अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 67/ मन्त्र 2
मो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन्द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत्पु॒रोत जा॑रिषुः। यद्व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम्। अ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठमो इति॑ । सु । व॒: । अ॒स्मत् । अ॒भि । तानि॑ । पौंस्या॑ । सना॑ । भू॒व॒न् । द्यु॒म्नानि॑ । आ । उ॒त । जा॒रि॒षु॒: । अ॒स्मत् । पु॒रा । उ॒त । जा॒रि॒षु॒: ॥ यत् । व॒: । चि॒त्रम् । यु॒गेऽयु॑गे । नव्य॑म् । घोषा॑त् । अम॑र्त्यम् ॥ अ॒स्मासु॑ । तत् । म॒रु॒त॒: । यत् । च॒ । दु॒स्तर॑म् । दि॒धृत । यत् । च॒ । दु॒स्तर॑म् ॥६७.२॥
स्वर रहित मन्त्र
मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन्द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत्पुरोत जारिषुः। यद्वश्चित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्। अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम् ॥
स्वर रहित पद पाठमो इति । सु । व: । अस्मत् । अभि । तानि । पौंस्या । सना । भूवन् । द्युम्नानि । आ । उत । जारिषु: । अस्मत् । पुरा । उत । जारिषु: ॥ यत् । व: । चित्रम् । युगेऽयुगे । नव्यम् । घोषात् । अमर्त्यम् ॥ अस्मासु । तत् । मरुत: । यत् । च । दुस्तरम् । दिधृत । यत् । च । दुस्तरम् ॥६७.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(मरुतः) हे शत्रुओं के मारनेवाले वीरो ! (अस्मत्) हम पर से (वः) तुम्हारे (तानि) वे (सना) सनातन [वा सेवनीय] (पौंस्या) मनुष्य कर्म [वा बल] (मो षु अभि भूवन्) कभी भी न हट जावें, (उत) और [तुम्हारे] (द्युम्नानि) चमकते हुए यश वा धन (मा जारिषुः) कभी न घटें, (उत) और (अस्मत्) हमसे (पुरा) आगे को (जारिषुः) बड़ाई योग्य होवें। और (यत्) जो (वः) तुम्हारा (चित्रम्) विचित्र [अद्भुत] कर्म (युगे युगे) युग-युग में [समय-समय पर] (घोषात्) घोषणा देने से (नव्यम्) स्तुतियोग्य [वा नवीन] और (अमर्त्यम्) मनुष्यों में दुर्लभ है, (च) और (यत्) जो कुछ (दुस्तरम्) पाने में कठिन (च) और (यत्) जो कुछ (दुस्तरम्) पाने में कठिन है, (तत्) उसको (अस्मासु) हममें (दिधृत) धारण करो ॥२॥
भावार्थ
मनुष्यों को सदा आपस में मिलकर बल; यश और धन बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये ॥२॥
टिप्पणी
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।१३९।८ ॥ २−(मो) नैव (सु) सुष्ठु (वः) युष्माकम् (अस्मत्) अस्मत्तः (अभि) अभिभवे (तानि) प्रसिद्धानि (पौंस्या) गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। पा० ।१।१२४। पुंस्-ष्यञ्, ब्राह्मणादेराकृतिगणत्वात्। पुंसां कर्माणि। बलानि-निघ० २।९। (सना) सनातनानि। सेवनीयानि (भूवन्) अडभावः। अभूवन्। भवन्तु (द्युम्नानि) अ० ६।३।३। द्योतमानानि यशांसि धनानि वा (मा) निषेधे (उत) अपि (जारिषुः) जॄ वयोहानौ, अडभावः। अजारिषुः जरन्तु। जीर्णानि क्षीणानि भवन्तु (अस्मत्) अस्माकं सकाशात् (पुरा) अग्रकाले (उत) (जारिषुः) जॄ स्तुतौ। स्तुत्यानि भवन्तु (यत्) कर्म (वः) युष्माकम् (चित्रम्) अद्भुतम् (युगे युगे) समये समये। सर्वदा (नव्यम्) स्तुत्यम्। नूतनम्-निघ० ३।१८। (घोषात्) घुषिर्, शब्दे घञ्। घोषणायाः। व्यापनार्थमुच्चैः शब्दकारणात् (अमर्त्यम्) अमरणधर्मकम्। मर्त्येषु दुर्लभम्। नाशरहितम् (अस्मासु) (तत्) (मरुतः) हे शत्रुनाशका वीराः (यत्) यत् किञ्चित् (च) (दुस्तरम्) दुःखेन तरितुं प्राप्तुं योग्यम् (दिधृत) शपः श्लुः, अभ्यासस्य इत्त्वं च छान्दसम्, सांहितिको दीर्घः। धरत्। स्थापयत (यत्) (च) (दुस्तरम्) ॥
विषय
'चित्त-नव्य-अमर्त्य' सोमरूप धन
पदार्थ
१. हे (मरुत्त:) = प्राणो! (व:) = आपके-आपकी साधना से उत्पन्न होनेवाले (तानि) = वे प्रसिद्ध (सना) = संभजनीय-सेवनीय-(पौंस्या) = बल (अस्मत्) = हमसे (उ) = निश्चयपूर्वक (मा सु अभिभूवन्) = [अपगतानि मा भूवन् सा०] मत ही अलग हों। (उत) = और (द्युम्नानि) = ज्ञान की ज्योतियों (मा जारिष:) = क्षीण न हों। (उत) = और (अस्मत्) = हमारी (पुरा) = ये शरीररूप नगरियाँ (मा जारिष:) = जीर्ण न हो जाएँ। एवं, प्राणसाधना से [क] शक्ति प्राप्त होती है [ख] ज्ञानज्योति बढ़ती है [ग] शरीर स्वस्थ होता है। २. हे मरुतो। (यत्) = जो (व:) = आपका (चित्रम्) = अद्भुत (युगे-युगे) = जीवन के प्रत्येक काल में-बाल्य, यौवन व वार्धक्य में-(नव्यम्) = स्तुति के योग्य धन है, जो धन (अमर्त्य घोषात्) = मनुष्य की अमर्त्यता की घोषणा करता है (तत्) = उस धन को (अस्मासु) = हममें (दिधृता) = धारण कीजिए (च) = और उस धन को धारण कीजिए (यत्) = जो (दुष्टरम्) = शत्रुओं से तैरने योग्य नहीं है (यत् च) = और जो सचमुच (दुष्टरम्) = शत्रुओं से तैरने योग्य नहीं। मरुतों का यह धन सोम ही है। प्राणसाधना से इस सोम का शरीर में रक्षण होता है। रक्षित सोमरूप धन [चित्रम्-]अद्भुत है। यह जीवन के प्रत्येक अन्तर [Period] में स्तुत्य परिणामों को पैदा करता है [नव्यम्]। यह हमें अमर्त्य बना देता है-रोगों का शिकार नहीं होने देता। रोगकृमिरूप शत्रुओं से यह सोम दुष्टर होता है।
भावार्थ
प्राणसाधना से हमें शक्ति प्राप्त होती है, हमारी ज्ञानज्योति बढ़ती है, शरीर क्षीण नहीं होते। इस साधना से सोम-रक्षण द्वारा 'अद्भुत' स्तुत्य-पूर्ण जीवन को प्राप्त करानेवाला दुष्टर बल प्राप्त होता है।
भाषार्थ
हे मर्त्यो! (वः) तुम्हें (अस्मत्) हम से प्राप्त (पौंस्या) पौरुषकर्म या शक्तियाँ (मा उ सु) न (अभि भूवन्) किसी भी शक्ति द्वारा पराभूत न हों, अपितु वे (सना) सदा (भूवन्) बनी रहें; (उत) और (अस्मत् द्युम्नानि) हमसे दी गई आध्यात्मिक-सम्पत्तियाँ, (पुरा) जो कि पुराकाल से चली आ रही हैं (मा जारिषुः) जीर्ण-शीर्ण न होने पाएँ, (उत) और (पुरा) पुराकालीन वे आध्यात्मिक सम्पत्तियाँ (मा जारिषुः) कभी जीण-शीर्ण न हों। और (युगे-युगे) प्रत्येक युग में (वः) तुम्हारे लिए (यद्) जो (चित्रम्) आश्चर्यकारी (अमर्त्यम्) अविनश्वर और (नव्यम्) स्तुत्य आध्यात्मिक सम्पत्तियाँ (घोषात्) घोषित की जाती हैं, वे भी जीर्णशीर्ण न होने पाएँ। (मरुतः) हे मरणधर्मा मनुष्यो! (तत्) वह (यत्) जो कि (अस्मासु) हम में (दुष्टरम्) अपराभवनीय आध्यात्मिक सम्पत्ति है, उसे तुम (दिधृत) धारण करो, हाँ वह (यत् दुष्टरम्) जो अपराभवनीय सम्पत्ति है उसे अवश्य धारण करो।
विषय
ईश्वर और राजा।
भावार्थ
हे (मरुतः) मरुदगणों ! वीर सुभटो ! एवं वैश्य प्रजाजनो ! (अस्मत्) हमसे (तानि) वे नाना प्रकार के (सना) सदा से हमें वंश परम्परा से प्राप्त, नित्य (वः पौंस्या) आप लोगों के पौरुष के कर्म और अधिकार (मो सु अभि भूवन्) नष्ट न हों। और (द्युम्नानि) सदातन, नित्य या स्थिर (द्युम्नानि) यश और ऐश्वर्य (मा उत जारिषुः) कभी नष्ट न हों। और (अस्मत्) हमारे हाथों से (पुरा) पुर और नगर आदि और उनमें रहने वाले प्राणी (मा उत जारिषुः) नष्ट न हों। (वः) आप लोगों का (यत्) जो (चित्रं) अद्भुत या नाना प्रकार का और (नव्यम्) नवीन और (अमर्त्यम्) मरणधर्मा, साधारण मनुष्य को न प्राप्त होने वाला धन (घोषात्) कहाता है हे (मरुतः) वीर सुभटो ! (तत्) वह और (यत् च) जो कुछ भी (दुष्टरं) दुःखी से प्राप्त किया जाय और (यत् च दुस्तरम्) जो दुस्तर, अपार हो (तत्) वह सब (अस्मासु) हम (दिधृत प्रदान करे। अध्यात्म में—हे (मरुतः) प्राणगण ! (वः) तुम्हारे (तानि सना पौंस्या मो सु अभि भूवन्) वे नाना, सदातन, नित्य आत्मसम्बन्धी बलकर्म नष्ट न हों। अर्थात् इन्द्रियों के सामर्थ्य बने रहें। (अस्मत् द्युम्नानि मोत जारिषुः) तेजोमय ज्ञान हमसे न छूटें वे भी बने रहें। (उत) और चाहे (पुरा) ये देह (अस्मत्) हमसे (जारिषुः) छूट जाय पर (यत्) जो (वः) तुम लोगों के बीच (नव्यं) सदा स्तुत्य, सदा नवीन और (अमर्त्यम्) अमर (चित्रं) चित् स्वरूप में रमण करने वाला आत्मा (घोषात्) कहा जाता है (यत् च दुस्तरम्) और जिसको अज्ञान पा नहीं सकते और (यत् च दुस्तरम्) जिस नित्य, अनन्त को अनित्य प्रलोभन पार कर नहीं सकते, जीत नहीं सकते उस ईश्वरीय बलको (अस्मासु दिधृत) हमारे में धारण करा।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
२-३ परुच्छेम ऋषिः। ४-७ गृत्समदः। १-३ अत्यष्टयः। ४-७ अगत्यः सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
O Maruts, brave heroes of earth and space vibrant as waves of energy, may your ancient and eternal powers and potentials and ours, and our honour and fame never wear away outmoded, and never forsake us. Whatever is yours, wondrous and excellent, ancient and yet ever new from age to age, what is imperishable from the eternal Voice and your proclamations, fix that within us deep in the mind, so it is difficult to surpass, unchallengeable.
Translation
O men of merits and actoins, may your those endavours and deeds which are for us grow ever from strenghth to strength; may not your splendid glories fall in to decay and never before time these may go in to decay; you give us what ever of yours is declared wonderous, new in all ages and surpassing the man and whatever is unattainable by ordinary man and is even difficult to win.
Translation
O men of merits and actions, may your those endeavors and deeds which are for us grow ever from strength to strength; may not your splendid glories fall in to decay and never before time these may go in to decay; you give us whatever of yours is declared wondrous, new in all ages and surpassing the man and whatever is unattainable by ordinary man and is even difficult to win.
Translation
O brave persons, let not those acts or means of valour of yours which have ever been done by you for our sake, forsake us. Let not the constant glory and fortune fade away. Let not our forts and towns be perished. Whatever is declared wonderful new and everlasting glory and riches, whatever is difficult to achieve and whatever is unsurmountable, let that be ours, O brave persons.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।१३९।८ ॥ २−(मो) नैव (सु) सुष्ठु (वः) युष्माकम् (अस्मत्) अस्मत्तः (अभि) अभिभवे (तानि) प्रसिद्धानि (पौंस्या) गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। पा० ।१।१२४। पुंस्-ष्यञ्, ब्राह्मणादेराकृतिगणत्वात्। पुंसां कर्माणि। बलानि-निघ० २।९। (सना) सनातनानि। सेवनीयानि (भूवन्) अडभावः। अभूवन्। भवन्तु (द्युम्नानि) अ० ६।३।३। द्योतमानानि यशांसि धनानि वा (मा) निषेधे (उत) अपि (जारिषुः) जॄ वयोहानौ, अडभावः। अजारिषुः जरन्तु। जीर्णानि क्षीणानि भवन्तु (अस्मत्) अस्माकं सकाशात् (पुरा) अग्रकाले (उत) (जारिषुः) जॄ स्तुतौ। स्तुत्यानि भवन्तु (यत्) कर्म (वः) युष्माकम् (चित्रम्) अद्भुतम् (युगे युगे) समये समये। सर्वदा (नव्यम्) स्तुत्यम्। नूतनम्-निघ० ३।१८। (घोषात्) घुषिर्, शब्दे घञ्। घोषणायाः। व्यापनार्थमुच्चैः शब्दकारणात् (अमर्त्यम्) अमरणधर्मकम्। मर्त्येषु दुर्लभम्। नाशरहितम् (अस्मासु) (तत्) (मरुतः) हे शत्रुनाशका वीराः (यत्) यत् किञ्चित् (च) (दुस्तरम्) दुःखेन तरितुं प्राप्तुं योग्यम् (दिधृत) शपः श्लुः, अभ्यासस्य इत्त्वं च छान्दसम्, सांहितिको दीर्घः। धरत्। स्थापयत (यत्) (च) (दुस्तरम्) ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(মরুতঃ) হে শত্রু বিনাশক বীরগণ ! (অস্মৎ) আমাদের ওপর থেকে (বঃ) তোমাদের (তানি) প্রসিদ্ধ (সনা) সনাতন [বা সেবনীয়] (পৌংস্যা) মনুষ্য কর্ম [বা বল] (মো ষু অভি ভূবন্) কখনও যেন না দূর হয়, (উত) এবং [তোমাদের] (দ্যুম্নানি) দেদীপ্যমান যশ বা ধন যেন (মা জারিষুঃ) কখনও না হ্রাস পায়, (উত) তথা (অস্মৎ) আমাদের (পুরা) আগামী দিনে/প্রজন্মের (জারিষুঃ) প্রশংসা যোগ্য হোক। এবং (যৎ) যা (বঃ) তোমাদের (চিত্রম্) বিচিত্র [অদ্ভুত] কর্ম (যুগে যুগে) যুগে যুগে [সময়ে-সময়ে] (ঘোষাৎ) ঘোষণা দেওয়ার মাধ্যমে (নব্যম্) স্তুতিযোগ্য [বা নবীন] তথা (অমর্ত্যম্) মনুষ্য মধ্যে দুর্লভ, (চ) এবং (যৎ) যা কিছু (দুস্তরম্) দুস্তর/পরিশ্রম দ্বারা প্রাপ্তিযোগ্য (চ) এবং (যৎ) যা কিছু (দুস্তরম্) দুস্তর/ পরিশ্রম দ্বারা প্রাপ্তিযোগ্য , (তৎ) তা (অস্মাসু) আমাদের মধ্যে (দিধৃত) স্থাপন করো ॥২॥
भावार्थ
মনুষ্যদের সদা পরস্পর মিলিত হয়ে বল, যশ এবং ধন বৃদ্ধিতে সদা প্রচেষ্টা করা উচিত ॥২॥ এই মন্ত্র ঋগ্বেদে আছে-১।১৩৯।৮ ॥
भाषार्थ
হে মর্ত্যগণ/মরণধর্মা মনুষ্যগণ! (বঃ) তোমাদের (অস্মৎ) আমাদের থেকে প্রাপ্ত (পৌংস্যা) পৌরুষকর্ম বা শক্তি-সমূহ (মা উ সু) না (অভি ভূবন্) কোনো শক্তি দ্বারা পরাভূত হোক, অপিতু তা (সনা) সদা (ভূবন্) বর্তমান থাকুক; (উত) এবং (অস্মৎ দ্যুম্নানি) আমাদের দ্বারা প্রদত্ত আধ্যাত্মিক-সম্পত্তি, (পুরা) যা পুরাকাল থেকে চলমান (মা জারিষুঃ) জীর্ণ-শীর্ণ যেন না হয়, (উত) এবং (পুরা) পুরাকালীন সেই আধ্যাত্মিক সম্পত্তি-সমূহ (মা জারিষুঃ) কখনও জীণ-শীর্ণ না হোক। এবং (যুগে-যুগে) প্রত্যেক যুগে (বঃ) তোমাদের জন্য (যদ্) যে (চিত্রম্) আশ্চর্যকারী (অমর্ত্যম্) অবিনশ্বর এবং (নব্যম্) স্তুত্য আধ্যাত্মিক সম্পত্তি (ঘোষাৎ) ঘোষিত করা হয়, তাও জীর্ণশীর্ণ যেন না হয়। (মরুতঃ) হে মরণধর্মা মনুষ্যগণ! (তৎ) তা (যৎ) যা (অস্মাসু) আমাদের মধ্যে (দুষ্টরম্) অপরাভবনীয়/অপরাজেয় আধ্যাত্মিক সম্পত্তি, তা তোমরা (দিধৃত) ধারণ করো, (যৎ দুষ্টরম্) যা অপরাভবনীয় সম্পত্তি, তা অবশ্যই ধারণ করো।
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