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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 43 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 43/ मन्त्र 1
    ऋषिः - त्रिशोकः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४३
    75

    भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॒ बाधो॑ ज॒ही मृधः॑। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भि॒न्धि । विश्वा॑: । अप॑ । द्विष॑: । परि॑ । बाध॑: । ज॒हि । मृध॑: ॥ वसु॑ । स्पा॒र्हम् । तत । आ । भ॒र॒ ॥४३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भिन्धि विश्वा अप द्विषः बाधो जही मृधः। वसु स्पार्हं तदा भर ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भिन्धि । विश्वा: । अप । द्विष: । परि । बाध: । जहि । मृध: ॥ वसु । स्पार्हम् । तत । आ । भर ॥४३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 43; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (2)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे राजन् !] (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेष करनेवाली सेनाओं में (अप भिन्धि) फूट डाल दे, और (बाधः) रोक डालनेवाले (मृधः) संग्रामों को (परि) सब ओर से (जहि) मिटादे (तत्) उस (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) धन को (आ भर) ले आ ॥१॥

    भावार्थ

    राजा धर्मात्माओं की रक्षा के लिये शत्रुओं में फूट डालकर उनका नाश करे और उनका धन लेकर विद्यादान आदि धर्म-कार्य में लगावे ॥१॥

    टिप्पणी

    यह तृच् ऋग्वेद में है-८।४।४०-४२, सामवेद-उ० ४।१। तृच ८। मन्त्र १-साम० पू० २।४।१०। और मन्त्र २ पू० ३।˜२।३ ॥ १−(भिन्धि) भेदनं कुरु (विश्वाः) सर्वाः (अप) पृथग्भावे (द्विषः) द्वेष्ट्रीः सेनाः (परि) सर्वतः (बाधः) बाधृ विलोडने-क्विप्। बाधिकाः (जहि) नाशय (मृधः) सङ्ग्रामान् (वसु) धनम् (स्पार्हम्) अ० २०।१६।३। कमनीयम् (तत्) (आ भर) आहर। प्रापय ॥

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    विषय

    द्विषः-बाधो-मृधः [परिजहि]

    पदार्थ

    १. (विश्वा:) = सब (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को (भिन्धि) = विदीर्ण कर दीजिए। हमारे जीवन में द्वेष का साम्राज्य न हो। हम सबके साथ प्रीतिपूर्वक वर्तनेवाले बनें। (बाध:) = उन्नति के मार्ग में बाधक बनी हुई अशुभवृत्तियों को या व्यक्तियों को परिजहि हमसे दूर कीजिए। [हन् गती]। इसी प्रकार (मृधः) = हमें मार डालनेवाली दास्यव वृत्तियों को भी हमसे दूर कीजिए। २. द्वोषों को, - बाधाओं को व दास्यव वृत्तियों को हमसे पृथक् करके (तत्) = उस (वसु) = निवास के लिए आवश्यक धन को (आभर) = सर्वथा प्राप्त कराइए जोकि (स्पार्हम्) = स्पृहणीय है-सबसे प्राप्त करने के लिए वाञ्छनीय है।

    भावार्थ

    प्रभु हमसे द्वेषों, बाधाओं व शत्रुओं को पृथक् कर स्पृहणीय धन प्राप्त कराएँ।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Break off all the jealous adversaries, remove all obstacles, eliminate the enemies and violence and fill the world with cherished wealth, honour and prosperity.

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    Translation

    O Almighty ruler, you smite our foes attacking us and drive all the enemies away. Bring the desired wealth to us.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह तृच् ऋग्वेद में है-८।४।४०-४२, सामवेद-उ० ४।१। तृच ८। मन्त्र १-साम० पू० २।४।१०। और मन्त्र २ पू० ३।˜२।३ ॥ १−(भिन्धि) भेदनं कुरु (विश्वाः) सर्वाः (अप) पृथग्भावे (द्विषः) द्वेष्ट्रीः सेनाः (परि) सर्वतः (बाधः) बाधृ विलोडने-क्विप्। बाधिकाः (जहि) नाशय (मृधः) सङ्ग्रामान् (वसु) धनम् (स्पार्हम्) अ० २०।१६।३। कमनीयम् (तत्) (आ भर) आहर। प्रापय ॥

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