अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 2
अ॒हं प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ गिरः॑ शुम्भामि कण्व॒वत्। येनेन्द्रः॒ शुष्म॒मिद्द॒धे ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒हम् । प्र॒त्नेन॑ । मन्म॑ना । गिर॑: । शु॒म्भा॒मि॒ । क॒ण्व॒ऽवत् ॥ येन॑ । इन्द्र॑: । शुष्म॑म् । इत् । द॒धे ॥११५.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अहं प्रत्नेन मन्मना गिरः शुम्भामि कण्ववत्। येनेन्द्रः शुष्ममिद्दधे ॥
स्वर रहित पद पाठअहम् । प्रत्नेन । मन्मना । गिर: । शुम्भामि । कण्वऽवत् ॥ येन । इन्द्र: । शुष्मम् । इत् । दधे ॥११५.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(अहम्) मैं (कण्ववत्) बुद्धिमान् के समान (प्रत्नेन) उस प्राचीन (मन्मना) ज्ञान से (गिरः) अपनी वाणियों को (शुम्भामि) शोभित करता हूँ, (येन) जिस [प्राचीन ज्ञान] से (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] ने (शुष्मम्) बल (इत्) अवश्य (दधे) दिया है ॥२॥
भावार्थ
मनुष्य परमेश्वरीय ज्ञान वेद से सुशोभित होकर बलवान् होवे ॥२॥
टिप्पणी
२−(अहम्) मनुष्यः (प्रत्नेन) प्राचीनेन (मन्मना) मननसाधनेन ज्ञानेन (गिरः) वाणीः (शुम्भामि) अलं करोमि (कण्ववत्) मेधावी यथा (येन) मन्मना (इन्द्रः) परमेश्वरः (शुष्मम्) बलम् (इत्) अवश्यम् (दधे) दत्तवान् ॥
विषय
सनातन ज्ञान के द्वारा बल की प्राप्ति
पदार्थ
१. गतमन्त्र के अनुसार मैं प्रभु से प्रकाश प्राप्त करता हूँ। (अहम्) = मैं (प्रत्नेन) = सनातन-सदा सृष्टि के प्रारम्भ में दिये जानेवाले (मन्मना) = ज्ञान से (गिरः शुम्भामि) = अपनी बाणियों को ऐसे अलंकृत करता हूँ (कण्ववत्) = जैसेकि एक मेधावी पुरुष किया करता है। वस्तुतः यह सनातन ज्ञान ही मुझे मेधावी बनाता है। २. उस ज्ञान से मैं अपनी वाणियों को अंकृत करता हूँ, (येन) = जिससे (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (इत्) = निश्चय से (शुष्पम्) = शत्रु-शोषक बल को (दधे) = धारण करता है। इस ज्ञानाग्नि से ही इन्द्र सब असुरों को दग्ध करनेवाला होता है।
भावार्थ
सनातन वेदज्ञान मेरी वाणियों को अलंकृत करे । इस ज्ञान के द्वारा जितेन्द्रिय बनता हुआ मैं सब बासनारूप शत्रुओं के शोषक बल को धारण करूँ।
भाषार्थ
(अहम्) मैं (प्रत्नेन) अनादिकाल से प्राप्त (मन्मना) मननीय वैदिक-मन्त्रों द्वारा, स्तोत्रों द्वारा, (गिरः) अपनी वाणियों की (शुम्भामि) शोभा बढ़ाता हूँ, (कण्ववत्) जैसे कि अन्य मेधावी व्यक्ति अपनी वाणियों की शोभा बढ़ाते हैं। (येन) जिन मननीय वैदिक मन्त्रों द्वारा (इन्द्रः) जीवात्मा, (शुष्मम्) पाप-शोषक बल (दधे) अपने में धारण करता है।
टिप्पणी
[कण्व=मेधावी (निघं০ ३.१५)।]
विषय
राजा, परमेश्वर।
भावार्थ
(अहम्) मैं (प्रत्नेन) बडे पुरातन, सनातन से चले आये, नित्य (मन्मना) वेदमय ज्ञान से (कण्ववत्) मेधावी ज्ञानी पुरुष समान (गिरः) वाणियों को (शुम्भामि) प्रकट करता हूँ। (येन) जिस से (इन्द्रः) इन्द्र ऐश्वर्यवान् राजा (शुष्मम्) वलको (इद्) ही (दधे) धारण करता है। महा मन्त्री वेदानुकूल आज्ञाओं को प्रकाशित करे जिस से राजा का बल बढ़े। परमेश्वर ही के पुरातन ज्ञानरूप से वाणियों को प्रकट करता है जिस से जीवों के ज्ञानवल की वृद्धि होती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वत्स ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
With the realisation of ancient and eternal knowledge I sanctify and adorn my words and voice in song like a wise sage, and by that, Indra, lord of light and power, vests me with strength and excellence.
Translation
I like an intelligent (Kanva) adorn my voices of prayer with that ancient knowledge by which the Almighty God is endowed with strength.
Translation
I like an intelligent (Kanva) adorn my voices of prayer with that ancient knowledge by which the Almighty God is endowed with strength.
Translation
O king or soul, the wise seers, who don’t satisfy you, or who satisfy you (leave them alone). Let you prosper being well-directed by me alone, (through Vedic teachings spoken of above).
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(अहम्) मनुष्यः (प्रत्नेन) प्राचीनेन (मन्मना) मननसाधनेन ज्ञानेन (गिरः) वाणीः (शुम्भामि) अलं करोमि (कण्ववत्) मेधावी यथा (येन) मन्मना (इन्द्रः) परमेश्वरः (शुष्मम्) बलम् (इत्) अवश्यम् (दधे) दत्तवान् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমেশ্বরগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(অহম্) আমি (কণ্ববৎ) বুদ্ধিমানের ন্যায়/সমান (প্রত্নেন) সেই প্রাচীন (মন্মনা) জ্ঞান দ্বারা (গিরঃ) নিজের বাণীসমূহ (শুম্ভামি) শোভিত করি, (যেন) যা [প্রাচীন জ্ঞান] দ্বারা (ইন্দ্রঃ) ইন্দ্র [পরম্ ঐশ্বর্যবান পরমাত্মা] (শুষ্মম্) বল (ইৎ) অবশ্যই (দধে) প্রদান করেছেন ॥২॥
भावार्थ
পরমেশ্বরীয় জ্ঞান বেদ দ্বারা সুশোভিত হয়ে মানুষ বলবান হোক ॥২॥
भाषार्थ
(অহম্) আমি (প্রত্নেন) অনাদিকাল থেকে প্রাপ্ত (মন্মনা) মননীয় বৈদিক-মন্ত্র-সমূহ দ্বারা, স্তোত্র দ্বারা, (গিরঃ) নিজের বাণী-সমূহের (শুম্ভামি) শোভা বর্ধন/বর্ধিত করি, (কণ্ববৎ) যেমন অন্য মেধাবী ব্যক্তি নিজের বাণী শোভা বৃদ্ধি করে। (যেন) যে মননীয় বৈদিক মন্ত্রসমূহ দ্বারা (ইন্দ্রঃ) জীবাত্মা, (শুষ্মম্) পাপ-শোষক বল (দধে) নিজের মধ্যে ধারণ করে।
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