यजुर्वेद - अध्याय 33/ मन्त्र 5
ऋषिः - कुत्स ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - स्वराट् पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
149
द्वे विरू॑पे चरतः॒ स्वर्थे॑ऽअ॒न्यान्या॑ व॒त्समुप॑ धापयेते।हरि॑र॒न्यस्यां॒ भव॑ति स्व॒धावा॑ञ्छु॒क्रोऽअ॒न्यस्यां॑ दद्य्शे सु॒वर्चाः॑॥५॥
स्वर सहित पद पाठद्वेऽइति॑ द्वे। विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे। च॒र॒तः॒। स्वर्थे॒ इति॑ सु॒ऽअर्थे॑। अ॒न्यान्येत्यन्याऽअ॑न्या। व॒त्सम्। उप॑। धा॒प॒ये॒ते॒ऽइति॑ धापयेते ॥ हरिः॑। अ॒न्यस्या॑म्। भव॑ति। स्व॒धावा॒निति॑ स्व॒धाऽवा॑न्। शु॒क्रः। अ॒न्यस्या॑म्। द॒दृ॒शे॒। सु॒वर्चा॒ इति॑ सु॒ऽवर्चाः॑ ॥५ ॥
स्वर रहित मन्त्र
द्वे विरूपे चरतः स्वर्थेऽअन्यान्या वत्समुप धापयेते । हरिरन्यस्याम्भवति स्वधावाञ्छुक्रोऽअन्यस्यान्ददृशे सुवर्चाः ॥
स्वर रहित पद पाठ
द्वेऽइति द्वे। विरूपे इति विऽरूपे। चरतः। स्वर्थे इति सुऽअर्थे। अन्यान्येत्यन्याऽअन्या। वत्सम्। उप। धापयेतेऽइति धापयेते॥ हरिः। अन्यस्याम्। भवति। स्वधावानिति स्वधाऽवान्। शुक्रः। अन्यस्याम्। ददृशे। सुवर्चा इति सुऽवर्चाः॥५॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
रात्रिदिवसौ जगत्पालकावित्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यथा स्वर्थे द्वे विरूपे स्त्रियौ चरतोऽन्यान्या च वत्समुपधापयेते तयोरन्यस्यां स्वधावान् हरिर्भवति शुक्रः सुवर्चा अन्यस्यां ददृशे तथा द्वे रात्र्यहनी वर्त्तत इति जानीत॥५॥
पदार्थः
(द्वे) (विरूपे) विरुद्धस्वरूपे (चरतः) (स्वर्थे) सुष्ठु अर्थः प्रयोजनं ययोस्ते (अन्यान्या) भिन्ना भिन्ना एकैका कालभेदेन (वत्सम्) वसन्ति भूतान्यस्मिंस्तं संसारं वदति सततमिति वत्सो बालस्तं वा (उप) (धापयेते) पाययतः (हरिः) मनोहारी चन्द्रो बालो वा (अन्यस्याम्) रात्रौ योषिति वा (भवति) (स्वधावान्) प्रशस्तस्वधा अमृतरूपा गुणा विद्यन्ते यस्मिन् सः (शुक्रः) पावकः सूर्य्य आशुकारी बालश्च (अन्यस्याम्) प्रकाशरूपायां दिवसवेलायां जायायां वा (ददृशे) दृश्यते (सुवर्चाः) सुष्ठु तेजाः॥५॥
भावार्थः
अत्रानुभयाभेदरूपकोलङ्कारः। यथा द्वे स्त्रियौ वा गावावपत्यप्रयोजने पृथक् पृथक् वर्त्तमाने कालभेदेनैकं बालं पालयेतां तयोरेकस्या हृद्यो महागुणी शान्तिशीलो बालो जायेत। एकस्याञ्च शीघ्रकारी तेजस्वी शत्रुतापको बालो जायेत तथा द्वे रात्र्यहनी भिन्नस्वरूपे कालभेदेनैकं संसारं पालयतः। कथं रात्रिरमृतवर्षकं चित्तप्रसादकं चन्द्रमसमुत्पाद्य दिवसरूपा च पावकरूपं शोभनप्रकाशं सूर्यमुत्पाद्येति पूर्वान्वयः॥५॥
हिन्दी (3)
विषय
रात्रि दिन जगत् की रक्षा करनेवाले हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जैसे (स्वर्थे) सुन्दर प्रयोजनवाली (द्वे) दो (विरूपे) भिन्न-भिन्न रूप की स्त्रियां (चरतः) भोजनादि आचरण करती हैं और (अन्यान्या) एक-एक अलग-अलग समय में (वत्सम्) निरन्तर बोलनेवाले एक बालक को (उप, धापयेते) निकट कर दूध पिलाती हैं, उन दोनों में से (अन्यस्याम्) एक में (स्वधावान्) प्रशस्त शान्ति आदि अमृत तुल्य गुणयुक्त (हरिः) मन को हरनेवाला पुत्र (भवति) होता और (शुक्रः) शीघ्रकारी (सुवर्चाः) सुन्दर तेजस्वी (अन्यस्याम्) दूसरी में हुआ (ददृशे) दीख पड़ता है, वैसे ही सुन्दर प्रयोजनवाले दो काले-श्वेत भिन्न रूपवाले रात्रि-दिन वर्त्तमान हैं और एक-एक भिन्न-भिन्न समय में एक संसाररूप बालक को दुग्धादि पिलाते हैं, उन दोनों में से एक रात्रि में अमृतरूप गुणोंवाला मन का प्रसादक चन्द्रमा उत्पन्न होता और द्वितीय दिनरूप वेला में पवित्रकर्त्ता सुन्दर तेजवाला सूर्यरूप पुत्र दीख पड़ता है, ऐसा तुम लोग जानो॥५॥
भावार्थ
इस मन्त्र में अनुभयाभेदरूपकालङ्कार है। जैसे दो स्त्रियां वा गायें सन्तान प्रयोजनवाली पृथक्-पृथक् वर्त्तमान भिन्न-भिन्न समय में एक बालक की रक्षा करें, उन दोनों में से एक में हृदय को प्यारा, महागुणी, शान्तिशील बालक हो और दूसरी में शीघ्रकारी, तेजस्वी, शुत्रुओं कों दुःखदायी बालक होवे; वैसे भिन्न स्वरूपवाले दो रात्रि-दिन अलग-अलग समय में एक संसारस्वरूप बालक की पालना करते हैं। किस प्रकारः—रात्रि अमृतवर्षक, चित्त को करनेहारे चन्द्रमारूप बालक को उत्पन्न करके और दिनरूप-स्त्री तेजोमय सुन्दर प्रकाशवाले सूर्य्यरूप पुत्र को उत्पन्न करके॥५॥
विषय
विद्वान् मित्रों और श्रेष्ठों का आदर करने का उपदेश । सूर्य चन्द्र या अग्नि सूर्य के समान दो शक्तियों का संसारपालन ।
भावार्थ
जैसे (द्वे ) दो ( विरूपे ) भिन्न-भिन्न रूप रंग वाली स्त्रियां (सु- अर्थे) शुभ प्रयोजन में लगी हुई (चरतः) भिन्न-भिन्न प्रकार का आचरण और आहार विहार करती हैं और (अन्या - अन्या) वे दोनों पृथक्, (अन्या-अन्या) पृथक् या एक दूसरे के (वत्सम् ) बालक को (उपधापयेते) दूध पिलाती हैं । ( अन्यस्याम् ) एक नैं से तो ( हरिः ) श्याम वर्ण का, मनोहर ( स्वधावान् ) उत्तम, शान्ति आदि गुणों वाला पुत्र (भवति) हो और ( अन्यस्याम् ) दूसरी में से (शुक्रः) शुचिकर, शुद्ध, (सुवर्चाः) उत्तम, तेजस्वी पुत्र ( ददृशे ) प्रकट हुआ दिखाई दे इसी प्रकार रात्रि और दिन (द्वे विरूपे चरतः ) दोनों प्रकाश और अन्धकार के कारण भिन्न-भिन्न रूप होकर विचरते हैं । दोनों (अन्या-अन्या वत्सम् उपधापयेते) पृथक्-पृथक् एक दूसरे के बालक के समान चन्द्र और सूर्य को पोषित करते हैं । अथवा वे दोनों एक दूसरे से मिल कर ( वत्सम् ) बसे हुए संसार को पालते पोसते हैं। एक में (हरिः) ताप आदि हरने से हरि, मनोहर, ( स्वधावान् ) अन्नादि ओषधि के पोषक रसों एवं जल, ओस आदि से युक्त चन्द्र उत्पन्न होता है और (अन्यस्याम्) दूसरी, दिन वेला में (शुक्रः) कान्तिमान् (सुवर्चाः) उत्तम तेजस्वी सूर्य ( दहशे ) दिखाई देता है । अथवा - दिन वेला रात्रि से उत्पन्न हुए सूर्य को अधिक तेजस्वी करती है और रात्रि वेला दिन के अन्तिम प्रहर में उत्पन्न अग्नि को अधिक उज्ज्वल कर देती है । जलादि रस के शोषण करने से सूर्य 'हरि' है और कान्तिमान् होने से अग्नि 'शुक्र' है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्मः । अग्निः । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
धात्रीद्वय स्तन्यपान
पदार्थ
१. ३१वें अध्याय की समाप्ति पर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ' इन शब्दों में कहा था कि 'धन व ज्ञान' वे दो तेरी पत्लियाँ हैं। इसी बात को 'यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च' इन शब्दों में दुहराया गया है [क्षत्रमिति धननाम - नि० २।१० ] । यहाँ 'ब्रह्म' ज्ञान का वाचक है और 'क्षत्र' धन का। ये दोनों ही मनुष्य के पालन करनेवाले हैं। यहाँ इनका पालक धात्रियों के रूप में चित्रण है। (द्वे) = ये 'श्री और लक्ष्मी' दोनों (विरूपे) = परस्पर भिन्न रूपवाली हैं-एक आन्तर है तो दूसरी बाह्य । अथवा ये दोनों ही विशिष्ट रूपवाली हैं। (चरतः) = [परिचरत:] ये दोनों इस प्रभुभक्त की परिचर्या सेवा करती है। मानव-जीवन के लिए धन व ज्ञान दोनों सहायक हैं। (स्वर्थे) = [सु अर्थ ] दोनों ही उत्तम प्रयोजनवाले हैं। (अन्यान्या) = दोनों अलग-अलग (वत्सम्) = उस प्रभु के प्रिय को अथवा अपने जीवन से प्रभु का प्रतिपादन करनेवाले को [वदति] उपधापयेते दूध पिलाती हैं, अर्थात् उसका पोषण करती हैं। २. इनमें से (अन्यस्याम्) = एक में तो यह (वत्स) = प्रभु का प्रिय पुत्र [क] (हरि:) = अपने दुःखों को दूर करनेवाला तथा [ख] (स्वधावान्) = अपना धारण करनेवाला भवति होता है, अर्थात् धन के द्वारा ये दुःखों को दूर करने के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटा पाता है, रोगादि होने पर औषधों के लिए धन का विनियोग करता है और अपने धारण के लिए आवश्यक भोजनादि सामग्री का संग्रह करने में समर्थ होता है। एवं प्रभुभक्त के लिए श्री के दो ही उपयोग हैं १. दु:ख दूर करने के लिए और २. धारण के लिए आवश्यक सामग्री का संग्रह। ३. (अन्यस्याम्) = दूसरी लक्ष्मीरूप धात्री में यह (शुक्रः) = ज्ञान की ज्योति से उज्ज्वल तथा (सुवर्चा:) = उत्तम वर्चस् व तेजवाला (ददृशे) = दिखता है। शुक्र शब्द 'शुच् दीप्तौ' धातु से बना है। ज्ञानाग्नि से यह दीप्त होता है, क्योंकि ज्ञानाग्नि इसके मलों को नष्ट कर देती है। ज्ञान से काम-क्रोध अथवा राग-द्वेषादि के मल भस्म कर दिये जाते हैं। वासनारूप मल के नष्ट होने पर यह भी परिणाम होता है कि यह भोगविलास में न फँसने से उत्तम तेजवाला बना रहता है। एवं, प्रभुभक्त में ज्ञान के भी दो परिणाम दिखते हैं १. नैर्मल्य के कारण दीप्ति, तथा २. विलास से दूर रहने के कारण विशिष्ट तेजस्विता । अपने ज्ञान से व ज्ञानजन्य तेजस्विता से सब शत्रुभूत वासनाओं को समाप्त करनेवाला यह वत्स - प्रभुभक्त 'कुत्स' कहलाता है [ कुथ हिंसायाम्] काम-क्रोधादि का हिंसन करनेवाला ।
भावार्थ
भावार्थ-लक्ष्मी व श्रीरूप धात्रियों का दुग्धपान करके हम 'हरि, स्वाधावान्, शुक्र व सुवर्चा:' बनें। हम सब दुःखों से दूर हों, अपना धारण करने में समर्थ हों, देदीप्यमान व तेजस्वी हों।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात अनुभयाभेदरूपकालंकार आहे. जशा दोन भिन्न भिन्न स्रिया (किंवा गाई) भिन्न भिन्न बालकाला वाढवितात. एकीमुळे एक शांतताप्रिय अमृतगुणयुक्त बालक बनते व दुसरीमुळे तेजस्वी व शत्रूंना दुःखदायी बालक असते. त्याप्रमाणे दिवस व रात्र या दोन स्रिया होत. त्या संसाररूपी बालकाचे पालन करतात. त्यापैकी रात्ररूपी स्री ही अमृतगुणी प्रसन्नचित्त चंद्ररुपी बालकाला उत्पन्न करते व दिवसरूपी स्री ही सूर्यरूपाने तेजस्वी बालकाला उत्पन्न करते.
विषय
रात्र आणि दिवस जगाचे रक्षण करतात, यावषियी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (स्वर्थे) सुंदर प्रयोजन (समोर ठेऊन कार्य करणार्या) (द्वे) दोन (विरूपे) भिन्न दोन रूपवती स्त्रिया (चरतः) भोजन आदी गृहकार्य करतात. यापैकी (अन्यान्या) प्रत्येक वेगवेगळ्या वेळी स्वतंत्रपणे (वत्सम्) बोबडे बोल बोलण्याच्या. त्या दोनपैकी (अन्यस्याम्) एकीच्या पोटीं (स्वधावान्) शान्ति आदी गुणांनी युक्त (हरिः) मनोहारी असा मुलगा जन्म घेतो. आणि (शुक्रः) शीघ्रकारी (सुवर्चाः) सुंदर तेजस्वी एक पुत्र (अन्यस्याम्) दुसरीच्या पोटी जन्मलेला (ददृशे) दिसून येतो. (ही एक दिसून येतो. (ही एक प्रहेलिका वा गूढ काव्य आहे आणि त्याचे उत्तर पुढे दिले आहे.) याच प्रकारे उदात प्रयोजन समोर ठेऊन काळी रात्र आणि श्वेत दिवस हे दोन भिन्न-भिन्न रूपवान रात्र-दिवस विद्यमान आहेत. दोघे भिन्न दोन वेळी संसाररूप बालकाला दूध पाजवितात. या दोनपैकी रात्र अमृतरूप गुणवान मनोहर चंद्ररूप बालकाला जन्म देते आणि दिनरूप स्त्रीला पवित्र कर्ता सुंदर तेजस्वी सूर्यरूप पुत्र उत्पन्न होतो. मनुष्यांनो, तुम्ही वरील आलंकारिक रूप प्रश्नांचे उत्तर समजून घ्या. ॥5॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात अनुभयारूपकालंकार आहे. ज्याप्रमाणे दोन स्त्रिया अथवा दोन गायी संतानाची इच्छा करीत पृथक् पृथक राहून भिन्न-भिन्न वेळी एका बालकाची रक्षा करतात. त्यापैकी एकीला हृदयाला अति प्रिय असा महागुणी शांतिशील मुलगा व्हावा आणि दुसरीला शीघ्रकार्यकारी तेजस्वी शत्रूना दुःखदायी बालक जन्मावा, त्याप्रमाणे भिन्न दोन रूपवान दोन म्हणजे रात्र-दिवस भिन्न भिन्न वेळी संसाररूप बालकाचे पालन करतात- ते कशाप्रकारे? रात्र रूप स्त्री अमृत वर्षा करणार्या चित्तहर चंद्ररूप बालक उत्पन्न करते आणि दिवसरूप स्त्री तेजोमय सुंदर प्रकाशवान सूर्य पुत्राला जन्म देते. ॥5॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Just as two women, with fair aim, unlike in semblance, feed themselves, and each in succession nourishes a child in embryo, and one bears a quiet, fascinating babe, and the other an active, fair, shining babe, so do dark and bright night and day exist, and work for uplift of the world as a child. In one of them is born the peaceful Moon, pleasing to the mind ; and in the other is born the beautiful, purifying and lustrous Sun.
Meaning
Two powers of nature (the night and day), both different in form and colour, are busy doing good work. Both (like two women) separately nurse each other’s child. In one develops and arises the moon, soothing and brilliant, bearing its own bliss and beauty. In the other develops and arises the sun, a blazing radiant power which illuminates and purifies everything.
Translation
Two, opposed in their nature, are seen here working towards their respective goals. Both of them have one child each. One has golden sun, the self-sustained. The other has the brilliant and shining. (Sun is the child of the dawn and moon is the child of the night). (1)
Notes
Virupe, different in form. Svarthe, सु शोभनोऽर्थो ययोः ते, working for praiseworthy goals. Dhāpayete, those two nourish (a child each). Hariḥ, हरितवर्णोऽग्नि:, golden-coloured fire. Also golden coloured sun. Sukraḥ, bright (sun). Or, bright (moon). Dawn and dusk rear one child each, the sun and the fire (or moon) respectively.
बंगाली (1)
विषय
রাত্রিদিবসৌ জগৎপালকাবিত্যাহ ॥
দিন-রাত্রি জগতের রক্ষাকারী, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে মনুষ্যগণ! যেমন (স্বর্থে) সুষ্ঠু প্রয়োজনসম্পন্না (দ্বে) দুইটি (বিরূপে) ভিন্ন ভিন্ন রূপের স্ত্রীগণ (চরতঃ) ভোজনাদি আচরণ করে এবং (অন্যান্যা) একৈক ভিন্ন ভিন্ন সময়ে (বৎসম্) নিরন্তর কথা বলে সেই এক বালককে (উপ, ধাপয়েতে) নিকটে করিয়া দুগ্ধ পান করায়, সেই দুইটির মধ্য হইতে (অন্যস্যাম্) এককে (স্বধাবান্) প্রশস্ত শান্তি আদি অমৃত তুল্য গুণযুক্ত (হরিঃ) মনকে হরণকারী পুত্র (ভবতি) হয় এবং (শুক্রঃ) শীঘ্রকারী (সুবর্চাঃ) সুন্দর তেজস্বী (অন্যস্যাম্) অন্যটায় হওয়া (দদৃশে) দেখা যায় তদ্রূপ সুন্দর প্রয়োজনযুক্ত দুইটি কৃষ্ণ-শ্বেত ভিন্ন রূপবিশিষ্ট রাত্রি-দিন বর্ত্তমান এবং একৈক ভিন্ন ভিন্ন সময়ে এক সংসাররূপ বালককে দুগ্ধাদি পান করায়, সেই দুইয়ের মধ্য হইতে এক রাত্রিতে অমৃতরূপ গুণযুক্ত মনের প্রসাদক চন্দ্র উৎপন্ন হয় এবং দ্বিতীয় দিনরূপ বেলায় পবিত্রকর্ত্তা সুন্দর তেজসম্পন্ন সূর্য্যরূপ পুত্র লক্ষিত হয়, এই রকম তোমরা জানিবে ॥ ৫ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে অনুভয়াভেদ রূপকালঙ্কার আছে । যেমন দুইজন স্ত্রী অথবা গাভি সন্তান প্রয়োজনে পৃথক পৃথক বর্ত্তমান কালভেদে এক বালকের রক্ষা করে, সেই দুই জনের মধ্য হইতে একের মধ্যে হৃদয়কে প্রিয় মহাগুণী শান্তিশীল বালক হয় এবং দ্বিতীয়ের মধ্যে শীঘ্রকারী তেজস্বী শত্রুদিগের দুঃখদায়ী বালক হয় তদ্রূপ ভিন্নস্বরূপযুক্ত দুইটি রাত্রি-দিন ভিন্ন-ভিন্ন সময়ে এবং সংসার স্বরূপ বালকের পালন করে । কী প্রকারে? রাত্রি অমৃতবর্ষক চিত্রকে প্রসন্নকারী চন্দ্র রূপ বালককে উৎপন্ন করিয়া এবং দিন-রূপ স্ত্রী তেজোময় সুন্দর প্রকাশযুক্ত সূর্য্যরূপ পুত্রকে উৎপন্ন করিয়া ॥ ৫ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
দ্বে বিরূ॑পে চরতঃ॒ স্বর্থে॑ऽঅ॒ন্যান্যা॑ ব॒ৎসমুপ॑ ধাপয়েতে ।
হরি॑র॒ন্যস্যাং॒ ভব॑তি স্ব॒ধাবা॑ঞ্ছু॒ক্রোऽঅ॒ন্যস্যাং॑ দদৃশে সু॒বর্চাঃ॑ ॥ ৫ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
দ্ব ইত্যস্য কুৎস ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । স্বরাট্ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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