यजुर्वेद - अध्याय 36/ मन्त्र 8
ऋषिः - दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः
देवता - इन्द्रो देवता
छन्दः - द्विपादद्विराड् गायत्री
स्वरः - षड्जः
562
इन्द्रो॒ विश्व॑स्य राजति।शन्नो॑ऽअस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥८॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्रः॑। विश्व॑स्य। रा॒ज॒ति॒ ॥ शम्। नः॒। अ॒स्तु॒। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदे॑। शम्। चतु॑ष्पदे। चतुः॑पद॒ इति॑ चतुः॑ऽपदे ॥८ ॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्रो विश्वस्य राजति । शन्नो अस्तु द्विपदे शञ्चतुष्पदे ॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्रः। विश्वस्य। राजति॥ शम्। नः। अस्तु। द्विपद इति द्विऽपदे। शम्। चतुष्पदे। चतुःपद इति चतुःऽपदे॥८॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे जगदीश्वर! यो भवानिन्द्र इव विश्वस्य राजति, तस्य भवतः कृपया नो द्विपदे शमस्तु नश्चतुष्पदे शमस्तु॥८॥
पदार्थः
(इन्द्रः) विद्युदिवेश्वरः (विश्वस्य) संसारस्य मध्ये (राजति) प्रकाशते (शम्) सुखम् (नः) अस्माकम् (अस्तु) (द्विपदे) पुत्राद्याय (शम्) (चतुष्पदे) गवाद्याय॥८॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे जगदीश्वर! यतो भवान् सर्वत्राऽभिव्यापकः मनुष्यपश्वादीनां सुखमिच्छुरसि, तस्मात् सर्वैरुपासनीयोऽसि॥८॥
हिन्दी (6)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे जगदीश्वर! जो आप (इन्द्रः) बिजुली के तुल्य (विश्वस्य) संसार के बीच (राजति) प्रकाशमान हैं, उन आपकी कृपा से (नः) हमारे (द्विपदे) पुत्रादि के लिये (शम्) सुख (अस्तु) होवे और हमारे (चतुष्पदे) गौ आदि के लिये (शम्) सुख होवे॥८॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे जगदीश्वर! जिससे आप सर्वत्र सब ओर से अभिव्याप्त मनुष्य, पश्वादि को सुख चाहनेवाले हैं, इससे सबको उपासना करने योग्य हैं॥८॥
पदार्थ
पदार्थ = ( इन्द्रः) = परम ऐश्वर्यवान् परमेश्वर ( विश्वस्य ) = सब चर और अचर जगत् को ( राजति ) = प्रकाश करनेवाला और सबका राजा, स्वामी है । ( नः ) = हमारे ( द्विपदे ) = दो पाँववालों के लिए और ( चतुष्पदे ) = चार पाँववालों के लिए भी ( शम् अस्तु ) = कल्याण कर्ता होवे ।
भावार्थ
भावार्थ = हे सर्वशक्तिमन् परमेश्वर ! आप सब चर और अचर जगतों के राजा और स्वामी हैं। आपकी दिव्य ज्योति से ही सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि प्रकाशित हो रहे हैं। आप सब जगतों के प्रकाशक हैं। भगवन्! हमारे सब मनुष्यादि दो पाँववाले और गौ अश्वादि पशु चार पाँववाले जो हम पर सदा उपकार कर रहे हैं, जिनका जीवन ही पर-उपकार के लिए है, इनके लिए भी आप सदा सुख और कल्याणकर्ता होवें ।
विषय
प्रार्थनाविषयः
व्याखान
[इन्द्रः विश्वस्य राजति] हे इन्द्र ! परमैश्र्श्ययुक्त आप सब संसार के राजा हो, सर्वप्रकाशक हो । हे रक्षक! आप कृपा से [नः] हम लोगों के [द्विपदे] जो पुत्रादि, उनके लिए [शम् अस्तु] परमसुखदायक होओ तथा [नः चतुष्पदे] हमारे हस्ती, अश्व और गवादि पशुओं के लिए भी (शम्) परमसुखकारक होओ, जिससे हम लोगों को सदा आनन्द ही रहे ॥ २१ ॥
विषय
शान्तिकरण ।
भावार्थ
(इन्द्र) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर ( विश्वस्य राजति) समस्त संसार के बीच में प्रकाशमान है । राजा समस्त राष्ट्र में (राजति) तेजस्वी हो वह (नः) हमारे (द्विपदे चतुष्पदे शम् अस्तु) दोपाये मनुष्य, भृत्य आदि और चौपाये पशुओं के लिये भी कल्याणकारी हो ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
इन्द्रः । द्विपाद विराड गायत्री । षड्जः ॥
विषय
एकशासन- विश्वशान्ति व विश्वनागरिकता
पदार्थ
१. (इन्द्रः) = वह सर्वशक्तिमान्, सब असुरों को दूर भगानेवाला प्रभु (विश्वस्य) = सारे ब्रह्माण्ड का तथा इस संसार में प्रविष्ट [विश्] सब प्राणियों का राजति शासन व व्यवस्था करता है। जिस दिन हम प्रभु के अध्यात्मशासन का अनुभव करेंगे, उस दिन (नः) = हम (द्विपदे) = दो पाँवों से गति करनेवाले मनुष्यों के लिए (शम्) = शान्ति होगी तथा (चतुष्पदे शम्) = चौपयों, अर्थात् पशुओं के लिए भी शान्ति होगी। वस्तुतः इस अध्यात्मशासन में मनुष्यों के परस्पर संघर्ष का तो प्रश्न ही नहीं, पशुओं से उनका किसी प्रकार का द्वेष न होगा, अर्थात् सिंहादि पशु भी मनुष्य के साथ शान्ति से चलेंगे। वन्य न रहकर वे भी पालतू हो जाएँगे, चिड़िया घर की वस्तु हो जाएँगे। योगदर्शन का ('अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः') = यह सूत्र स्थूलरूप धारण करता हुआ दृष्टिगोचर होगा, २. परन्तु इस अध्यात्मराज्य को ला वही व्यक्ति सकता है जो 'दध्यङ्'- प्रभु का ध्यान करनेवाला है, जो 'आथर्वण' स्थिरवृत्ति का होने से सभी को समान राज्य में रहनेवाला अपना साथी समझता है। सर्वत्र अनुभव करें और सब प्राणियों के साथ
भावार्थ
भावार्थ- हम उस ईश के साम्राज्य का शान्ति से चलने की मनोवृत्तिवाले बनें।
मन्त्रार्थ
(नः-द्विपदे शम्-न:-चतुष्पदे शम् अस्तु) वह हमारे सम्बन्धिजन के लिए कल्याण एवं सुखकारी तया चार पैर वाले गौ आदि के लिए कल्याण करने एवं सुखकारी हो ॥८॥
विशेष
ऋषिः—दध्यङङाथर्वणः (ध्यानशील स्थिर मन बाला) १, २, ७-१२, १७-१९, २१-२४ । विश्वामित्र: (सर्वमित्र) ३ वामदेव: (भजनीय देव) ४-६। मेधातिथिः (मेधा से प्रगतिकर्ता) १३। सिन्धुद्वीप: (स्यन्दनशील प्रवाहों के मध्य में द्वीप वाला अर्थात् विषयधारा और अध्यात्मधारा के बीच में वर्तमान जन) १४-१६। लोपामुद्रा (विवाह-योग्य अक्षतयोनि सुन्दरी एवं ब्रह्मचारिणी)२०। देवता-अग्निः १, २०। बृहस्पतिः २। सविता ३। इन्द्र ४-८ मित्रादयो लिङ्गोक्ताः ९। वातादयः ९० । लिङ्गोक्ताः ११। आपः १२, १४-१६। पृथिवी १३। ईश्वरः १७-१९, २१,२२। सोमः २३। सूर्यः २४ ॥
मराठी (3)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. (विद्युतप्रमाणे) या जगात प्रकाशमान असणाऱ्या परमेश्वरा ! तू सर्वत्र व्याप्त आहेस व मनुष्य आणि पशू इत्यादींचे सुख इच्छितोस त्यामुळेच सर्वांनी उपासना करावी असा आहेस.
विषय
पुनश्च, त्याच विषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे जगदीश्वर, आपण (इन्द्रः) विद्युतप्रमाणे (विश्वस्य) या संसारामध्ये (राजति) सर्वाधिक शोभायमान आहात. आपल्या कृपेने (नः) आमच्या (द्विपदे) पुत्र आदीसाठी (शम्) सर्वत्र सुख व आनंद (अस्तु) असावा. तसेच आमच्या (चतुष्पदे) गाय आदी पशूंकरिताही (शम्) सुख आणि नीरोगता असावी. (ही पार्थना) ॥8॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. हे जगदीश्वर, आपण सर्वत्र सर्वतः व्यापक असून मनुष्य, पशू आदीसाठी सुख चाहणारे व देणारे आहात. यामुळेच सर्वांनी आपली उपासना करावी, हे आवश्यक व उचित आहे. ॥8॥
विषय
प्रार्थना
व्याखान
हे इन्द्रा! सर्व जगाचा परम ऐश्वर्ययुक्त राजा आहेस, तु सर्व प्रकाशक आहेस हे रक्षाका ! तुझी आमच्यावर कृपा असू दे (द्विपदे) आमच्या संतानासाठी तू परम सुखदायक आहेस व (चतुष्पदे) आमचे हत्ती, घोडे, गाई यांच्या साठीही सुखदायक आहेस. ज्यांच्यामुळे आम्ही नेहमी आनंदात राहावे.॥२१॥
इंग्लिश (4)
Meaning
O God, like lightning Thou shinest in the universe, may weal attend our bipeds and our quadrupeds.
Meaning
Indra, lord of light, power and glory, rules the world. By His grace, may all be peace and joy with the humans and with the animals.
Purport
O Master of all power and pelf! You are the sole ruler of the whole universe which abounds in wealth and riches. You are illuminator of all. O Protector of all ! By orona your kind grace there should be peace, plenty and prosperity for our sons and other relations. Kindly bestow also peace on our animals i.e. elephants, horses and cows etc., so that we should always live in happiness.
Translation
The resplendent Lord illumines the universe. May He be gracious to us all, the bipeds as well as the quadrupeds. (1)
Notes
Indraḥ, from यदि परमैश्वर्ये, the resplendent Lord; God Supreme; or the sun. Dvipade, for bipeds, i. e. men or birds. Catuspade, for cattle, cow, horse, sheep, goat etc.
बंगाली (2)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে জগদীশ্বর ! আপনি (ইন্দ্র) বিদ্যুতের ন্যায় (বিশ্বস্য) সংসারের মধ্যে (রাজতি) প্রকাশমান, সেই আপনার কৃপা বলে (নঃ) আমাদের (দ্বিপদে) পুত্রাদির জন্য (শম্) সুখ (অস্তু) হউক এবং আমাদের (চতুষ্পদে) গো আদির জন্য (শম্) সুখ হউক ॥ ৮ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । হে জগদীশ্বর ! যদ্দ্বারা আপনি সর্বত্র সব দিক দিয়া অভিব্যাপ্ত মনুষ্য, পশ্বাদির সুখ কামনাকারী, এইজন্য সকলের উপাসনা করিবার যোগ্য ॥ ৮ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
ইন্দ্রো॒ বিশ্ব॑স্য রাজতি ।
শন্নো॑ऽঅস্তু দ্বি॒পদে॒ শং চতু॑ষ্পদে ॥ ৮ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ইন্দ্র ইত্যস্য দধ্যঙ্ঙাথর্বণ ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । দ্বিপাদ্বিরাড্ গায়ত্রী ছন্দঃ ।
ষড্জঃ স্বরঃ ॥
পদার্থ
ইন্দ্রো বিশ্বস্য রাজতি । শং নো অস্তু দ্বিপদে শং চতুষ্পদে।।২২।।
(যজু ৩৬।৮)
পদার্থঃ (ইন্দ্রঃ) পরম ঐশ্বর্যবান পরমেশ্বর (বিশ্বস্য) সকল চর এবং অচর জগতের (রাজতি) প্রকাশক এবং সবার রাজা। হে পরমাত্মা! তুমি (নঃ) আমাদের (দ্বিপদে) দ্বিপদীদের জন্য এবং (চতুষ্পদে) চতুষ্পদীদের জন্যও (শম্ অস্তু) কল্যাণকারী হও।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ হে সর্বশক্তিমান পরমেশ্বর! তুমি সকল চর এবং অচর জগতের রাজা এবং অধিপতি। তোমার দিব্য জ্যোতি দ্বারাই সূর্য চন্দ্র বিদ্যুৎ আদি প্রকাশিত। তুমি সকল জগতের প্রকাশক। ভগবান! আমাদের সকল মনুষ্যাদি, দ্বিপদী এবং গাভী অশ্বাদি পশু যারা আমাদের সর্বদা উপকার করে, যাদের জীবনই পরের উপকারের জন্য, তাদের জন্য তুমি সর্বদা সুখ এবং কল্যাণের কর্তা হও।।২২।।
नेपाली (1)
विषय
प्रार्थनाविषयः
व्याखान
इन्द्रः विश्वस्य राजति = हे इन्द्र ! परमैश्वर्ययुक्त !! तपाईं समस्त संसार का राजा हुनुहुन्छ, सर्वप्रकाशक हुनुहुन्छ । हे रक्षक ! तपाईंको कृपा ले नः = हाम्रा द्विपदे = जो पुत्रादि छन्, तिनका लागी शम् अस्तु= परमसुखदायक हुनु होस् तथा नः चतुस्पदे= हाम्रा हाति, घोडा र गौ आदि पशु हरु का लागी पनि शम् = परमसुखकारक हुनु होस्, जसले गर्दा हामीहरु लाई सदा आनन्द भई रहोस् ॥२१॥
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