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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 22 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 5
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - बृहस्पतिः, विश्वेदेवाः, वर्चः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वर्चः प्राप्ति सुक्त
    50

    याव॒च्चत॑स्रः प्र॒दिश॒श्चक्षु॒र्याव॑त्समश्नु॒ते। ताव॑त्स॒मैत्वि॑न्द्रि॒यं मयि॒ तद्ध॑स्तिवर्च॒सम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    याव॑त् । चत॑स्र: । प्र॒ऽदिश॑: । चक्षु॑: । याव॑त् । स॒म्ऽअ॒श्नु॒ते । ताव॑त् । स॒म्ऽऐतु॑ । इ॒न्द्रि॒यम् । मयि॑ । तत् । ह॒स्ति॒ऽव॒र्च॒सम् ॥२२.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत्समश्नुते। तावत्समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यावत् । चतस्र: । प्रऽदिश: । चक्षु: । यावत् । सम्ऽअश्नुते । तावत् । सम्ऽऐतु । इन्द्रियम् । मयि । तत् । हस्तिऽवर्चसम् ॥२२.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 22; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    कीर्ति पाने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (यावत्) जितनी दूर (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) महादिशायें हैं, और (यावत्) जितनी दूर (चक्षुः) आँख [दर्शन शक्ति] (समश्नुते) फैलती है, (तावत्) वहाँ तक (मयि) मुझमें (तत्) वह (हस्तिवर्चसम्) हाथी के बलवाला (इन्द्रियम्) परम ऐश्वर्य (समैतु) आकर मिले ॥५॥

    भावार्थ

    मनुष्य सब पार्थिव और दिव्य पदार्थों के यथावत् ज्ञान से सामर्थ्य बढ़ाकर उन्नति करें ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(चतस्रः) चतुःसंख्याकाः। (प्रदिशः) महादिशः। (चक्षुः) अ० १।३३।४। नेत्रं दर्शनसामर्थ्यम्। (समश्नुते) सम्यग् व्याप्नोति (समैतु) सम्+आ एतु। सम्यग् आगच्छतु। (इन्द्रियम्) अ० १।३५।३। इन्द्र-घञ्। इन्द्रस्य परमैश्वर्ययुक्तस्य लिङ्गम्। परमैश्वर्यम्। (मयि) ईश्वरभक्ते। (तत्) प्रसिद्धम्। (हस्तिवर्चसम्) म० १। गजस्य बलयुक्तम् ॥

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    विषय

    यशस्वी बल

    पदार्थ

    १. (यावत्) = जितनी (चतस्त्रः प्रदशि:) = चारों प्रकृष्ट दिशाएँ फैली हैं, (यावत्) = जहाँ तक (चक्षुः) = आँख (समश्नुते) = व्यास होती है, (तावत्) = उतनी दूर तक व्याप्त होनेवाला (इन्द्रियम्) = बल (सम् ऐत) = मेरे साथ सर्वथा सङ्गत हो। २. (मयि) = मुझमें (तत्) = वह (हस्तिवर्षसम्) = हाथी के समान बल प्राप्त हो।

    भावार्थ

    मैं अपने बल के द्वारा रक्षणात्मक कार्यों को करता हुआ चारों दिशाओं में यशस्वी बनूं। मैं हाथी के समान बल प्राप्त करूँ।

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    भाषार्थ

    (चतस्रः प्रदिशः) चार प्रकृष्ट-दिशाएँ (यावत्) जितने प्रदेश में व्याप्त हैं तथा (चक्षुः) रूपग्राहक आँख (यावत्) जितने प्रदेश को (समश्नुते) सम्यक् व्याप्त करती है, जितने प्रदेश तक देख सकती है, (तावत्) उतना (इन्द्रियम्) ऐन्द्रियिक बल (समैतु) मुझे प्राप्त हो, (मयि) और मुझमें (तद्) वह अर्थात् उत्तम (हस्तिवर्चसम्) हाथी का वर्चस् (ऐतु) प्राप्त हो। हस्तिवर्चस् है, बल का अतिशय।

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    विषय

    तेजस्वी होने की प्रार्थना ।

    भावार्थ

    (यावत् चतस्रः प्रदिशः) जितनी भर चारों दिशाएं हैं और यावत् चक्षुः (समश्नुते) और जितनी दूर तक हमारी चक्षु फैल सकती है, (तावत्) उतना (मयि) मुझ में (हस्तिं-वर्चस) हस्ती के समान या सूर्य के समान (इन्द्रियं) मेरे आत्मा में सामर्थ्य (सम् आ एतु) मुझ में समाजाय। मैं अनन्त तेजस्वी हो जाऊं।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘समेतु’ इति सायणः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वशिष्ठ ऋषिः । वर्चो देवता । बृहस्पतिरुत विश्वेदेवाः । १ विराट् त्रिष्टुप् । ३ त्रिपदा परानुष्टुप् विराड्जगती । ४ त्र्यवसाना षट्पदा जगती । २, ५, ६ अनुष्टुभः ॥ षडृचं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Lustre of Life

    Meaning

    As far as the four quarters of space extend, as far as the eyes can reach, that far and that high may the vigour and lustre of body, mind and soul, like the vigour of the elephant’s, be vested in me by the grace of Jataveda.

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    Translation

    As much as the four regions of heaven extend: as-much as the eye does reach, so much may that elephantine vigour be infused in me toning up my sense-organs.

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    Translation

    Let us attain elephantine vigor as well as the spiritual vigor to the magnitude of whatever distance is covered by the four regions of heaven and whatever distance the eyes pursue their objects.

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    Translation

    Far as the heaven’s four regions spread, far as the eye’s most distant ken reaches, so wide, so vast be my soul power, like the Sun.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(चतस्रः) चतुःसंख्याकाः। (प्रदिशः) महादिशः। (चक्षुः) अ० १।३३।४। नेत्रं दर्शनसामर्थ्यम्। (समश्नुते) सम्यग् व्याप्नोति (समैतु) सम्+आ एतु। सम्यग् आगच्छतु। (इन्द्रियम्) अ० १।३५।३। इन्द्र-घञ्। इन्द्रस्य परमैश्वर्ययुक्तस्य लिङ्गम्। परमैश्वर्यम्। (मयि) ईश्वरभक्ते। (तत्) प्रसिद्धम्। (हस्तिवर्चसम्) म० १। गजस्य बलयुक्तम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (চতস্রঃ প্রদিশঃ) চারটি প্রকৃষ্ট-দিশা (যাবৎ) যত প্রদেশে ব্যপ্ত আছে এবং (চক্ষুঃ) রূপগ্ৰাহক চক্ষু (যাবৎ) যত প্রদেশকে (সমশ্নুতে) সম্যক্ ব্যাপ্ত করে, যত প্রদেশ পর্যন্ত দেখতে পারে, (তাবৎ) তত (ইন্দ্রিয়ম্) ঐন্দ্রেয়িক বল (সমৈতু) আমাকে প্রাপ্ত হোক, (ময়ি) এবং আমার মধ্যে (তদ্) সেই অর্থাৎ উত্তম (হস্তিবর্চসম্) হাতির বর্চস্ (এতু) প্রাপ্ত হোক। হস্তিবর্চস হলো, বলের অতিশয়/অত্যাধিক বল/শক্তি।

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    मन्त्र विषय

    কীর্তিপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যাবৎ) যত দূর (চতস্রঃ) চারদিকে (প্রদিশঃ) মহাদিশা রয়েছে, এবং (যাবৎ) যত দূর (চক্ষুঃ) চক্ষু/চোখ [দর্শন শক্তি] (সমশ্নুতে) বিস্তারিত/ব্যাপ্ত হয়, (তাবৎ) সেখান পর্যন্ত (ময়ি) আমার মধ্যে (তৎ) সেই (হস্তিবর্চসম্) হাতির বলযুক্ত (ইন্দ্রিয়ম্) পরম ঐশ্বর্য (সমৈতু) এসে প্রাপ্ত হোক॥৫॥

    भावार्थ

    মনুষ্য সকল পার্থিব ও দিব্য পদার্থের যথাবৎ জ্ঞান দ্বারা সামর্থ্য বৃদ্ধি করে উন্নতি করুক॥৫॥

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