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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 3/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रु सेनासंमोहन सूक्त
    81

    अ॒ग्निर्नो॑ दू॒तः प्र॒त्येतु॑ वि॒द्वान्प्र॑ति॒दह॑न्न॒भिश॑स्ति॒मरा॑तिम्। स चि॒त्तानि॑ मोहयतु॒ परे॑षां॒ निर्ह॑स्तांश्च कृणवज्जा॒तवे॑दाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ग्नि: । न॒: । दू॒त: । प्र॒ति॒ऽएतु॑ । वि॒द्वान् । प्र॒ति॒ऽदह॑न् । अ॒भिऽश॑स्तिम् । अरा॑तिम् ।स: । चि॒त्तानि॑ । मो॒ह॒य॒तु॒ । परे॑षाम् । नि:ऽह॑स्तान् । च॒ । कृ॒ण॒व॒त् । जा॒तऽवे॑दा: ॥२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्निर्नो दूतः प्रत्येतु विद्वान्प्रतिदहन्नभिशस्तिमरातिम्। स चित्तानि मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवेदाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्नि: । न: । दूत: । प्रतिऽएतु । विद्वान् । प्रतिऽदहन् । अभिऽशस्तिम् । अरातिम् ।स: । चित्तानि । मोहयतु । परेषाम् । नि:ऽहस्तान् । च । कृणवत् । जातऽवेदा: ॥२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (अग्निः) अग्नि [के समान तेजस्वी] (दूतः) अग्रगामी वा तापकारी (विद्वान्) विद्वान् राजा (नः) हमारेलिये (अभिशस्तिम्) मिथ्या अपवाद और (अरातिम्) शत्रुता को (प्रतिवहन्) सर्वथा भस्म करता हुआ (प्रत्येतु) चढ़ाई करे। (सः) वह (जातवेदाः) प्रजाओं का जाननेवाला [सेनापति] (परेषाम्) शत्रुओं के (चित्तानि) चित्तों को (मोहयतु) व्याकुल कर देवे (च) और [उनको] (निर्हस्तान्) निहत्था (कृणवत्) कर डाले ॥१॥

    भावार्थ - राजा सेनादि से ऐसा प्रबन्ध रक्खे कि प्रजा गण आपस में मिथ्या कलङ्क न लगावें और न वैर करें और दुराचारियों को दण्ड देता रहे कि वे शक्तिहीन होकर सदा दबे रहें, जिससे श्रेष्ठों को सुख मिले और राज्य बढ़ता रहे ॥१॥ यह मन्त्र इसी काण्ड के सूक्त १ मन्त्र १ में कुछ भेद से है ॥


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    Meaning -
    Let Agni, our brilliant leader and commander, versatile strategist and tactician, march against the enemy destroying the evil curse and misfortune of malignity and adversity. Let him, knowing all his own powers and potential and also the enemy’s, bewilder the mind and morale of the hostile forces and force them to lay down their arms.


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