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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 53 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 53/ मन्त्र 2
    ऋषिः - मेध्यातिथिः देवता - इन्द्रः छन्दः - बृहती सूक्तम् - सूक्त-५३
    42

    दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे। नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाँश्च॑र॒स्योज॑सा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दा॒ना । मृ॒ग:। वा॒र॒ण: । पु॒रु॒ऽत्रा । च॒रथ॑म् । द॒धे॒ ॥ नकि॑: । त्वा॒ । नि । य॒म॒त् । आ । सु॒ते । ग॒म॒: । म॒हान् । च॒र॒सि॒ । ओज॑सा ॥५३.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा चरथं दधे। नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाँश्चरस्योजसा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दाना । मृग:। वारण: । पुरुऽत्रा । चरथम् । दधे ॥ नकि: । त्वा । नि । यमत् । आ । सुते । गम: । महान् । चरसि । ओजसा ॥५३.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 53; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सेनापति के लक्षणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (न) जैसे (मृगः) जंगली (वारणः) हाथी (दाना) मद के कारण (पुरुत्रा) बहुत प्रकार से (चरथम्) झपट (दधे) लगाता है। [वैसे ही] (नकिः) कोई नहीं (त्वा) तुझे (नि यमत्) रोक सकता, (सुते) तत्त्व रस को (आ गमः) तू प्राप्त हो, (महान्) महान् होकर तू (ओजसा) बल के साथ (चरसि) विचरता है ॥२•॥

    भावार्थ

    जैसे वन का मदमत्त हाथी सब ओर बेरोक घूमकर उपद्रव मचाता है, वैसे ही नीतिज्ञ सेनापति तत्त्व विचारकर शत्रुओं को शीघ्र दबावे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(दाना) दानेन। मदजलेन (मृगः) वनचरः (न) यथा (वारणः) गजः (पुरुत्रा) बहुप्रकारेण (चरथम्) शीङ्शपिरुगमि। उ० ३।११३। चरतेः अथप्रत्ययः। संचरणम् (दधे) धरति (नकिः) न कोऽपि (त्वा) त्वाम् (नि यमत्) नियच्छति (आ) (सुते) तत्त्वरसम् (गमः) प्राप्नुहि (महान्) (चरसि) (ओजसा) ॥

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    विषय

    पुरुत्रा चरथं दधे

    पदार्थ

    १. (दाना) = [दाप् लवने] वासनाओं के लवन [काटने] के हेतु से यह (मृग:न) = सिंह के समान होता है। शेर जैसे शिकार को चीर-फाड़ देता है, इसी प्रकार यह वासनाओं को चीर-फाड़ देता है [मृग-a wild beast], इसप्रकार यह (वारण:) = सब वासनाओं का निवारण करनेवाला होता है। (पुरुत्रा) = पालन व पूरण के दृष्टिकोण से (चरथं दधे) = इस शरीर-रथ को धारण करता है। भोग ही उसके जीवन का लक्ष्य नहीं बन जाते। २. ऐसी स्थिति में (त्वा) = तुझे (नकिः नियमत्) = कोई भी वासना बाँध नहीं पाती (सुते) = सोम के सम्पादन में (आगम:) = तू सर्वथा गतिवाला होता है। सब प्रकार से सोम का रक्षण करता है। अब (महान्) = [मह पूजायाम्] प्रभु की वृत्तिवाला होता हुआ तू (ओजसा चरसि) = ओजस्विता के साथ-सब कर्तव्यों को करनेवाला होता है।

    भावार्थ

    वासनाओं के वशीभूत न होकर सोम-रक्षण करते हुए हम ओजस्वी बनें और कर्तव्य-कर्मों का पालन करें।

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    भाषार्थ

    (न) जैसे (मृगः वारणः) जङ्गली हाथी, जङ्गल में (दाना=दानानि) तोड़-फोड़ (दधे) करता है, और (पुरुत्रा) बहुत स्थानों में (चरथं दधे) स्वच्छन्द विचरता है, वैसे ही तू मुक्तात्मा, शारीरिक बन्धनों को तोड़-फोड़ कर सर्वत्र स्वच्छन्द विचरता है। हे मुक्तात्मन्! स्वच्छन्द विचरने में (नकिः) कोई नहीं (त्वा) तुझे (नियमत्) नियन्त्रित कर सकता है। (सुते) इस उत्पन्न जगत् में (आ गमः) तू फिर लौट कर आता है, पुनः जन्म धारण करता है। तू (महान्) महाशक्ति से सम्पन्न होकर (ओजसा) निज शक्ति द्वारा (चरसि) विचरता है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र १ में उपासक के आनन्दरसपान का वर्णन हुआ है। आनन्दरसपान कर जब जीवात्मा मुक्त हो जाता है, उसका वर्णन मन्त्र २ में हुआ है। दाना=दाप् लवणे; दान खण्डने।]

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    विषय

    ईश्वर दर्शन।

    भावार्थ

    (मृगः वारणः न) चैनैला हाथी (दाना) मद जलों के कारण (पुरुत्र) बहुतसे स्थलों पर (चरथं दधे) विचरण करता है। उसी प्रकार यह इन्द्र जीव (दाना) अपन शुभाशुभ कर्मों द्वारा (पुरुन वरथं दधे) बहुत से शरीरों में विचरण करता है अथवा (चरथं दधे) नाना फल भोग प्राप्त करता है। हे इन्द्र ! आत्मन् (खा) तुझको (नकिः) कोई भी नहीं (नियमत्) बांध सकता। (सुते आगमः) सवन किये सोम के समान योगादि साधनों से सम्पादित इस सोम रूप ब्रह्म रस के निमित्त (आगमः) तु प्राप्त हो और (घोजसा महान्) बलवीर्य से महान् होकर (चरसि) विचरण कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मेधातिथिः काण्व ऋषिः। इन्दो देवता। बृहत्यः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra is generously giving, preventive, counter¬ active and invincible like a lion, and holds and rules the world of immense variety in motion. O lord of grandeur and majesty, as you move around everywhere by your might and lustre, pray come, bless our yajna and taste the soma of our creation. No one can restrain you, no one counter your will.

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    Translation

    The Almighty God like wild elephant which mad with heat rushes on hither and thither, pervades the world unchecked O Lord, None in this world can check and bind you. You great one with your power pervade all and give Persistence to all.

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    Translation

    The Almighty God like wild elephant which mad with heat rushes on hither and thither, pervades the world unchecked. O Lord, None in this world can check and bind you. You great one with your power pervade all and give persistence to all.

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    Translation

    O Commander of the armies, or soul, you roam about in many places, like the wild elephant incited by the vital force. There is none to obstruct thy movements. You vehemently move on to excellence and get the medicinal juice, prepared for thee, or (the nectar of salvation for the soul).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(दाना) दानेन। मदजलेन (मृगः) वनचरः (न) यथा (वारणः) गजः (पुरुत्रा) बहुप्रकारेण (चरथम्) शीङ्शपिरुगमि। उ० ३।११३। चरतेः अथप्रत्ययः। संचरणम् (दधे) धरति (नकिः) न कोऽपि (त्वा) त्वाम् (नि यमत्) नियच्छति (आ) (सुते) तत्त्वरसम् (गमः) प्राप्नुहि (महान्) (चरसि) (ओजसा) ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    সেনানীলক্ষণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ন) যেরূপে (মৃগঃ) বন্য (বারণঃ) হাতি (দানা) মদমত্ত হওয়ার কারণে (পুরুত্রা) বহু প্রকারে (চরথম্) উপদ্রব (দধে) ধারণ করে [তেমনই] (নকিঃ) এমন কেউ নেই যে (ত্বা) তোমাকে (নি যমৎ) প্রতিহত/প্রতিরোধ করতে পারে, (সুতে) তত্ত্ব রস (আ গমঃ) তুমি প্রাপ্ত হও, (মহান্) মহান্ হয়ে তুমি (ওজসা) বলসম্পন্ন হয়ে (চরসি) বিচরণ করো ॥২॥

    भावार्थ

    যেমন বনের উন্মত্ত হাতি চতুর্দিকে ঘুরে ঘুরে বনে উপদ্রব করে, তেমনই নীতিজ্ঞ সেনাপতি তত্ত্ব বিচারপূর্বক শত্রুদের শীঘ্র দমন করুক॥২॥

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    भाषार्थ

    (ন) যেমন (মৃগঃ বারণঃ) বণ্য হাতি, জঙ্গলে (দানা=দানানি) নষ্ট-ভ্রষ্ট (দধে) করে, এবং (পুরুত্রা) বহু স্থানে (চরথং দধে) স্বচ্ছন্দ বিচরণ করে, তেমনই তুমি মুক্তাত্মা, শারীরিক বন্ধন-সমূহ ছিন্ন-ভিন্ন করে সর্বত্র স্বচ্ছন্দে বিচরণ করো। হে মুক্তাত্মন্! স্বচ্ছন্দে বিচরনের ক্ষেত্রে (নকিঃ) না কেউ (ত্বা) তোমাকে (নিয়মৎ) নিয়ন্ত্রিত করতে পারে/সক্ষম। (সুতে) এই উৎপন্ন জগতে (আ গমঃ) তুমি পুনঃ ফিরে আসো, পুনঃ জন্ম ধারণ করো। তুমি (মহান্) মহাশক্তিসম্পন্ন হয়ে (ওজসা) নিজ শক্তি দ্বারা (চরসি) বিচরণ করো।

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