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यजुर्वेद अध्याय - 38

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  • यजुर्वेद - अध्याय 38/ मन्त्र 1
    ऋषिः - आथर्वण ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः
    273

    दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्।आ द॒देऽदि॑त्यै॒ रास्ना॑ऽसि॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम् ॥ आ। द॒दे॒। अदि॑त्यै। रास्ना॑। अ॒सि॒ ॥१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे श्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आ ददेदित्यै रास्नासि ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्॥ आ। ददे। अदित्यै। रास्ना। असि॥१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 38; मन्त्र » 1
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पत्न्या किंभूतया भवितव्यमित्याह॥

    अन्वयः

    हे विदुषि! यतस्त्वमदित्यै रास्नासि तस्मात् सवितुर्देवस्य प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां त्वाऽऽददे॥१॥

    पदार्थः

    (देवस्य) कमनीयस्य (त्वा) त्वाम् (सवितुः) सकलजगदुत्पादकस्य (प्रसवे) उत्पत्तिधर्मके (अश्विनोः) सूर्याचन्द्रमसोः (बाहुभ्याम्) बलवीर्य्याभ्यामिव भुजाभ्याम् (पूष्णः) पोषकस्य (हस्ताभ्याम्) गतिधारणाभ्यामिव कराभ्याम् (आ) (ददे) गृह्णीयाम् (अदित्यै) नाशरहितायै नीत्यै (रास्ना) दात्री (असि) भवसि॥१॥

    भावार्थः

    हे स्त्रि! यथा सूर्यो भूगोलान् प्राणः शरीरमध्यापकोपदेशकौ सत्यं गृह्णन्ति, तथैव त्वामहं गृह्णामि। त्वं सततमनुकूला सुखप्रदा च भव॥१॥

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    हिन्दी (2)

    विषय

    अब अड़तीसवें अध्याय का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में स्त्री को कैसी होना चाहिये, इस विषय को कहा है॥

    पदार्थ

    हे विदुषि स्त्री! जिस कारण तू (अदित्यै) नाशरहित नीति के लिये (रास्ना) दानशील (असि) है, इससे (सवितुः) समस्त जगत् के उत्पादक (देवस्य) कामना के योग्य परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न होनेवाले जगत् में (अश्विनोः) सूर्य और चन्द्रमा के (बाहुभ्याम्) बल-पराक्रम के तुल्य बाहुओं से (पूष्णः) पोषक वायु के (हस्ताभ्याम्) गमन और धारण के समान हाथों से (त्वा) तुझको (आ, ददे) ग्रहण करूं॥१॥

    भावार्थ

    हे स्त्री! जैसे सूर्य्य भूगोलों का, प्राण शरीर का और अध्यापक-उपदेशक सत्य का ग्रहण करते हैं, वैसे ही तुमको मैं ग्रहण करता हूं, तू निरन्तर अनुकूल सुख देनेवाली हो॥१॥

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    विषय

    पृथ्वी स्त्री का समान वर्णन।

    भावार्थ

    हे पृथिवि ! पृथिवीनिवासिनि प्रजे ! हे स्त्रि ! ( देवस्य ) कान्तियुक्त, कामनावान् ( सवितः) सकल जगत् के उत्पादक ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न हुए संसार में (अश्विनोः) सूर्य के समान दिन और रात्रि के समान स्त्री और पुरुष धर्मों से युक्त दायें बायें देहों के ( बाहुभ्याम् ) बाहुरूप बलवीर्यो से और ( पूष्णः हस्ताभ्याम् ) पूषा सर्वपोषक पति या स्वामी के (हस्ताभ्याम् ) हाथों से (वा) मैं तुझको (आददे) ग्रहण करता हूँ । राजा या स्वामी होकर पृथिवी को स्त्री के समान स्वीकार करता हूँ । मैं पति तुझ स्त्री को अपने बाहुओं और हाथों से स्वीकार करता हूँ । है राज्यव्यवस्थे ! राजसभे ! तू (अदित्यै) पृथिवी की (रास्न्ना असि) गाय के बंधी रस्सी के समान बांधने वाली, प्रजाओं को सत्य उपदेश करने वाली, सन्मार्ग पर चलाने वाली है । 'रास्ना' रासृ शब्दे | भ्वादि० । निपातनान्नक औणादिः । रास्ना ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    [ अ० ] दध्यङ् आथर्वणः । सविता | निचृत् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे स्रिये ! सूर्य भूगोलाचा स्वीकार करतो, प्राण शरीराचा स्वीकार करतो व अध्यापक उपदेशक जसा सत्याचा स्वीकार करतात तसा मी तुझा स्वीकार करतो. तू निरंतर अनुकूल सुख देणारी असावीस.

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    विषय

    आता अडतिसाव्या अध्यायाचा आरंभ होत आहे. या अध्यायाच्या प्रथम मंत्रात, स्त्री (पत्नी) कशी असवी, हा विषय वर्णित आहे, -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (टीप - या मंत्राचा पूर्वार्ध भाग विवाह-संस्कारा च्यावेळी ‘मधुपर्स विधि’ प्रसंगी उच्चारला जातो. त्यामुळे हे स्त्री, हे संबोधन वधूला उद्देशून आहे, असे जाणावे.) हे स्त्री (वधू) तू (अदित्यै) अविनाशी नीतीविषयी (जी व्यवहारनीती गृहस्थाश्रमात सध्या वापरली जावी, अशा नीतिविषयी) (रास्नां) दानशीला (असि) (आवश्यक गृहाश्रम-कार्यासाठी अर्थव्यय करणारी आहेस), अशी माझी तुझ्यांकडून अपेक्षा आहे) म्हणून (सवितुः) समस्त जगाचे उत्पादक (देवस्य) इष्टदेव परमेश्‍वराने (प्रसव) उत्पन्न केलेल्या या जगात (अश्‍विनोः) सूर्य आणि चंद्र यांच्या (बाहुभ्याम्) शक्ती पराक्रमाप्रमाणे असलेल्या माझ्या या बाहूंद्वारे मी (तुझा वर) (त्वा) तुला (आ, ददे) ग्रहण करीत आहे. (पूष्णः) पोषकवायूप्रमाणे (हस्ताभ्याम्) हे माझे दोन हात (तुझे पोषण करण्यात व रक्षण करण्यात समर्थ आहेत) ॥1॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे स्त्री, (वधू) ज्याप्रमाणे सूर्य भूमीचे प्राण शरीराचे आणि अध्यापक-उपदेशक सत्याचे ग्रहण करतात, तद्दत मी (वर) तुझा स्वीकार करीत आहे. तू सदा माझ्याकरिता सुखदायिनी हो ॥1॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned woman, thou art charitable in thy definite behaviour. In this world created by the Agreeable God, with arms powerful like the sun and moon and with hands strong, protective and retentive like the air, I take thee.

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    Meaning

    In the yajnic creation of Savita, universal creator and progenitor, I take you unto me with the procreative powers of the Ashvins, sun and moon, and the sustaining powers of Pusha, the wind. You are the generous and gracious power of Mother Nature’s fertility for expansive growth and freedom.

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    Translation

    At the impulsion of the creator God, I take you up with arms of the healers and with hands of the nourisher. You are the girdle of the Eternity. (1)

    Notes

    Rāsnā, रशना, girdle. Aditi, Eternity; earth.

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    बंगाली (1)

    विषय

    ॥ ও৩ম্ ॥
    ॥ অথাষ্টাত্রিংশাऽধ্যায়ারম্ভঃ ॥
    ওঁ বিশ্বা॑নি দেব সবিতর্দুরি॒তানি॒ পরা॑ সুব । য়দ্ভ॒দ্রং তন্ন॒ ऽ আ সু॑ব ॥ য়জুঃ৩০.৩ ॥
    অথ পত্ন্যা কিংভূতয়া ভবিতব্যমিত্যাহ ॥
    এখন আটত্রিশতম অধ্যায়ের আরম্ভ করা হইতেছে । ইহার প্রথম মন্ত্রে স্ত্রীকে কেমন হওয়া প্রয়োজন, এই বিষয়কে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে বিদুষী স্ত্রী ! যে কারণে তুমি (অদিত্যৈ) নাশরহিত নীতির জন্য (রাস্না) দানশীল (অসি) হও, ইহাতে (সবিতুঃ) সমস্ত জগতের উৎপাদক (দেবস্য) কামনার যোগ্য পরমেশ্বরের (প্রসবে) উৎপন্ন হওয়ার জগতে (অশ্বিনোঃ) সূর্য্য ও চন্দ্রের (বাহু ভ্যাম্) বল পরাক্রমের তুল্য বাহুগুলির দ্বারা, (পূষ্ণঃ) পোষক বায়ুর (হস্তাভ্যাম্) গমন ও ধারণের সমান হস্ত দ্বারা (ত্বা) তোমাকে (আ, দদে) গ্রহণ করি ॥ ১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- হে স্ত্রী ! যেমন সূর্য্য ভূগোলের, প্রাণ শরীরের এবং অধ্যাপক উপদেশক সত্যের গ্রহণ করে সেইরূপই তোমাকে আমি গ্রহণ করি, তুমি নিরন্তর অনুকূল সুখ দান কর ॥ ১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    দে॒বস্য॑ ত্বা সবি॒তুঃ প্র॑স॒বে᳕ऽশ্বিনো॑র্বা॒হুভ্যাং॑ পূ॒ষ্ণো হস্তা॑ভ্যাম্ ।
    আ দ॒দেऽদি॑ত্যৈ॒ রাস্না॑ऽসি ॥ ১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    দেবস্যেত্যস্যাথর্বণ ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । উষ্ণিক্ ছন্দঃ ।
    ঋষভঃ স্বরঃ ॥

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