रतिवस्तो:) प्रतिदिन (त्रिंशत्) अंतरिक्ष आदित्य आणि अग्नी यांना सोडून पृथ्वी आदी जे तीस (धाम) स्थान (वसु, आदित्य आदित्य या तेहतीस पदार्थमधून अंतरिक्ष, आदित्य व अग्नी यांना वगळल्यास तीस स्थान) आहेत. त्यांना जो अग्नी प्रकाशित करतो, त्या (वहंगाय) गमन, चालत आदी गुणांनी युक्त त्या अग्नीचा महिमा विद्वानांनी (प्रतिवस्तो:) प्रतिदिनी (अह) उत्तम (वाक्) वर्णाद्वारे (धीयते) अवश्य वर्णन करावा. ॥8॥

    भावार्थ

    भावार्थ - जो प्राणमय शरिरात राहणार्‍या ज्या विद्युतरूप अग्नीमुळे वाणी प्रकट होत असते (ज्या शक्तीद्वारे मनुष्य बोलतो), विद्वानांनी त्या महान् अग्नीच्या गुणांविषयी (आणि लाभांविषयी) दिव्य उपदेश करावा आणि त्याचे गुण ऐकावेत. ॥8॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Gods word rules supreme throughout the world. The Vedas are recited for acquiring the knowledge of God. We should resolutely recite and understand the Vedas everyday with their illuminating sayings.

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    Meaning

    Vak, the speech mode of Agni, dominates thirty abodes of life (out of thirty-three) and is used in the service of its lord, Agni, for the expression of the light of knowledge with which the omniscient and omnipresent power illuminates the world.

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    Translation

    He resides in thirty places. Praise is offered to the fire divine every day in the festive morning. (1)

    Notes

    Prati vastoh, दिन दिनम्, every day. Vak, praise; speech. Patanga, पतन् गच्छति इति पतंगः अग्निः it goes falling down, so the fire is called patanga.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনঃ স কীদৃশ ইত্যুপদিশ্যতে ॥
    পুনরায় সেই অগ্নি কেমন এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- মনুষ্যদিগকে যে অগ্নি (দ্যুভিঃ) প্রকাশাদিগুণগুলির দ্বারা (প্রতিবস্তোঃ) প্রতিদিন (ত্রিংশৎ) অন্তরিক্ষ, আদিত্য ও অগ্নিকে ছাড়িয়া পৃথিবী ইত্যাদি যে ত্রিশটি (ধাম) স্থান আছে তাহাদিগকে (বিরাজতি) প্রকাশিত করে সেই (পতঙ্গায়) চলিবারও চালাইবার ইত্যাদি গুণ দ্বারা প্রকাশযুক্ত অগ্নির জন্য (প্রতিবস্তোঃ) প্রতিদিন বিদ্বান্দিগকে (অহ) ভাল প্রকার (বাক্) বাণী (ধীয়তে) অবশ্য ধারণ করা উচিত ॥ ৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যে বাণী প্রাণযুক্ত শরীরে নিবাসকারী বিদ্যুৎ রূপ অগ্নি দ্বারা প্রকাশিত হয় তাহার গুণগুলির প্রকাশ হেতু বিদ্বান্দিগকে উপদেশ বা শ্রবণ নিত্য করা উচিত ॥ ৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ত্রি॒ꣳশদ্ধাম॒ বি রা॑জতি॒ বাক্ প॑ত॒ঙ্গায়॑ ধীয়তে ।
    প্রতি॒ বস্তো॒রহ॒ দ্যুভিঃ॑ ॥ ৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ত্রিꣳশদ্ধামেত্যস্য সর্পরাজ্ঞী কদ্রূর্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । গায়ত্রী ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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