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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 42 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 42/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - ब्रह्म छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्म यज्ञ सूक्त
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    ब्रह्म॒ होता॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञा ब्रह्म॑णा॒ स्वर॑वो मि॒ताः। अ॑ध्व॒र्युर्ब्रह्म॑णो जा॒तो ब्रह्म॑णो॒ऽन्तर्हि॑तं ह॒विः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब्रह्म॑। होता॑। ब्रह्म॑। य॒ज्ञाः। ब्रह्म॑णा । स्वर॑वः। मि॒ताः। अ॒ध्व॒र्युः। ब्रह्म॑णः। जा॒तः। ब्रह्म॑णः। अ॒न्तः॒ऽहि॑तम्। ह॒विः ॥४२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा ब्रह्मणा स्वरवो मिताः। अध्वर्युर्ब्रह्मणो जातो ब्रह्मणोऽन्तर्हितं हविः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ब्रह्म। होता। ब्रह्म। यज्ञाः। ब्रह्मणा । स्वरवः। मिताः। अध्वर्युः। ब्रह्मणः। जातः। ब्रह्मणः। अन्तःऽहितम्। हविः ॥४२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 42; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वेद की स्तुति का उपदेश।

    पदार्थ

    (ब्रह्म=ब्रह्मणा) वेद द्वारा (होता) होता [हवनकर्ता], (ब्रह्म) वेद द्वारा (यज्ञाः) अनेक यज्ञ होते हैं, (ब्रह्मणा) वेद द्वारा (स्वरवः) यज्ञस्तम्भ (मिताः) खड़े किये जाते हैं। (ब्रह्मणः) वेद से (अध्वर्युः) यज्ञकर्ता (जातः) प्रसिद्ध होता है, (ब्रह्मणः) वेद के (अन्तर्हितम्) भीतर रक्खा हुआ (हविः) हवि [हवन विधान] है ॥१॥

    भावार्थ

    वेद द्वारा ही याजक, यज्ञव्यवहार और यज्ञविधान निश्चित होते हैं ॥१॥

    टिप्पणी

    यह सूक्त कुछ भेद से महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में उद्धृत है ॥१−(ब्रह्म) तृतीयार्थे प्रथमा। ब्रह्मणा। वेदद्वारा (होता) हवनकर्ता (ब्रह्म) वेदद्वारा (यज्ञाः) यज्ञव्यवहाराः (ब्रह्मणा) वेदद्वारा (स्वरवः) यूपाः। यज्ञस्तम्भाः (मिताः) डुमिञ् प्रक्षेपणे-क्त। प्रक्षिप्ताः। स्थापिताः (अध्वर्युः) ऋत्विक् (ब्रह्मणः) वेदात् (जातः) प्रसिद्धो भवति (ब्रह्मणः) वेदस्य (अन्तर्हितम्) मध्ये धृतम्। प्रणीतम् (हविः) हवनविधानम् ॥

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    भाषार्थ

    ब्रह्मध्यानरूपी ब्रह्मयज्ञ में (ब्रह्म) ब्रह्म ही (होता) होता= ऋत्विक् होता है, (ब्रह्म) ब्रह्मध्यान ही (यज्ञाः) समग्र यज्ञरूप हैं, (ब्रह्मणा) ब्रह्म के साथ (स्वरवः) यज्ञस्तूप आदि (मिताः)१ उपमित हुए हैं। (अध्वर्युः) अध्वर्यु (ब्रह्मणः) ब्रह्म की पूजा के लिए ही (जातः) वरण किया जाता है, क्योंकि (ब्रह्मणः अन्तः) ब्रह्म के भीतर ही (हविः) हवि (हितम्) निहित की जाती है, उसे समर्पित की जाती है।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय यह कि ब्रह्मयज्ञ में होता अध्वर्यु, द्रव्यसाध्य यज्ञों, तथा यज्ञोपकरणों की आवश्यकता नहीं होती।‌इसमें केवल एकमात्र ध्येय ब्रह्म की ही आवश्यकता होती है। द्रव्यसाध्य यज्ञ तथा अध्वर्यु आदि भी ब्रह्म पूजा के लिए, और उसके नाम पर हविःप्रदान के लिए ही होते हैं। यथा— “स वै यज्ञादजापत तस्माद् यज्ञोऽजायत”॥ “स यज्ञस्तस्य यज्ञः स यज्ञस्य शिरस्कृतम्” (अथर्व० १३.४(४).३९, ४०)= अर्थात् परमेश्वर यज्ञ से प्रकट होता है, क्योंकि ब्रह्म से यज्ञविधि प्रकट हुई है। परमेश्वर यज्ञरूप है, उसके लिए यज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ का सिर है”।] [१. जैसे ब्रह्म दुःखनिवारक और सुखसंचारक है, वैसे अनुष्ठित साङ्गोपाङ्ग यज्ञ भी दु:खनिवारक और सुखसंचारक हैं। मंत्र में ब्रह्मोपासना और यज्ञानुष्ठान में उपमानोपमेयभाव दर्शाया है। जिस गुणकर्म की दृष्टि से वस्तुओं में उपमान उपमेयभाव दर्शाया जाता है, उस गुणकर्म की दृष्टि से, उपमेय की अपेक्षा उपमान उत्कृष्ट होता है। अतः यज्ञानुष्ठानों की अपेक्षा ब्रह्मोपासना को मंत्र में उत्कृष्ट दर्शाया है।]

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    विषय

    सर्वयज्ञसाधक ब्रह्म

    पदार्थ

    १. सब पदार्थों में ब्रह्म की शक्ति ही काम करती है। सूर्यादि देवों में उस-उस देवत्व को ब्रह्म ही स्थापित करनेवाले हैं। यज्ञ के सब अंगों को ब्रह्म ही निर्मित करते हैं। ब्रह्म की शक्ति से ही होता आदि ऋत्विज् उस-उस कार्य को कर पाते हैं, अत: मन्त्र में कहते हैं कि (ब्रह्म होता) = ब्रह्म ही होतृकार्य को करनेवाले हैं। (ब्रह्म यज्ञा:) = प्रभु ही सब यज्ञ हैं। (ब्रह्मणा) = प्रभु ने ही (स्वरवः) = यज्ञस्तम्भ (मिता:) = मापपूर्वक बनाये हैं। २. (अध्वर्यः) = यह यज्ञ का प्रेणता अध्वर्यु भी (ब्रह्मण: जात:) = ब्रह्म से ही प्रादुर्भूत किया गया है। (हविः ब्रह्मण: अन्तः हितम्) = सब हवि ब्रह्म के अन्दर ही निहित है।

    भावार्थ

    यज्ञ के सब उपकरणों व कर्ताओं में प्रभु की ही शक्ति काम कर रही है।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brahma, the Supreme

    Meaning

    In yajna, Brahma is the hota, the initiator. Brahma is the yajna. By Brahma are the yajna posts set up. The adhvaryu arises by inspiration of Brahma, and havi is offered into the inner most concentrated presence of Brahma.

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    Subject

    Extolling the Brahman

    Translation

    The Divine Supreme is the sacrificer: the divine Supreme is the sacrifices: the sacrificial posts have been set up by the Divine Supreme. The adhvaryu priest is born of the Divine Supreme; and the sacrificial offering is put within the Divine Supreme.

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    Translation

    The seers attaining the enlightenment desiring the prosperity and happiness of the people first cultivate (in them) the sense of austerity and disciplined wisdom. From this emerges out energy, national sentiment, vigor and all the learned men have great respect for it.

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    Translation

    The mighty Revealer of the Vedas is Himself the hota-sacrificer. The same Lord of the Vedas is the source of all sacrifices, going on in the universe. He, Himself has created all these shining Suns. From Him was born the performer of all non-violent sacrifices. All materials of the sacrifices, like churning product and grains etc., are contained in the self-same Brahm.

    Footnote

    In the last sacrifice, going on in the universe, it is Brahma and Brahma, who is all in all, hota, Yajna, Adhyaryu and Havi even, He supplies everything for this great sacrifice.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह सूक्त कुछ भेद से महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में उद्धृत है ॥१−(ब्रह्म) तृतीयार्थे प्रथमा। ब्रह्मणा। वेदद्वारा (होता) हवनकर्ता (ब्रह्म) वेदद्वारा (यज्ञाः) यज्ञव्यवहाराः (ब्रह्मणा) वेदद्वारा (स्वरवः) यूपाः। यज्ञस्तम्भाः (मिताः) डुमिञ् प्रक्षेपणे-क्त। प्रक्षिप्ताः। स्थापिताः (अध्वर्युः) ऋत्विक् (ब्रह्मणः) वेदात् (जातः) प्रसिद्धो भवति (ब्रह्मणः) वेदस्य (अन्तर्हितम्) मध्ये धृतम्। प्रणीतम् (हविः) हवनविधानम् ॥

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