यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 26
ऋषिः - आङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः
देवता - सविता देवता
छन्दः - विराट् त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
127
हिर॑ण्यहस्तो॒ऽअसु॑रः सुनी॒थः सु॑मृडी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ्।अ॒प॒सेध॑न् र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द् दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः॥२६॥
स्वर सहित पद पाठहिर॑ण्यहस्त॒ इति॒ हिर॑ण्यऽहस्तः। असु॑रः। सु॒नी॒थ इति॑ सुऽनी॒थः। सु॒मृ॒डी॒क इति॑ सुमृडी॒कः। स्ववा॒निति॒ स्वऽवा॑न्। या॒तु॒। अ॒र्वाङ् ॥ अ॒प॒सेध॒न्नित्य॑प॒ऽसेध॑न्। र॒क्षसः॑। या॒तु॒धाना॒निति॑ यातु॒ऽधाना॑न्। अस्था॑त्। दे॒वः। प्र॒ति॒दो॒षमिति॑ प्रतिऽदो॒षम्। गृ॒णा॒नः ॥२६ ॥
स्वर रहित मन्त्र
हिरण्यहस्तोऽअसुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववा यात्वर्वाङ् । अपसेधन्रक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषङ्गृणानः ॥
स्वर रहित पद पाठ
हिरण्यहस्त इति हिरण्यऽहस्तः। असुरः। सुनीथ इति सुऽनीथः। सुमृडीक इति सुमृडीकः। स्ववानिति स्वऽवान्। यातु। अर्वाङ्॥ अपसेधन्नित्यपऽसेधन्। रक्षसः। यातुधानानिति यातुऽधानान्। अस्थात्। देवः। प्रतिदोषमिति प्रतिऽदोषम्। गृणानः॥२६॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यो हिरण्यहस्तः सुनीथोऽसुरः सुमृडीकः स्ववान् देवो रक्षसो यातुधानानपसेधन् प्रतिदोषं गृणानश्चास्थात्, सोऽर्वाङस्मत् सुखाय यातु, तद्वद्यूयं भवत॥२६॥
पदार्थः
(हिरण्यहस्तः) हिरण्यानि ज्योतींषि हस्तवद् यस्य सः (असुरः) प्रक्षेप्ता (सुनीथः) यः सुष्ठु नयति सः (सुमृडीकः) सुष्ठु सुखकरः (स्ववान्) स्वे स्वकीयाः प्रकाशादयो गुणा विद्यन्ते यस्मिन् सः। अत्र दीर्घादटि समानपादे॥ (अष्टा॰८।३।९) रुत्वे भोभगो॰ [अ॰८.३.१७] इत्यनेन रोर्यादेशे च हलि सर्वेषाम् [अ॰८.३.२२] इति लोपः। (यातु) प्राप्नोतु (अर्वाङ्) योऽर्वाचीनान् अञ्चति प्राप्नोति सः (अपसेधन्) दूरीकुर्वन् (रक्षसः) दस्युचोरादीन् (यातुधानान्) अन्यायेन परपदार्थधारकान् (अस्थात्) उत्तिष्ठति उदेति (देवः) प्रकाशकः (प्रतिदोषम्) प्रतिजनं यो दोषस्तम्। अत्रोत्तरपदलोपः। (गृणानः) उच्चरयन् प्रकटयन्॥२६॥
भावार्थः
हे मनुष्याः! सदैवौदार्येण याचमानेभ्यो हिरण्यादिकं दत्त्वा दुष्टाचारान् तिरस्कृत्य धार्मिकेभ्यः सुखं प्रदायाऽहर्निशं सूर्यवत् प्रशंसिता भवत॥२६॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जो (हिरण्यहस्तः) हाथों के तुल्य प्रकाशोंवाला (सुनीथः) सुन्दर प्रकार प्राप्ति कराने (असुरः) जलादि को फेंकनेवाला (सुमृडीकः) सुन्दर सुखकारी (स्ववान्) अपने प्रकाशादि गुणों से युक्त (देवः) प्रकाशक सूर्य्यलोक (यातुधानान्) अन्याय से दूसरों के पदार्थों को धारण करनेवाले (रक्षसः) डाकू, चोर आदि को (अपसेधन्) निवृत्त करता अर्थात् डाकू, चोर आदि सूर्योदय होने पर अपना काम नहीं बना सकते, किन्तु प्रायः रात्रि को ही अपना काम बनाते हैं ओर (प्रतिदोषम्) मनुष्यों के प्रति जो दोष उसको (गृणानः) प्रकट करता हुआ (अस्थात्) उदित होता है, वह (अर्वाङ्) समीपवर्ती पदार्थों को प्राप्त होनेवाला हमारे सुख के अर्थ (यातु) प्राप्त होवे, वैसे तुम होओ॥२६॥
भावार्थ
हे मनुष्यो! मांगनेवालों के लिये उदारता से सुवर्णादि तथा दुष्टाचारियों का तिरस्कार कर और धार्मिक जनों को सुख देके प्रतिदिन सूर्य्य के तुल्य प्रशंसित होओ॥२६॥
विषय
विद्वानों और नायक राजा के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
( हिरण्यहस्त:) सब प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त और सब दिशाओं में अपने किरणरूप हस्तों वाला, ( असुरः ) सबका प्राणदाता, बलवान्, (सुनीथः) सुखपूर्वक सबको प्राप्त, (सुमृडीकः) उत्तम सुखप्रद, ( स्ववान् ) उत्तम गुणों धनों से युक्त (अर्वाङ् याति) अपने गुणों को प्रकट करता हुआ सूर्य या वायु जिस प्रकार प्राप्त होता है उसी प्रकार यह राजा और सभापति (हिरण्यहस्तः) प्रजा के हित और रमणीय सुखकारी पदार्थों को और सुवर्ण आदि बहुमूल्य धनैश्वयों को अपने हाथ में, अपने अधीन रख कर तेजस्वी (असुर) समस्त प्रजाओं को प्राण देने वाला, उन पर अनुग्रह करने और उनको वृत्ति देने वाला, (सुनीथः) उत्तम मार्ग से प्रजा को चलाने हारा या उत्तम स्तुतियोग्य, (सुमृडीकः) सुखकारी, दयालु, ( स्ववान् ) धनाढ्य, एवं अपने आत्मबल से युक्त होकर (अर्वा यातु) शत्रु के अभिमुख और प्रजा के प्रति भी मान करे और वह (यातु- धानात् ) प्रजाओं को पीड़ा देने वाले, एवं दण्डित करने योग्य ( रक्षसः). दुष्ट, चोर, डाकू आदि प्रजापीड़क लोगों को ( अप सेधन् ) दूर करता हुआ (प्रतिदोषम् ) प्रजा के प्रत्येक दोष के सुधार के लिये उनको (गृणान:) उत्तम मार्गोपदेश करता हुआ (देव:) दानशील, विद्वान्, सर्वद्रष्टा राजा ( अस्थात् ) सिंहासन पर स्थिति प्राप्त करे । अथवा (प्रतिदोषं गृणान: ) प्रति रात्रि काल में या प्रतिदिन लोगों को सावधान करता हुआ विराजे । 'रक्षसः ' — रक्षो रक्षयितव्यमस्मात् । इति निरु० । ४ । १८ ॥ 'प्रतिदोषम्'– प्रतिजनं यो दोषः तम् । श्रुतिस्मृतिविहितधर्म पराङ्मुखानां यावन्तो दोषास्तावतो गृणानः इति महीधरः ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
हिरण्यस्तूपः । सविता । विराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
स्वास्थ्यरूप धन की प्राप्ति
पदार्थ
१. (हिरण्यहस्तः) = सुवर्णमय हाथवाला । यही भावना पिछले मन्त्र में 'हिरण्यपाणिः' शब्द से व्यक्त हुई है। पाणि शब्द में रक्षा करने की भावना थी तो हस्त शब्द में [हस्तो हन्तेः] नष्ट करने का भाव है। सूर्य अपनी किरणों में विद्यमान स्वर्ण के प्रभाव से हमारे शरीरों की रक्षा करता है और रोगों का नाश करता है। २. (असुरः) = [असून् राति] यह प्राणशक्ति देनेवाला है। प्रश्नोपनिषद् में कहा है कि ('प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य:') = यह सूर्य क्या उदय होता है, प्रजाओं का प्राण ही उदय होता है । ३. (सुनीथः) = सर्वत्र प्रकाश फैलाने के कारण उत्तम मार्गों से ले चलता है। ४. (सुमृडीक:) = उत्तम मार्ग से ले चलकर हमारे जीवनों को उत्तम सुख प्राप्त कराता है। ५. (स्ववान्) = यह उत्तम धनवाला है। स्वास्थ्य ही सर्वोत्तम धन है और उसे प्राप्त कराने में यह सूर्य सर्वमहान् सहायक है। ६. यह सूर्य (यातुधानान्) = शरीर में शतशः पीड़ाओं का आधान करनेवाले (रक्षसः) अपने रमण के लिए औरों का क्षय करनेवाले रोगकृमिरूप राक्षसों को (अपसेधन्) = दूर करता हुआ (अर्वाङ् यातु) = हमें अभिमुखता से प्राप्त हो। हम सूर्याभिमुख होंगे तो रोगकृमियों का संहार होकर हमें स्वास्थ्यरूपी धन की प्राप्ति होगी । ७. उल्लिखित कारणों से ही 'हिरण्यहस्त, असुर, सुनीथ, सुमृडीक व स्ववान्' होने से ही यह (देवः) = दिव्य गुणोंवाला प्रकाशमय सूर्य (प्रतिदोषम्) = प्रतिरात्रि, अर्थात् सदा (गृणान:) = स्तुति किया जाता हुआ (अस्थात्) = ठहरता है, अर्थात् सूर्य के महत्त्व को समझनेवाले लोग सदा सूर्य का स्तवन करते हैं। उसके गुणों का प्रतिदिन स्मरण करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ - रोगकृमियों के संहार के लिए प्रात:सायं सूर्याभिमुख होकर ध्यान करना अत्यन्त उपयोगी है।
मराठी (2)
भावार्थ
हे माणसांनो ! याचकांना उदारतेने सुवर्ण वगैरे द्या. दुष्ट लोकांचा तिरस्कार करा व धार्मिक लोकांना सुखी करून सुर्यासारखे प्रकाशमान बना.
विषय
पुन्हा त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (हिरण्यहस्तः) सोनेरी किरणें हीच ज्याचे हात आहेत, असा (सुनीथः) सर्वांना सुंदर प्रिय रूपाने पुढे नेणारा (कार्यप्रवण करणारा) (असुरः) जल आदीना शोषणारा व फेकणारा, तसेच (सुमृडीकः) सुंदर सुखकर आणि (स्ववान्) आपल्या प्रकाश आदी गुणांमुळे सर्व हितकारी असा (देवः) प्रकाशदाता सूर्यलोक (यातुधानान्) अन्यायाने अन्यजनांचे धन हरण करणार्या (रक्षसः) लुटारू, दरोडेखोर, चोर आदींना (अपसेधन्) दुष्कर्मांपासून निवृत्त करतो म्हणजे ते लुटारू, चोर आदी दुष्टलोक सूर्योदय झाल्यानंतर आपली दुष्कर्में करू शकत नाहीत, मात्र सूर्य आकाशात नसतांना रात्रीच्या अंधकारात ते आपला हेतू साध्य करतात. अशा प्रकारे (प्रतिदोषम्) मनुष्यांतील जे चोरी आदी दोष आहेत, ते (गृणानः) दूर करीत तो सूर्य (अस्थात) उदित होतो. (अर्वाङ्) आपल्या समीपस्थ वस्तूंना अधिक प्रभावाने प्राप्त होणारा तो सूर्य आम्हा मनुष्य समाजाच्या (यातु) सुखाकरिता असो. ॥26॥
भावार्थ
भावार्थ - हे मनुष्यानो, याचकासाठी उदारमनाने सुवर्ण आदीचे दान करीत जा. दुराचारी जनांचा तिरस्कार व निवारण सर्वांकडून प्रशंसित व्हा. ॥26॥
इंग्लिश (3)
Meaning
The Sun. with its hands of gleaming rays, kind benefactor, the bringer of rain, the giver of happiness, self refulgent, driving off demons and thieves, rises, removing human physical weaknesses. May he bring us happiness, illuminating all substances.
Meaning
Come Savita, self-refulgent lord of golden beams, rise and shine forth, energizing, lighting the path of guidance, gracious and blissful, throwing off the wicked, the unjust and the evil doers, and exposing every sin and crime.
Translation
May the golden-handed, life-bestowing, well guiding, exhilarating and affluent sun be present with us at the place of worship. The solar radiations drive away worms and germs, particularly in the evening, if duly utilized. (1)
Notes
Asurah, असून् प्राणान् ददाति य: स:,one that bestows life. Sunithaḥ, नीथ: स्तुति:, well-praised. Yajurveda Samhita Apa sedhan rakṣasaḥ, driving away worms and germs. Prati doşam, towards evening. Yātudhānān, to them, who cause pain.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যাহা (হিরণ্যহস্তঃ) হস্তের তুল্য প্রকাশ সম্পন্ন (সুনীথঃ) সুন্দর প্রকার প্রাপ্তি করাইবার (অসুরঃ) জলাদিকে প্রক্ষিপ্তকারী (সুমৃডীকঃ) সুন্দর সুখকারী (স্ববান্) স্বীয় প্রকাশাদি গুণে যুক্ত (দেবঃ) প্রকাশক সূর্য্যলোক (য়াতুধানান্) অন্যায় পূর্বক অন্যের পদার্থ সমূহের ধারক (রক্ষসঃ) ডাকাইত চোরাদিকে (অপসেধন্) নিবৃত্ত করে অর্থাৎ ডাকাইত, চোরাদি সূর্য্যোদয় হইলে নিজের কর্ম্ম সাধন করিতে পারে না, কিন্তু প্রায়ঃ রাত্রিতেই স্বীয় কর্ম্ম সাধন করিয়া থাকে এবং (প্রতিদোষম্) মনুষ্যদিগের প্রতি যে দোষ তাহাকে (গৃণানঃ) প্রকট করিয়া (অস্থাৎ) উদয় হয় (অর্বাঙ্) সমীপবর্ত্তী পদার্থগুলিকে যে প্রাপ্ত করে সে আমাদের সুখের জন্য (য়াতু) প্রাপ্ত হইবে, সেইরূপ তুমি হও ॥ ২৬ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যাচনাকারীদের জন্য উদারতাপূর্বক সুবর্ণাদি দিবে এবং দুষ্টাচারীদের তিরস্কার করিয়া এবং ধার্মিকগণকে সুখ দিয়া প্রতিদিন সূর্য্যের তুল্য প্রশংসিত হও ॥ ২৬ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
হির॑ণ্যহস্তো॒ऽঅসু॑রঃ সুনী॒থঃ সু॑মৃডী॒কঃ স্ববাঁ॑ য়াত্ব॒র্বাঙ্ ।
অ॒প॒সেধ॑ন্ র॒ক্ষসো॑ য়াতু॒ধানা॒নস্থা॑দ্ দে॒বঃ প্র॑তিদো॒ষং গৃ॑ণা॒নঃ ॥ ২৬ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
হিরণ্যহস্ত ইত্যস্য আঙ্গিরসো হিরণ্যস্তূপ ঋষিঃ । সবিতা দেবতা ।
বিরাট্ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ । ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal