अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 100/ मन्त्र 2
ऋषिः - गरुत्मान ऋषि
देवता - वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - विषनिवारण का उपाय
48
यद्वो॑ दे॒वा उ॑पजीका॒ आसि॑ञ्च॒न्धन्व॑न्युद॒कम्। तेन॑ दे॒वप्र॑सूतेने॒दं दू॑षयता वि॒षम् ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । व॒: । दे॒वा: । उ॒प॒ऽजी॒का॒: । आ॒ऽअसि॑ञ्चन् । धन्व॑नि । उ॒द॒कम् । तेन॑ । दे॒वऽप्र॑सूतेन । इ॒दम् । दू॒ष॒य॒त॒ । वि॒षम् ॥१००.२॥
स्वर रहित मन्त्र
यद्वो देवा उपजीका आसिञ्चन्धन्वन्युदकम्। तेन देवप्रसूतेनेदं दूषयता विषम् ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । व: । देवा: । उपऽजीका: । आऽअसिञ्चन् । धन्वनि । उदकम् । तेन । देवऽप्रसूतेन । इदम् । दूषयत । विषम् ॥१००.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थ
(उपजीकाः) हे [परमेश्वर के] आश्रित प्राणियो ! (वः) तुम्हारे लिये (देवाः) विद्वानों ने (धन्वनि) निर्जल स्थान में (यत् उदकम्) जिस जल को (आ−असिञ्चन्) लाकर सींचा है। (देवप्रसूतेन) विद्वानों के दिये हुए (तेन) अमृत से (इदम् विषम्) इस विष को (दूषयत) नाश करो ॥२॥
भावार्थ
जिस प्रकार विद्वान् तोग मरुस्थल में कूप, तडाग, जल नाली आदि द्वारा जल लाकर सुख पाते हैं, वैसे ही मनुष्य विज्ञान द्वारा आत्मिक दोष मिटाकर सुखी होवें ॥२॥
टिप्पणी
२−(यत्) (वः) युष्मदर्थम् (देवाः) विद्वांसः (उपजीकाः) अ० २।३।४। उप+जीव प्राणधारणे−ईकन्, स च डित्। उपजीविनः। परमेश्वराश्रिताः प्राणिनः (आ−असिञ्चन्) आनीय सिक्तवन्तः (धन्वनि) मरुदेशे (उदकम्) जलम् (तेन) तक सहने हासे च, यद्वा तर्द हिंसे−ड। अमृतेन (देवप्रसूतेन) विद्वद्भिः प्रेषितेन (इदम्) (दूषयत) नाशयत (विषम्) विषरूपं दुःखम् ॥
विषय
उपजीका:
पदार्थ
१. हे (देवा:) = ज्ञानी पुरुषो! (यत् उदकम्) = जिस जल को (उपजीका:) = दीमक नाम की श्वेत कीड़ियाँ (धन्वनि) = मरुस्थल में जलरहित स्थल में (आसिञ्चन्) = अपने मुख से उत्पन्न कर देती हैं, वह जल (व:) = तुम्हारे लिए है। (तेन) = उस (देवप्रसूतेन) = ईश्वरप्रदत्त शक्ति से उत्पन्न जल से (इदं विषं दूषयत्) = इस विष को दूर करो।
भावार्थ
दीमक के मुख में एक अद्भुत शक्ति है। वह उसके द्वारा वायुमण्डल के अम्लजन व उद्जन को मिलाकर जल उत्पन्न कर देती है। यह जल विष का औषध है। दीमकों से निकाली गई मिट्टी भी अतिमूत्र व नाड़ीब्रण में औषध का काम देती है।
भाषार्थ
(उपजीकाः) हे दीमको ! (देवाः) दिव्य तत्त्वों ने (वः) तुम्हारे [मुखों में] (धन्वनि) मरु प्रदेश में (यत्) जो (उदकम्) मुखरस [Saliva] (आसिञ्चन्) सींचा है, (देवप्रसुतेन) दिव्य तत्त्वों द्वारा उत्पादित (तेन) उस उदक द्वारा (इदम् विषम्) इस विष को (दूषयता) दूषित कर दो, विकृत कर दो, विष के विषत्व को नष्ट कर दो।
टिप्पणी
[वैदिक वर्णन प्रायः कविता के शब्दों में होते हैं। कविता में ही दीमकों को सम्बोधित किया है। दीमकों को "उपजीकाः" कहा है। उपजीकाः = उप + ज्या वयोहानौ (क्र्यादिः) "ज्या" के यकार को सम्प्रसारण द्वारा इकार हो कर, दीर्घ + कन् (अल्पार्थे)। दीमक जिस के समीप लग जाती है उस के वयः की हानि कर देती है, उसे विनष्ट कर देती है। संसार के दिव्य तत्वों द्वारा सब प्राणी, उन के अवयव, तथा उन अवयवों में जीवनीय रस पैदा होते हैं। इन्हीं तत्त्वों द्वारा दीमक के मुख में उदक अर्थात् मुख रस पैदा होता है। इस मुख रस को दीमकें जिस काष्ठ आदि पर सींचतीं हैं उसे बलमोक रूप में मिट्टी वना देती है। इस मुखरस द्वारा विष को भी दूषित किया जा सकता है, विष के विषत्व को नष्ट किया जा सकता है। जैसे दीमक का मुखरस [उदक] काष्ठ आदि के स्वरूप को विकृत कर उसे रूपान्तर में परिवर्तित कर देता है, वैसे वह विष के स्वरूप को विकृत कर, उसे रूपान्तर में परिवर्तित कर, उस के विषत्व को नष्ट कर देता है।
विषय
विष चिकित्सा।
भावार्थ
(उपजीकाः) उपजीव्य अर्थात् जीवन के कारणभूत (देवाः) सूर्य की किरणें तथा वायु आदि दिव्य पदार्थ समुद्र में से उठकर (धन्वन्) आकाश में (यद्) जिस (उदकम्) स्वच्छ जल को (असिञ्चन्) चारों ओर सींचते हैं, (देव-प्रसूतेन) इन दिव्य पदार्थों द्वारा उत्पन्न किये गये (तेन) उस शुद्ध जल द्वारा हे दिव्य पदार्थो ! (इदं विषम्) इस विष को (दूषयत) दूर करो। अर्थात् वर्षा के शुद्ध जल द्वारा, शरीर में उत्पन्न या शरीर में सर्प आदि द्वारा प्रविष्ट विष को, दूर किया जा सकता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गरुत्मान् ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Antidote to Poison
Meaning
O men of knowledge and wisdom, whatever waters in the desert lands the clouds are able to give you, by that very water given by the clouds, pray, prepare the antidote for poison, and with that water, given by the grace of God, render that poison ineffective.
Translation
O white ants (upajikg), what water thé bounties of Nature provide for you in the desert, with that, may you counter-act this poison.
Translation
O men! you remove your poisonous affection with that rays-produced water which the rays air etc. that are the means of life, lift up to the atmosphere and pour in the form of rain.
Translation
O men dependent upon God, that water which the learned have poured for you on thirsty soil, with that same water sent by the learned, drive ye away this poison!
Footnote
The water of a thirsty land possesses the quality of mitigating the ill effects of poison.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(यत्) (वः) युष्मदर्थम् (देवाः) विद्वांसः (उपजीकाः) अ० २।३।४। उप+जीव प्राणधारणे−ईकन्, स च डित्। उपजीविनः। परमेश्वराश्रिताः प्राणिनः (आ−असिञ्चन्) आनीय सिक्तवन्तः (धन्वनि) मरुदेशे (उदकम्) जलम् (तेन) तक सहने हासे च, यद्वा तर्द हिंसे−ड। अमृतेन (देवप्रसूतेन) विद्वद्भिः प्रेषितेन (इदम्) (दूषयत) नाशयत (विषम्) विषरूपं दुःखम् ॥
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