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यजुर्वेद अध्याय - 34

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  • यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 15
    ऋषिः - देवश्रवदेववातौ भारतावृषी देवता - अग्निर्देवता छन्दः - विराडनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    127

    इडा॑यास्त्वा प॒दे व॒यं नाभा॑ पृथि॒व्याऽअधि॑।जात॑वेदो॒ नि धी॑म॒ह्यग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोढ॑वे॥१५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इडा॑याः। त्वा॒। प॒दे। व॒यम्। नाभा॑। पृ॒थि॒व्याः। अधि॑ ॥ जात॑वेद॒ इति॑ जात॑ऽवेदः। नि। धी॒म॒हि॒। अग्ने॑। ह॒व्याय॑। वोढ॑वे ॥१५ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इडायास्त्वा पदे वयन्नाभा पृथिव्याऽअधि । जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोढवे ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इडायाः। त्वा। पदे। वयम्। नाभा। पृथिव्याः। अधि॥ जातवेद इति जातऽवेदः। नि। धीमहि। अग्ने। हव्याय। वोढवे॥१५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 34; मन्त्र » 15
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    किंभूतो जनो राज्याधिकारे स्थापनीय इत्याह॥

    अन्वयः

    हे जातवेदोऽग्ने! वयमिडायाः पदे पृथिव्या अधि नाभा त्वा हव्याय वोढवे नि धीमहि॥१५॥

    पदार्थः

    (इडायाः) प्रशंसिताया वाचः (त्वा) त्वाम् (पदे) प्रतिष्ठायाम् (वयम्) अध्यापकोपदेशकाः (नाभा) नाभौ मध्ये (पृथिव्याः) विस्तीर्णाया भूमेः (अधि) उपरि (जातवेदः) जातप्रज्ञान (नि) नितराम् (धीमहि) स्थापयेम (अग्ने) अग्निरिव तेजस्विन् विद्वन् राजन्! (हव्याय) होतुं दातुमर्हम्। अत्र विभक्तिव्यत्ययः। (वोढवे) वोढुं प्राप्तुं प्रापयितुं वा॥१५॥

    भावार्थः

    हे विद्वन् राजन्! यस्मिन्नधिकारे त्वां वयं स्थापयेम, तमधिकारं धर्मपुरुषार्थाभ्यां यथावत् साध्नुहि॥१५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    कैसा मनुष्य राज्य के अधिकार पर स्थापित करने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (जातवेदः) उत्पन्न बुद्धिवाले (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् राजन्! (वयम्) अध्यापक तथा उपदेशक हम लोग (इडायाः) प्रशंसित वाणी की (पदे) व्यवस्था तथा (पृथिव्याः) विस्तृत भूमि के (अधि) ऊपर (नाभा) मध्यभाग में (त्वा) आपको (हव्याय) देने योग्य पदार्थों को (वोढवे) प्राप्त करने वा कराने के लिये (नि, धीमहि) निरन्तर स्थापित करते हैं॥१५॥

    भावार्थ

    हे विद्वान् राजन्! जिस अधिकार में आपको हम लोग स्थापित करें, उस अधिकार को धर्म और पुरुषार्थ से यथावत् सिद्ध कीजिये॥१५॥

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    विषय

    पृथ्वी के केन्द्र में राजा की स्थिति ।

    भावार्थ

    हे ( जातवेदः ) ऐश्वर्यवन्! हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्विन्, अग्रणी सेनानायक, (त्वा) तुझको ( वयम् ) हम ( पृथिव्याः नाभा अधि) पृथिवी के केन्द्र में और ( इडायाः पदे अधि) स्तुति योग्य प्रजा के प्रतिष्टित पद पर अथवा वाणी या आज्ञा प्रदान करने के आज्ञापक पद पर (हव्याय) स्तुति योग्य राजपद के ( वोढवे ) धारण करने के लिये (निधीमहि ) स्थापित करते हैं । (२) आचार्य पक्ष में- हे विद्वन् ! तुझको हम पृथिवी के बीच, उत्तम वाणी के प्रतिष्ठित आचार्य पद पर प्रदान योग्य ज्ञान दान के लिये स्थापित करें ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    देवश्रवोदेववातौ भारतावृषी । अग्निदेवता ।विराडनुष्टुप् । गान्धारः ॥

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    विषय

    देवश्रवदेववात

    पदार्थ

    पिछले तथा प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि 'देवश्रवदेववात' [भारत] हैं। ये माता-पिता, आचार्य व अतिथि आदि देवों से ज्ञान प्राप्त करके 'देवश्रव' नामवाले हुए हैं। इन्हीं देवों से सदा उत्तम प्रेरणाओं की प्राप्त करने के कारण इनका नाम 'देववात' [वा - ईर - प्रेरण] हो गया। इन्होंने वेदवाणी को अपने में भरा, अतः ये 'भारत' हैं। ज्ञान प्राप्त करके, यज्ञादि उत्तम कर्मों की प्रेरणा लेकर ये सदा यज्ञादि में लगे रहते हैं, सबके साथ मिलकर चलते हैं और दान की वृत्ति को कभी अपने से दूर नहीं करते। यही दान की वृत्ति नैत्यिक अग्निहोत्र के रूप में भी प्रकट होती है और यह कहता है कि हे (जातवेदः) = प्रत्येक पदार्थ को प्राप्त करानेवाले [जातं वेदयति] अग्ने हव्य पदार्थों को आगे और आगे ले जानेवाले अग्ने ! (हव्याय वोढवे) = हव्य पदार्थों को ढोने के लिए (वयम्) = हम (त्वा) = तुझे (पृथिव्याः नाभौ अधि) = इस पृथिवी की यज्ञरूप नाभि में [अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः] (निधीमहि) = स्थापित करते हैं। यज्ञ के अभाव में किसी का कल्याण नहीं, यह पृथिवीलोक तो यज्ञजनित पर्जन्यों से ही प्रीणित होता है। ('यज्ञाद् भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्नसंभवः') = अन्न की उत्पत्ति करनेवाला पर्जन्य यज्ञ से उत्पन्न होता है। यह अग्नि 'जातवेद' है, इसमें डाले हुए हव्य पदार्थ को यह प्रत्येक देव को प्राप्त कराता है। अग्नि जलायी और हव्य पदार्थ डाले' इतना ही नहीं, यह उन हव्य पदार्थों को (इडायाः) = वेदवाणी के (पदे) = शब्दों के उच्चरित होने पर डालता है, अर्थात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक यह यज्ञों को करनेवाला बनता है। इस प्रकार इन यज्ञों के प्रसङ्ग से यह वेदवाणी की भी रक्षा करनेवाला बनता है। वेदवाणी इसकी माता है, उसी ने इसका निर्माण किया, उसकी रक्षा करना इसका कर्त्तव्य है।

    भावार्थ

    भावार्थ - यह 'देवश्रवदेववात' यज्ञमय जीवनवाला होता है। मन्त्रोच्चारपूर्वक जातवेद अग्नि में हव्य पदार्थों को डालता है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे विद्वान राजा ! जो अधिकार आम्ही तुम्हाला दिलेला आहे त्या अधिकाराला धर्म व पुरुषार्थाने सिद्ध करा.

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    विषय

    राज्यकार्यासाठी वा राज्यपदावर कशाप्रकारच्या मनुष्याची नेमणूक करावी, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (जातवेदः) जागृत वा सदैव सावध बुद्धी असणारे (अग्ने) अग्नीवत् तेजस्वी हे विद्वान राजा, (वयम्) आम्ही अध्यापक आणि उपदेशगण (इडायाः) प्रशंसनीय वाणीच्या (पदे) अधीन राहून (चांगले वचन बोलत) (पृथिव्याः) विशाल भूमीच्या (अधि) वर (भूतलावर) तसेच (नाभा) मध्यभागीं (त्वा) आपणाला (हव्याय) देण्यास योग्य असे पदार्थ (वोढवे) देण्यासाठी अथवा प्राप्त करून देण्यासाठी (नि, धीमहि) निरंतर वा सदा स्थापित करीत आपले (आमच्याजवळ निवास करण्यासाठी विनंती करीत आहोत) (राजा आमच्याजवळ असल्यामुळे आम्हांस भय राहणार नाही) ॥15॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे विद्वान राजा, आम्ही (प्रजाजन अध्यापक वा उपदेशकगण) आपणांस ज्या अधिकारपदावर स्थापित करीत आहोत, (सभापती, सेनाध्यक्ष, न्यायाधीश आदी पदावर नेमत आहोत,) आपण त्या पदाची कर्तव्यकर्में धर्ममार्गाने व पुरुषार्थ प्रयत्नाने यथोचित पूर्ण करा. ॥15॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O sagacious king, we establish thee on the Earth in its centre in the post of a ruler, for granting us valuable substances.

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    Meaning

    Holy fire and omniscient power of light, in the sanctity of the Divine Word, on the centre-vedi of the earth, we instal you and light you in faith for the creation and diffusion of the fragrant materials and means of life in the state of yajna.

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    Translation

    We set this omnipresent fire divine upon the central point of the earth — which is the seat of the knowledge - for the purpose of receiving oblations. (1)

    Notes

    Iḍāyāḥ pade, at the seat of knowledge. Literally, at the foot of wisdom. Prthivyāḥ nābhā, भूमे: नाभौ , on the central point of the earth. Havyāya voḍhave, for carrying the offerings; for receiv ing oblations.

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    बंगाली (1)

    विषय

    কিংভূতো জনো রাজ্যাধিকারে স্থাপনীয় ইত্যাহ ॥
    কেমন মনুষ্য রাজ্যের অধিকার স্থাপিত করিবে, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (জাতবেদঃ) উৎপন্ন বুদ্ধিসম্পন্ন (অগ্নে) অগ্নির তুল্য তেজস্বী বিদ্বান্ রাজন্! (বয়ম্) অধ্যাপক তথা উপদেশক আমরা (ইডায়াঃ) প্রশংসিত বাণীর (পদে) ব্যবস্থা তথা (পৃথিব্যাঃ) বিস্তৃত ভূমির (অধি) উপর (নাভা) মধ্যভাগে (ত্বা) আপনাকে (হব্যায়) হবন যোগ্য পদার্থগুলিকে (বোঢবে) প্রাপ্ত করিবার বা করাইবার জন্য (নি, ধীমহি) নিরন্তর স্থাপিত করি ॥ ১৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- হে বিদ্বান্ রাজন্ ! যে অধিকারে আপনাকে আমরা স্থাপিত করি সেই অধিকারকে ধর্ম ও পুরুষার্থ হইতে যথাবৎ সিদ্ধ করুন ॥ ১৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ইডা॑য়াস্ত্বা প॒দে ব॒য়ং নাভা॑ পৃথি॒ব্যাऽঅধি॑ ।
    জাত॑বেদো॒ নি ধী॑ম॒হ্যগ্নে॑ হ॒ব্যায়॒ বোঢ॑বে ॥ ১৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ইডায়া ইত্যস্য দেবশ্রবদেববাতৌ ভারতাবৃষী । অগ্নির্দেবতা ।
    বিরাডনুষ্টুপ্ ছন্দঃ । গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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