यजुर्वेद - अध्याय 34/ मन्त्र 49
ऋषिः - प्राजापत्यो यज्ञ ऋषिः
देवता - ऋषयो देवताः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
95
स॒हस्तो॑माः स॒हच्छ॑न्दसऽआ॒वृतः॑ स॒हप्र॑मा॒ऽऋष॑यः स॒प्त दैव्याः॑।पूर्वे॑षां॒ पन्था॑मनु॒दृश्य॒ धीरा॑ऽअ॒न्वाले॑भिरे र॒थ्यो̫ न र॒श्मीन्॥४९॥
स्वर सहित पद पाठस॒हस्तो॑मा॒ इति॑ स॒हऽस्तो॑माः। स॒हछ॑न्दस॒ इति॑ स॒हऽछ॑न्दसः। आ॒वृत॒ इत्या॒ऽवृतः॑। स॒हप्र॑मा॒ इति॑ स॒हऽप्र॑माः। ऋष॑यः। स॒प्त। दैव्याः॑। पूर्वे॑षाम्। पन्था॑म्। अ॒नु॒दृश्येत्य॑नु॒ऽदृश्य॑। धीराः॑। अ॒न्वाले॑भिर॒ इत्य॑नु॒ऽआले॑भिरे॒। र॒थ्यः᳕। न। र॒श्मीन् ॥४९ ॥
स्वर रहित मन्त्र
सहस्तोमाः सहच्छन्दसऽआवृतः सहप्रमाऽऋषयः सप्त दैव्याः । पूर्वेषाम्पन्थामनुदृश्य धीराऽअन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन् ॥
स्वर रहित पद पाठ
सहस्तोमा इति सहऽस्तोमाः। सहछन्दस इति सहऽछन्दसः। आवृत इत्याऽवृतः। सहप्रमा इति सहऽप्रमाः। ऋषयः। सप्त। दैव्याः। पूर्वेषाम्। पन्थाम्। अनुदृश्येत्यनुऽदृश्य। धीराः। अन्वालेभिर इत्यनुऽआलेभिरे। रथ्यः। न। रश्मीन्॥४९॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ के ऋषयो भवन्तीत्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यथा सहस्तोमाः सहछन्दस आवृतः सहप्रमाः सप्त दैव्या धीरा ऋषयो रथ्यो रश्मीन्नेव पूर्वेषां पन्थामनुदृश्यान्वालेभिरे, तथा भूत्वा यूयमप्याप्तमार्गमण्वालभध्वम्॥४९॥
पदार्थः
(सहस्तोमाः) स्तोमैः श्लाघाभिस्सह वर्त्तमाना यद्वा सहस्तोमाः शास्त्रस्तुतयो येषान्ते (सहछन्दसः) सह छन्दांसि वेदाऽध्ययनं स्वातन्त्र्यं सुखभोगो वा येषान्ते (आवृतः) ब्रह्मचर्य्येण सकला विद्या अधीत्य गुरुकुलान्निवृत्य गृहमागताः (सहप्रमाः) सहैव प्रमा यथार्थं प्रज्ञानं येषान्ते (ऋषयः) वेदादिशास्त्रार्थविदः (सप्त) पञ्च ज्ञानेन्द्रियाण्यन्तःकरणमात्मा च (दैव्याः) देवेषु गुणकर्मस्वभावेषु कुशलाः (पूर्वेषाम्) अतीतानां विदुषाम् (पन्थाम्) पन्थानं मार्गम् (अनुदृश्य) आनुकूल्येन दृष्ट्वा (धीराः) ध्यानवन्तो योगिनः (अन्वालेभिरे) अनुलभन्ते (रथ्यः) रथे साधू रथ्यः सारथिः (न) इव (रश्मीन्) रज्जून्॥४९॥
भावार्थः
अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। ये रागद्वेषादिदोषान् दूरतस्त्यक्त्वा परस्परस्मिन् प्रीतिमन्तो भूत्वा ब्रह्मचर्येण धर्माऽनुष्ठानपुरःसरमखिलान् वेदान् विज्ञाय सत्याऽसत्ये विविच्य सत्यं लब्ध्वाऽसत्यं विहायाप्तभावेन वर्त्तन्ते, ते सुशिक्षिताः सारथय इवाऽभीष्टं धर्म्यं मार्गं गन्तुमर्हन्ति, त एवर्षिसंज्ञां लभन्ते॥४९॥
हिन्दी (3)
विषय
अब ऋषि कौन होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्यो! जैसे (सहस्तोमाः) प्रशंसाओं के साथ वर्त्तमान वा जिनकी शास्त्रस्तुति एक साथ हो (सहछन्दसः) वेदादि का अध्ययन वा स्वतन्त्र सुख भोग जिनका साथ हो (आवृतः) ब्रह्मचर्य्य के साथ समस्त विद्या पढ़ और गुरुकुल से निवृत्त होके घर आये (सहप्रमाः) साथ ही जिनका प्रमाणादि यथार्थ ज्ञान हो (सप्त) पांच ज्ञानेन्द्रिय, अन्तःकरण और आत्मा ये सात (दैव्याः) उत्तम गुणकर्मस्वभावों में प्रवीण (धीराः) ध्यानवाले योगी (ऋषयः) वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता लोग (रथ्यः) सारथि (न) जैसे (रश्मीन्) लगाम की रस्सी को ग्रहण करता, वैसे (पूर्वेषाम्) पूर्वज विद्वानों के (पन्थाम्) मार्ग को (अनुदृश्य) अनुकूलता से देख के (अन्वालेभिरे) पश्चात् प्राप्त होते हैं, वैसे होकर तुम लोग भी आप्तों के मार्ग को प्राप्त होओ॥४९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो रागद्वेषादि दोषों को दूर से छोड़ आपस में प्रीति रखनेवाले हों, ब्रह्मचर्य्य से धर्म के अनुष्ठानपूर्वक समस्त वेदों को जान के सत्य-असत्य का निश्चय कर सत्य को प्राप्त हो और असत्य को छोड़ के आप्तों के भाव से वर्त्तते हैं, वे सुशिक्षित सारथियों के समान अभीष्ट धर्मयुक्त मार्ग में जाने को समर्थ होते और वे ही ऋषिसज्ञंक होते हैं॥४९॥
विषय
विद्वानों के कर्तव्य ।
भावार्थ
(रथ्यः) रथारोही पुरुष (न) जिस प्रकार ( रश्मीन् ) घोड़ों की रासों को थामते हैं और वे (सहस्तोमाः) अपने दल के सदा साथ रहते हैं, (सहच्छन्दसः) एक साथ एक चाल से चलते हैं, (सहप्रमाः) वे एक साथ प्रयाण करते हैं और ( पूर्वेषाम् पन्थाम् अनुदृश्य रश्मीन् अनु आलेभिरे ) अपने से पहले गये हुए योद्धा नेताओं के मार्ग को देखकर घोड़ों की रासों को चलाते हैं उसी प्रकार (धीराः) ध्यान-योगशील, धीर, पुरुष (दैव्याः) विजयशील देव, राजा या परमेश्वर के अनुयायी, भक्त, (सप्त) शरीर में सात प्राणों के समान, एवं सदा सर्पणशील, आगे बढ़ने वाले, (ऋषयः) तर्कशील, ज्ञानद्रष्टा विद्वान् ऋषिगण भी (पूर्वेषां पन्थाम् ) अपने पूर्व के विद्वान् पुरुषों के मार्ग को (अनुदृश्य) भली प्रकार देख कर(सहस्तोमाः) एक साथ वेदस्तुतियों का प्रवचन करने वाले, (सहच्छन्दसः) एक साथ गुरु के अधीन वेदपाठ करने वाले, (सहप्रमा:) एक साथ समान रूप से यथार्थ ज्ञान करने हारे, (दैव्याः) गुण कर्म में कुशल( आवृताः) गुरुकुलों से समावर्त्तन से स्नातक होकर (रश्मीन् अनुआलेभिरे) गृहस्थ और राजकार्य की रासों को ग्रहण करते हैं ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्राजापत्यो यज्ञ. । ऋषयः । त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
पितर=पूर्वजों का आदर्श जीवन
पदार्थ
पिछले मन्त्र में वेदाध्येता के लक्षणों में एक लक्षण यह भी था कि वे मान्य - बड़ों का आदर करते हैं। प्रस्तुत मन्त्र में उन्हीं बड़ों के जीवन का चित्रण है। १. (सहस्तोमा:) = ये स्तोमवाले होते हैं, इनका जीवन प्रभुस्तुति के साथ चलता है। खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते ये सदा उस प्रभु का स्मरण करते हैं। इसी से उन्हें जीवनमार्ग का दर्शन होता है। इस स्तवन से उन्हें विघ्नों व बाधाओं में व्याकुल न होने की शक्ति प्राप्त होती है । २. (सहच्छन्दस:) = ये छन्दोंवाले होते हैं, ये सप्तछन्दोरूप वेदवाणी के ज्ञाता बनते हैं। यह ज्ञानाग्नि वासनाओं का विध्वंस करके इनके कर्मों को पवित्र कर देती है। ३. (आवृतः) = ये आवृत होते हैं। इनके दिन का सारा कार्यकलाप ठीक आवर्तन में चलता है, उतने आवर्तन में, जितने में कि 'सूर्य और चन्द्रमा'। इस कार्यनियमितता से इनका स्वास्थ्य ठीक रहकर इन्हें दीर्घायुष्य प्राप्त होता है। ५. (सहप्रमाः) = प्रमा शब्द का अर्थ है 'प्रकृष्टमाप' । इनका जीवन प्रकृष्टमापवाला होता है। ये प्रत्येक क्रिया को माप-तोलकर करते हैं। सब क्रियाओं में 'युक्तचेष्ट' होते हैं, परिणामतः ये सदा स्वस्थ रहते हैं । ५. (ऋषयः) = 'ऋष गतौ' से बनकर यह शब्द गति की सूचना देता है। ये अपने जीवन में सदा क्रियाशील रहते हैं। इसी कारण ये वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते। वासनाओं के शिकार अकर्मण्य पुरुष ही हुआ करते हैं ६. (सप्तदैव्याः) = इनकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन और बुद्धि ये सातों दैव्य होते हैं। ये इनसे 'देव' की ओर चल रहे होते हैं। इनसे ये प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, प्रकृति के स्वादों को भोगने नहीं लग जाते। ७. ये (धीराः) = स्थिर वृत्तिवाले ज्ञानी पुरुष (पूर्वेषाम्) = अपनों से पहले के (पन्थाम्) = मार्ग को जीवन यात्रा को (अनुदृश्य) = बारीकी से देखकर (अनु आलेभिरे) = उनके पदचिह्नों पर चलते हुए सर्वतः गुणों को ग्रहण करते हैं। उसी प्रकार (न) = जैसे (रथ्य:) = एक उत्तम रथवाहक (रश्मीन्) = लगामों को जिस प्रकार एक उत्तम सारथि रश्मि - नियमन में नाममात्र भी प्रमाद नहीं करता, उसी प्रकार ये धीर पुरुष भी गुणग्रहण में प्रमादशून्य होते हैं। अपने जीवन को अधिकाधिक गुणों से अलंकृत करते हुए ये सचमुच पितर पदवी को प्राप्त करते हैं। इन पूर्वजों का जीवन हमें भी प्रेरणा देता है और उस प्रेरणा को प्राप्त करके हम भी अपने जीवनों को उदात्त बनाते हैं। लोकहितकारी जीवन होने से ये पितर 'प्राजापत्य'-प्रजा के रक्षक कहलाते हैं और यज्ञमय जीवन होने के कारण 'यज्ञ' नामवाले हो जाते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- हम अपने जीवनों को स्तुतिमय ज्ञानप्रधान, नियमित आवर्तनवाला, मपी-तुली क्रियाओंवाला, गतिमय, दिव्य व महाजनानुगामी बनाने का प्रयत्न करें। इस शरीररूप रथ पर आरूढ़ होकर बागडोर को अपने काबू में रक्खें।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जे लोक राग द्वेष दूर सारून आपापसात प्रेमाने वागतात. ब्रह्मचर्याचे पालन करून, धर्माचे अनुष्ठान करून संपूर्ण वेद जाणतात. सत्य व असत्याचा निश्चय करून सत्याचा स्वीकार व असत्याचा त्याग करतात आणि आप्तभावाने वागतात ते प्रशिक्षित सारथ्याप्रमाणे धर्मयुक्त मार्गाने जाण्यास समर्थ असतात त्यांनाच ऋषी म्हटले जाते.
विषय
ऋषी कोणास म्हणावे, याविषयी
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, ज्या प्रमाणे (सहस्तोमाः) ज्यांची सर्वजण स्तुती करतात अथवा जे शास्त्रांचे अध्ययन, स्तुती साथ-साथ करतात तसेच (सहछन्दसः) जे वेदांचे अध्ययन मिळून करतात वा जे मिळून सुख उपभोगतात, त्या (वेदादिशास्त्राला आणि योगी जनांनप्रमाणे तुम्हीही व्हा) तसेच जे (आवृतः) ब्रह्मचर्य धारण करीत विद्याध्ययन पूर्ण करून गुरूकुलाहून स्नातक होऊन आपल्या घरी परत येतात आणि (सहप्रमाः) ज्यांचे प्रमाण, विचार, मत सारखे असतात, ते (दैव्याः) उत्तम गुण, कर्म, स्वभावाचे ध्यानमग्न योगी आणि (ऋषयः) वेदशास्त्रज्ञाता विद्वज्जन (एकमेकास अनुकूल राहून इष्टध्येय प्राप्त करतात की (न) जसा (रथ्यः) एक सारथी (रश्मीन्) लगामाच्या साह्याने घोड्यांनी एका दिशेने गंतव्य स्थानाकडे नेतो, तद्वत ते योगी आणि विद्वान (पूर्वेषाम्) पूर्वज विद्वनांच्या (पन्थाम्) मार्गाला (अनु, दृश्य) अनुकूल व हितकारी मानून (अन्वालेभिरे) त्या मार्गावर चालतात, त्याप्रमाणे हे मनुष्यानो, तुम्हीही त्या आप्तजनांच्या मार्गाचे अनुसरण करा. ॥49॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जे लोक राग, द्वेष आदी दोषांना दूर ठेवतात आणि आपसात प्रेमाने राहतात, ब्रह्मचर्य पूर्वक धर्मानुष्ठान करीत, वेदाभ्यास करीत, सत्य-असत्याचा निर्णय करीत केवळ सत्याचाच स्वीकार करतात आणि असत्याचा त्याग करून आप्त पुरूषांनी सांगितल्याप्रमाणे वागतात, ते लोक, जसा एक सारथी घोड्यांना, तद्वत अभीष्ट मार्गाचा अवलंब करू शकतात. त्याच लोकांना ऋषी म्हटले पाहिजे. ॥49॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Those who study together the religious lore, who read together the Vedas and enjoy happiness, who return home from the Gurukula after observing Brahmcharya and completing their studies, who are together advanced in knowledge, who are masters of seven divine forces, are veritable Rishis, the knowers of the Vedas. Such calm, wise persons viewing the path of ancient sages take up the reins of noble deeds like a chariot-driver.
Meaning
Sages and scholars collaborating on projects of common interest, working together on learned subjects, graduates equally competent in reason and science, visionaries of divinity with penetrating senses, mind and intellect, courageous and resolute of will, having studied and realised the paths traversed by the predecessors, extend the bounds of knowledge and hold the reins of the human community on the march to progress.
Translation
Well-versed in praise-songs and sacred verses, skilful in actions and well-equipped with knowledge, the seven divine seers, patient and firm, take up the reins (of the sacrifice), like expert charioteers, keeping in view the path shown by previous sages. (1)
Notes
Sapta daivyā ṛṣayaḥ, seven divine seers. Bharadvāja, Kaśyapa, Gautama, Atri, Viśvāmitra, Jamadagni and Vasistha ( Uvata) पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि अन्तःकरणं आत्मा च, five sense-organs, mind (consience), and the self (soul). (Dayā. ). Rathyah raśmin na, न इव, like a skilled charioteer holding the reins.
बंगाली (1)
विषय
অথ কে ঋষয়ো ভবন্তীত্যাহ ॥
এখন ঋষি কাহারা হয়, এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যেমন (সহস্তোমাঃ) প্রশংসার সহিত বর্ত্তমান বা যাহাদের শাস্ত্রস্তুতি এক সঙ্গে হয় (সহছন্দসঃ) বেদাদির অধ্যয়ন অথবা স্বতন্ত্র সুখ ভোগ যাহাদের সঙ্গে হয় (আবৃতঃ) ব্রহ্মচর্য্য সহ সমস্ত বিদ্যা পড়িয়া এবং গুরুকুল হইতে নিবৃত্ত হইয়া গৃহে আগত (সহপ্রমাঃ) সেই সাথে যাহার প্রমাণাদি যথার্থ জ্ঞান হয় (সপ্ত) পঞ্চ জ্ঞানেন্দ্রিয়, অন্তঃকরণ ও আত্মা এই সাত (দৈব্যাঃ) উত্তম গুণ, কর্ম, স্বভাবে প্রবীণ, (ধীরাঃ) ধ্যানবন্ত যোগী (ঋষয়ঃ) বেদাদি শাস্ত্র সকলের জ্ঞাতাগণ (রথ্যঃ) সারথি (ন) যেমন (রশ্মীন্) লাগামের রজ্জুকে গ্রহণ করে সেইরূপ (পূর্বেষাম্) পূর্বপুরুষ বিদ্বান্দিগের (পন্থাম্) মার্গকে (অনুদৃশ্য) আনুকুল্যপূর্বক দেখিয়া (অন্বালেভিরে) পশ্চাৎ প্রাপ্ত হয় সেইরূপ হইয়া তোমরাও আপ্তদের মার্গ প্রাপ্ত হও ॥ ৪ঌ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে উপমা ও বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যাহারা রাগদ্বেষাদি দোষগুলিকে দূর হইতে ত্যাগ করিয়া পরস্পর প্রীতি রক্ষাকারী ব্রহ্মচর্য্য দ্বারা ধর্মের অনুষ্ঠানপূর্বক সমস্ত বেদ জানিয়া সত্য-অসত্যের নিশ্চয় করিয়া সত্যকে প্রাপ্ত হয় এবং অসত্য পরিত্যাগ করিয়া আপ্ত সকলের ভাবে আচরণ করেন তাহারা সুশিক্ষিত সারথিদের সমান অভীষ্ট ধর্মযুক্ত মার্গে গমন করিতে সমর্থ হয় এবং তাহারাই ঋষিসংজ্ঞক হয় ॥ ৪ঌ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
স॒হস্তো॑মাঃ স॒হচ্ছ॑ন্দসऽআ॒বৃতঃ॑ স॒হপ্র॑মা॒ऽঋষ॑য়ঃ স॒প্ত দৈব্যাঃ॑ ।
পূর্বে॑ষাং॒ পন্থা॑মনু॒দৃশ্য॒ ধীরা॑ऽঅ॒ন্বালে॑ভিরে র॒থ্যো᳕ ন র॒শ্মীন্ ॥ ৪ঌ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
সহস্তোমা ইত্যস্য প্রাজাপত্যো য়জ্ঞ ঋষিঃ । ঋষয়ো দেবতাঃ । ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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