अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 70/ मन्त्र 1
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - इन्द्रः, सूर्यः
छन्दः - त्रिपदा गायत्री
सूक्तम् - पूर्णायु सूक्त
116
इन्द्र॒ जीव॒ सूर्य॒ जीव॒ देवा॒ जीवा॑ जी॒व्यास॑म॒हम्। सर्व॒मायु॑र्जीव्यासम् ॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्र॑। जीव॑। सूर्य॑। जीव॑। देवाः॑। जीवाः॑। जी॒व्यास॑म्। अ॒हम्। सर्व॑म्। आयुः॑। जी॒व्या॒स॒म् ॥७०.१॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्र जीव सूर्य जीव देवा जीवा जीव्यासमहम्। सर्वमायुर्जीव्यासम् ॥
स्वर रहित पद पाठइन्द्र। जीव। सूर्य। जीव। देवाः। जीवाः। जीव्यासम्। अहम्। सर्वम्। आयुः। जीव्यासम् ॥७०.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
जीवन बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले मनुष्य] (जीव) तू जीता रह, (सूर्य) हे सूर्य ! [सूर्यसमान तेजस्वी] (जीव) तू जीता रह, (देवाः) हे विद्वानो ! तुम (जीवाः) जीनेवाले [हो], (अहम्) मैं (जीव्यासम्) मैं जीता रहूँ, (सर्वम्) सम्पूर्ण (आयुः) आयु (जीव्यासम्) मैं जीता रहूँ ॥१॥
भावार्थ
मनुष्य परम ऐश्वर्यवान् और प्रधान होकर विद्वानों के साथ पूर्ण आयु जीवें ॥१॥
टिप्पणी
१−(इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् मनुष्य (जीव) प्राणान् धारय (सूर्य) हे सूर्यवत्तेजस्विन् (जीव) (देवाः) हे विद्वांसः (जीवाः) जीवनवन्तः स्थ। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
पदार्थ
शब्दार्थ = हे विद्वानो! तुम ( जीवला: स्थ ) = जीवनदाता हो । ( जीव्यासम् ) = मैं जीता रहूँ ( सर्वमायुर्जीव्यासम् ) = मैं सम्पूर्ण आयु जीता रहूँ । ( इन्द्र जीव ) = हे परमैश्वर्यवाले मनुष्य ! तू जीता रह । ( सूर्य जीव ) = हे सूर्य समान तेजस्वी ! तू जीता रहे । ( देवाः जीवा: ) = हे विद्वान् लोगो! आप जीते रहो ( जीव्यासमहम् ) = मैं जीता रहूँ । ( सर्वम् आयुः जीव्यासम् ) = सम्पूर्ण आयु जीता रहूँ ।
भावार्थ
भावार्थ = सब मनुष्यों को चाहिये कि जीवन विद्या का उपदेश देनेवाले विद्वानों के सत्संग से और परस्पर उपकार करते हुए अपना जीवन बढ़ावें और परमैश्वर्यवान् तेजस्वी हो कर विद्वानों के साथ पूर्णायु को प्राप्त करें ।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमैश्वर्य-सम्पन्न चतुर्थाश्रमी! (जीव) आप पूर्ण आयु तक जीवित रहें; (सूर्य) हे सूर्यवत् प्रकाश देनेवाले आदित्य ब्रह्मचारी! आप (जीव) पूर्ण आयु तक जीवित रहें; (देवाः) हे माता-पिता तथा आचार्य देवो! (जीवाः, भवत) आप पूर्ण आयु तक जीवित रहें; (अहम्) मैं भी (जीव्यासम्) जीवित रहूँ, (सवर्म्, आयुः) पूर्ण सौ वर्षों की आयु पर्यन्त (जीव्यासम्) मैं जीवित रहूँ।
टिप्पणी
[इन्द्र= आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः। प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रोभवद् वशी॥ (अथर्व० ११.५.१६) में ब्रह्मचारी के पश्चात् प्रजापति अर्थात् गृहस्थी होना, प्रजापति के पश्चात् विराट् अर्थात् वानप्रस्थी होना, और तदनन्तर वशी होकर इन्द्र अर्थात् चतुर्थाश्रमी होने का विधान है।]
विषय
१. (इन्द्र) = हे इन्द्रियों के अधिष्ठाता ! (जीव) = तू जी, अर्थात् जीवन तो उसी का ठीक है जोकि जितेन्द्रिय है। (सूर्य) = सूर्य के समान ज्ञानदीप्त जीवनवाले पुरुष ! (जीव) = तू जी। जीवन तो उसी का ठीक है जोकि अन्धकारशून्य है। (देवा:) = हे देववृत्ति के पुरुषो! जीवा:-तुम जीवनवाले हो, अर्थात् वस्तुत: जीवन तो तुम्हारा ही ठीक है। २. अहम्-मैं भी जीव्यासम्-'इन्द्र' बनकर, 'सूर्य' बनकर तथा 'देव' बनकर जीऊँ। सर्वम् आयुः जीव्यासम-मैं पूर्ण जीवन जीनेवाला बनूं। पूर्णजीवन वही है जिसमें इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य में ठीक प्रकार लगी हैं, मस्तिष्क ज्ञानसूर्य से दीप्त है, हृदय दिव्यवृत्तियों से द्योतित है।
पदार्थ
भावार्थ-हम 'इन्द्र, सूर्य व देव' बनकर पूर्णजीवन प्राप्त करें। इन्द्रियाँ हमारे वश में हों। हमारा मस्तिष्क ज्ञान-सूर्य से चमके। हमारा मन दिव्यवृत्तिवाला हो।
विषय
पूर्णायु प्राप्ति।
भावार्थ
हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर ! या वायो ! तू (जीव) हमें जीवन धारण करा। हे (सूर्य) सूर्य सबके प्रेरक आदित्य ! और हे (देवाः) देवगण ! पृथिवी, अग्नि, विद्युत् आदि पदार्थों ! आप सब भी (जीव) मुझे जीवन प्रदान करो। (अहम्) मैं (जीव्यासम्) जीता रहूं। (सर्वम् आयुः जीव्यासम्) और सम्पूर्ण आयु भर जीवन धारण करूं।
टिप्पणी
‘जीवादेवा’ इति प्रायः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। इन्द्रादयो देवताः। गायत्री। एकर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Apah: Sunny Life
Meaning
Indra, Great soul, live, keep living, O Sunny soul, live, keep living well, O Divine Souls, live bright. Let me live bright, a divine soul. I must live fully, wholly, brilliant, divine.
Subject
For long life
Translation
Live, O resplendent One; live, O Sun; live, O bounties of Nature, May I live, May I live my full term of life.
Translation
Live Indra (O mighty man), live Surya (O man of brilliancy and dynamism, live Ye Devah, O Ye enlightened men, I may live and I may live complete term of my life.
Translation
From whichever treasure-house, i.e., God, we pick up the Vedas (Vedic knowledge), we entrust it into that very store-house. O learned persons, by whatever power of God or Vedic learning, this sacrifice is performed] let you protect us in this world by the same austerity.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१−(इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् मनुष्य (जीव) प्राणान् धारय (सूर्य) हे सूर्यवत्तेजस्विन् (जीव) (देवाः) हे विद्वांसः (जीवाः) जीवनवन्तः स्थ। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal