अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 6
श॒तम॒हं दु॒र्णाम्नी॑नां गन्धर्वाप्स॒रसां॑ श॒तम्। श॒तं श॒श्व॒न्वती॑नां श॒तवा॑रेण वारये ॥
स्वर सहित पद पाठश॒तम्। अ॒हम्। दुः॒ऽनाम्नी॑नाम्। ग॒न्ध॒र्व॒ऽअ॒प्स॒र॒सा॑म्। श॒तम्। श॒तम्। श॒श्व॒न्ऽवती॑नाम्। श॒तऽवा॑रेण। वा॒र॒ये॒ ॥३६.६॥
स्वर रहित मन्त्र
शतमहं दुर्णाम्नीनां गन्धर्वाप्सरसां शतम्। शतं शश्वन्वतीनां शतवारेण वारये ॥
स्वर रहित पद पाठशतम्। अहम्। दुःऽनाम्नीनाम्। गन्धर्वऽअप्सरसाम्। शतम्। शतम्। शश्वन्ऽवतीनाम्। शतऽवारेण। वारये ॥३६.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रोगों के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(अहम्) मैं (दुर्णाम्नीनां शतम्) सौ दुर्नाम्नी [बवासीर आदि पीड़ाओं] को और (गन्धर्वाप्सरसां शतम्) सौ गन्धर्वों [पृथिवी पर धरे हुए] और अप्सराओं [आकाश में चलनेवाले रोगों] को और (शश्वन्वतीनां शतम्) सौ उछलती हुई [पीड़ाओं] को (शतवारेण) शतवार [औषध] से (वारये) हटाता हूँ ॥६॥
भावार्थ
जो रोग शरीर की मलीनता से पृथिवी और आकाश में जल-वायु की मलीनता से और जो रोग एक दूसरे के लगाव से उत्पन्न होते हैं, वैद्य लोग उनको शतवार औषध से नाश करें ॥६॥
टिप्पणी
६−(शतम्) अनेकान् (अहम्) वैद्यः (दुर्णाम्नीनाम्) अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम्। पा०४।१।२८। इति ङीप्। अर्शआदिरोगपीडानाम् (गन्धर्वाप्सरसाम्) अ०८।८।१५। कॄगॄशॄदॄभ्यो वः। उ०१।१५५। गो+धृञ् धारणे-व प्रत्ययः, गो शब्दस्य गमादेशः+सरतेरप्पूर्वादसिः। उ०४।२३७। अप+सृ गतौ-असि। गवि पृथिव्यां ध्रियन्ते ते गन्धर्वाः। अप्सु आकाशे सरन्ति गच्छन्तीति अप्सरसः। तादृशानां रोगाणाम् (शतम्) बहून् (शतम्) (शश्वन्वतीनाम्) स्नामदिपद्यर्ति०। उ०४।११३। शश प्लुतगतौ-वनिप्। शश्वन्-मतुप्। मादुपधायाश्च०। पा०८।२।९। इति वत्वम्। अनो नुट्। पा०८।२।१६। इति नुट्, ङीप्। प्लुतगतियुक्तानां पीडानाम् (शतवारेण) म०१। औषधविशेषेण (वारये) निवारयामि ॥
भाषार्थ
(शतम् दुर्णाम्नीनाम्) अतिसार आदि दुष्परिणाम पैदा करनेवाले स्त्रीलिङ्गी सैकड़ों क्रिमीयों को; (शतं गन्धर्वाप्सरसाम्) जलप्राय प्रदेशों या अन्तरिक्ष में रहनेवाले दुःखप्रद, तथा हत्या करनेवाले सैकड़ों पुंल्लिङ्गी और स्त्रीलिङ्गी कृमियों को; तथा (शतं शश्वन्वतीनाम्) शीघ्र वढ़नेवाली या सदा बार-बार आनेवाली सैकड़ों स्त्रीलिङ्गी क्रिमियों को (अहम्) मैं चिकित्सक (शतवारेण) शतवार-औषध द्वारा (वारये) निवारित करता हूं।
टिप्पणी
[दुर्णाम्नीनाम्= दुर्+नाम्नी (=परिणाम पैदा करनेवाली)। गन्धर्व= गन्ध (अर्दने)+अर्व (हिंसायाम्)। अर्वः=कुत्सिते (उणा० ५.५४)। अप्सरसः= अप्सारिणी (निरु० ५.३.१३)। आपः= जल तथा अन्तरिक्ष (निघं० १.३)। शश्वन्= टुओश्वि (गतौ, वृद्धौ), तथा सदा बार-बार आनेवाली। मन्त्र में रोगोत्पादक पुंल्लिङ्गी तथा स्त्रीलिङ्गी क्रिमियों का वर्णन हुआ है। अथर्ववेद में रोगोत्पादक क्रिमियों के दो भेद दर्शाएं हैं—दृष्ट और अदृष्ट (अथर्व० २.३१.२)। दृष्ट जो कि नेत्रों द्वारा देखे जाते हैं, और अदृष्ट जो कि सूक्ष्म होने के कारण नेत्रों द्वारा देखे नहीं जा सकते। क्रिमि को “हतमाता” तथा “हतस्वसा” कहा है (अथर्व० २.३२.४; तथा ५.२३.११)। अतः क्रिमियों का पुंल्लिङ्गी तथा स्त्रीलिङ्गी भेद वेदानुमोदित है। हतमाता, हतस्वसा= क्रिमि जिसकी माता और बहिन भी मार दी गई हैं। माता और स्वसा स्त्रीलिङ्गी क्रिमि हैं।]
विषय
गान्धर्वाप्सरसां शतम्
पदार्थ
१. (अहम्) = मैं (दुर्णाम्नीनाम्) = कुष्ठ, दद्, पामा, अर्शस् आदि दुष्ट नामवाली बिमारियों के (शतम्) = सौ को शतवारेण इस वीर्यरूप शतवार मणि से वारये दूर करता हूँ। (गन्धर्वाप्सरसाम्) = [गा शरीरभूमि धारयन्ति, अप्सु रेत: छणेषु सरन्ति] शरीरभूमि को पकड़ लेनेवाली-जड़ जमा लेनेवाली तथा सप्तमधातु [वीर्य] तक पहुँच जानेवाली बिमारियों के (शतम्) = सैकड़ें को इस शतवार मणि से दूर करता हूँ। २. तथा (शश्वन्वतीनाम्) = बारम्बार पीड़ा के लिए प्राप्त होनेवाली ग्रह, अपस्मार आदि व्याधियों के (शतम्) = सैकड़ों को इस मणि के द्वारा दूर करता है।
भावार्थ
सरक्षित वीर्य अर्शस आदि रोगों को, शरीर में जड़ पकड लेनेवाले रोगों को, वीर्य तक पहुँच जानेवाले रोगों को तथा अपस्मार आदि रोगों को दूर कर देता है। नीरोग बनकर यह वीर्यरक्षक पुरुष 'अथर्वा' बनता है-न डाँवाडोल होनेवाला। यही अगले सूक्त का ऋषि है -
विषय
‘शतवार’ नामक वीर सेनापति का वर्णन।
भावार्थ
(शतं) सैकड़ों (दुर्नाम्नीनाम्) दुर्दान्त और सैकड़ों (गन्धर्वाप्सरसां) कामी पुरुष और कामिनी स्त्रियों को और (शतं च) सैकड़ों (श्वन्वतीनां) कुत्तों को साथ लिये आने वाली मांसभक्षिणी स्त्रियों को या कुत्तों के स्वभाव वाली अति कामुक स्त्रियों को मैं प्रजापालक पुरुष (शतवारेण) सैकड़ों को वारण करने में समर्थ पुरुष के द्वारा ही वारण करूं। श्वन्वती अप्सराएं—जैसे ‘श्वन्वतीरप्सरसो हयका उतार्बुदे’। अथर्व० ११। ९। १५ कामी पुरुष जैसे ‘श्वेवैकः कपिरिवैकः कुमारः’। अथर्व० ४। ३७। ११॥ ओषधि पक्ष में—शतवार नामक ओषधि ‘शतवार’ इसलिये है कि प्रथम वह सैकड़ों रोग को वारण करने वाली और द्रितीय वह सैकड़ों काटों वाली है। (१) वह यक्ष्मा=रोगों को और कुष्ठ को नाश करे। (२) वह कांटों से दुष्ट पुरुषों को मूल से पीड़ाओं को और मध्यभाग=काण्ड से राजयक्ष्मा को नाश करता है। (३) वह छोटे बड़े और रुलाने वाले सब रोगों को नाश करे। (४) सैकड़ों वीर्यों को उत्पन्न करती और सैकड़ों रोग को शरीर से नाश करती है। वह बुरे नाम के कुष्ट आदि त्वचा के रोगों को भी दूर करती है। (५) उसके पीले कांटे हैं। वह त्वचा के रोगों को दूर करता है। (६) सफेद कोढ, दाद, खाज आदि दुष्ट नाम के रोग गन्धर्व और अप्सरा अर्थात् गन्ध या वायु द्वारा या जल द्वारा मनुष्य को लग जाने वाली बीमारियों को और श्वन्वती अर्थात् कुत्तों द्वारा फैल जाने वाली कोलिक, दुःसाध्य पीड़ाओं को भी वह सैकड़ों की संख्या में दूर करती है। ऐसी ‘शतवार’ नामक ओषधि वैद्यों को तैयार करनी चाहिये।
टिप्पणी
(तृ०) ‘शतं शश्वन्वतीनां’। इति शं० पा०, सायणाभिमतश्च। ‘शतं च शुन्वतीनां’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। शतवारो देवता। अनुष्टुभः। षडृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Shatavara Mani
Meaning
With Shatavara, I ward off, cure and prevent a hundred notorious diseases, a hundred of the diseases of marshy area caused by damp air and rains, and a hundred of the diseases of seasonal and relapsive nature which repeat and grow fast.
Translation
Hundreds of ill-named maladies, hundreds of germs living Soil (gandharva) and those living in waters (apsaras), and hundreds of recurring painful diseases I prevent with the satavara (blessing).
Translation
Like the sun which bears luminous rays, this praise-worthy shatavara killing all the germs Over-comes the malignancies.
Translation
I (a physician) keep off numerous malignant skin diseases, numerous fatal microbes carried by scents, and those moving freely in waters and hundreds of such, carried by dogs, by the use of Shatavar, capable of warding off various diseases.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(शतम्) अनेकान् (अहम्) वैद्यः (दुर्णाम्नीनाम्) अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम्। पा०४।१।२८। इति ङीप्। अर्शआदिरोगपीडानाम् (गन्धर्वाप्सरसाम्) अ०८।८।१५। कॄगॄशॄदॄभ्यो वः। उ०१।१५५। गो+धृञ् धारणे-व प्रत्ययः, गो शब्दस्य गमादेशः+सरतेरप्पूर्वादसिः। उ०४।२३७। अप+सृ गतौ-असि। गवि पृथिव्यां ध्रियन्ते ते गन्धर्वाः। अप्सु आकाशे सरन्ति गच्छन्तीति अप्सरसः। तादृशानां रोगाणाम् (शतम्) बहून् (शतम्) (शश्वन्वतीनाम्) स्नामदिपद्यर्ति०। उ०४।११३। शश प्लुतगतौ-वनिप्। शश्वन्-मतुप्। मादुपधायाश्च०। पा०८।२।९। इति वत्वम्। अनो नुट्। पा०८।२।१६। इति नुट्, ङीप्। प्लुतगतियुक्तानां पीडानाम् (शतवारेण) म०१। औषधविशेषेण (वारये) निवारयामि ॥
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