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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 121 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 121/ मन्त्र 1
    ऋषिः - कौशिक देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सुकृतलोकप्राप्ति सूक्त
    96

    वि॒षाणा॒ पाशा॒न्वि ष्याध्य॒स्मद्य उ॑त्त॒मा अ॑ध॒मा वा॑रु॒णा ये। दु॒ष्वप्न्यं॑ दुरि॒तं निःष्वा॒स्मदथ॑ गच्छेम सुकृ॒तस्य॑ लो॒कम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒ऽसाना॑ । पाशा॑न् । वि । स्य॒ । अधि॑ । अ॒स्मत् । ये । उ॒त्ऽत॒मा: । अ॒ध॒मा: । वा॒रु॒णा: । ये । दु॒:ऽस्वप्न्य॑म् । दु॒:ऽइ॒तम् । नि: । स्व॒ । अ॒स्मत् । अथ॑ । ग॒च्छे॒म॒ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । लो॒कम् ॥१२१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विषाणा पाशान्वि ष्याध्यस्मद्य उत्तमा अधमा वारुणा ये। दुष्वप्न्यं दुरितं निःष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विऽसाना । पाशान् । वि । स्य । अधि । अस्मत् । ये । उत्ऽतमा: । अधमा: । वारुणा: । ये । दु:ऽस्वप्न्यम् । दु:ऽइतम् । नि: । स्व । अस्मत् । अथ । गच्छेम । सुऽकृतस्य । लोकम् ॥१२१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 121; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मोक्ष पाने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे शूर !] (विषाणा=०−णेन) विविध भक्ति के साथ (पाशान्) फन्दों को (अस्मत्) हमसे (अधि) अधिकारपूर्वक (वि ष्य) खोल दे, (ये) जो (उत्तमाः) ऊँचे और (ये) जो (अधमाः) नीचे फन्दे (वारुणः) जो दोषनिवारक वरुण परमात्मा से आये हैं। (दुःष्वप्न्यम्) नींद में उठे कुविचार और (दुरितम्) विघ्न को (अस्मत्) हम से (निः) निकाल दे, (अथ) फिर (सुकृतस्य) धर्म के (लोकम्) समाज में (गच्छेम) हम जावें ॥१॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य भक्ति की शक्ति को बढ़ाकर अपने बुरे कर्म के फल दुःखों को पुरुषार्थ से हटाकर सोते-जागते उत्तम विचार करते हैं, वे ही पुण्यात्मा कीर्ति पाते हैं ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(विषाणा) अ० ३।७।१। षण सम्भक्तौ−घञ्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति आत्। विविधसेवनेन (पाशान्) बन्धान् (वि ष्य) षो अन्तकर्मणि। विमुञ्च (अधि) अधिकृत्य (अस्मत्) अस्मत्तः (ये) पाशाः (उत्तमाः) ऊर्ध्वकायाश्रिताः (अधमाः) अधःकायाश्रिताः (वारुणाः) तत आगतः। पा० ४।३।७४। इत्यण्। वरुणात् कष्टनिवारकात् परमेश्वरात् प्राप्ताः (ये) (दुःष्वप्न्यम्) अ० ६।४६।३। कुनिद्राभयं विचारम् (दुरितम्) कष्टम् (निः स्व) तन्वादीनां छन्दसि बहुलम्। वा० पा० ६।४।८६। षू प्रेरणे यण्। निः सुव। निर्गमय (अथ) अनन्तरम् (गच्छेम) प्राप्नुयाम (सुकृतस्य) पुण्यस्य (लोकम्) समाजम् ॥

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    विषय

    बन्धन-मोक्ष

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! (वि-षाणा) = [सन् संभक्तौ] विशिष्ट सम्भजन [उपासन] के द्वारा (पाशान्) = विषयवासनाओं के बन्धनों को (अस्मत्) = हमसे (अधिविष्य) = पृथक् कीजिए (ये) = जो (उत्तमाः) = उत्कृष्ट 'ज्ञानसङ्ग व सुखसङ्ग' रूप सात्विक बन्धन हैं, (अधमा:) = जो निकृष्ट 'प्रमाद, आलस्य व निद्रा'रूप तामस् बन्धन हैं, तथा (ये) = जो (वारुणा:) = हमें उत्तम कर्मों से रोककर तृष्णासङ्ग के कारण अन्याय से अर्थसंग्रहों में प्रवृत्त करते हैं, उन राजस् बन्धनों से भी हमें मुक्त कीजिए। २. उपासना करते हुए हम जब बन्धनों से मुक्त हों तब (अस्मत्) = हमसे (दु:ष्वप्न्यम्) = अशुभ स्वप्नों के कारणभूत (दुरितम्) = अशुभाचरणों को (निष्व) = पृथक् कीजिए [ प्रेरणे]। (अथ) = अब पाशविमोचन के पश्चात् (सुकृतस्य) = पुण्य के (लोकम्) = प्रकाश को (गच्छेम) = प्राप्त हों-सदा पुण्य कर्मों को करते हुए प्रकाशमय लोक में रहनेवाले हों।

    भावार्थ

    प्रभु की उपासना के द्वारा हम 'सात्विक, राजस् व तामस्' बन्धनों से ऊपर उठें, अशुभ स्वजों के कारणभूत दुराचरणों से दूर होकर पुण्य से प्राप्त प्रकाशमयलोक में निवास करें।

     

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    भाषार्थ

    हे जीवात्मन् ! तेरी शक्ति (विषाणा) दुःखान्तकारिणी है, (अस्मत्, अधि) हम से (पाशान्) पाशों अर्थात् फन्दों को (विष्य) काट दे, उनका अन्त करदे, (ये) जो पाश कि (उत्तमाः अधमाः) उत्कृष्ट और निकृष्ट हैं, (ये) जो (वारुणाः) वरुण परमेश्वर ने हमारे कर्मों के अनुसार हम पर डाले हैं। (अस्मद्) हमसे (दुष्वप्न्यम्१) बुरे स्वप्नों से होने वाले (दुरितम्) दुष्फल को (अस्मत् निःस्व) हमसे निर्गमय, निकाल दे, पृथक् कर दें, (अर्थ) तदनन्तर (सुकृतस्य) सुकर्मियों के (लोकम्) लोक को (गच्छेम) हम जाएं, प्राप्त हों। निष्व= निः स्व=निः + षू प्रेरणे (तुदादिः)

    टिप्पणी

    [विषाणा = वि + षो अन्तकर्मणि (दिवादिः) वरुण और उसके पाशों के वर्णन के लिये देखो (अथर्व ४।१६।१-९) । सुकृतस्य लोकम् = "सुकृतस्य पुण्यस्य फलभूतं लोकम् इमं च अमु च गच्छेन प्राप्नुवाम" (सायण)। "इमम्" द्वारा ऐहलौकिक, तथा "अमुम्" द्वारा पारलौकिक अर्थात् दो "सुकृत लोक" सायणाचार्य की अभीष्ट हैं। मन्त्र में जीवात्मा की आत्मिक शक्ति को सूचित किया है, जीवात्मा की आध्यात्मिक शक्ति के जागरण का परिणाम दर्शाया है।] [१. दुष्वप्न्य दो प्रकार का है जाग्रद् दुष्वप्न्यं स्वप्ने दुष्वप्न्यम् (अथर्व० काण्ड १६ अनुवाक २, पर्याय सूक्त २, मन्त्र ९)। अर्थात् एक तो जाग्रत् अवस्था का दुष्वप्न्य और दूसरा स्वप्नावस्था में होने वाला दुष्वप्न्य। स्वप्नावस्था का दुष्वप्न्य तो बुरे संस्कारों का परिणाम है, और ये बुरे संस्कार जाग्रद् अवस्था के परिणाम है। जाग्रद् दुष्वप्न्य हैं जाग्रद् अवस्था की दूर् अनुभूतियां बुरे कर्म तथा बुरे विचार और बुरे संकल्प। अतः दुष्वप्न्य-दुरितों को दूर करने के लिये जाग्रद-दुष्वप्न्यों पर संयम चाहिये।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Bondage

    Meaning

    Lord most potent, Agni, breaker of the chains of slavery, relax and remove from us all the snares of bondage, lowest as well as highest, which are controlled by Varuna, lord of cosmic justice. Remove evil thoughts and dreams and all dirt of malignity from us so that we may rise to the noble state of virtuous action.

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    Subject

    Agni etc, (as per verses)

    Translation

    Unfastening the fetters, that are the highest and lowest, of the venerable: Lord, may you take off those from us. May you remove the evil of frightening dreams from us. And then, may we go to the land of the virtuous.

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    Translation

    O learned person! through the discriminative knowledge untie from us the snares which are upper and the lower and which are stretched from the Supreme Being. Drive from us the evil dream and the obstacles and thus we rise to the status of virtue or the state of salvation. [N.B. In this verse the term Uttama and Adhama pash-stand to mean the species of upper and lower categories in which the soul remains bound.]

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    Translation

    O heroic person, with full devotion, untie from the upper, lower snares imposed by God for our faults, Drive from us evil dream, drive off sin, then let us go into the world of virtue.

    Footnote

    Upper: intense, or located in the upper part of the body. Lower: mild in nature, or located in the lower part of the body. World: state, condition, assembly.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(विषाणा) अ० ३।७।१। षण सम्भक्तौ−घञ्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति आत्। विविधसेवनेन (पाशान्) बन्धान् (वि ष्य) षो अन्तकर्मणि। विमुञ्च (अधि) अधिकृत्य (अस्मत्) अस्मत्तः (ये) पाशाः (उत्तमाः) ऊर्ध्वकायाश्रिताः (अधमाः) अधःकायाश्रिताः (वारुणाः) तत आगतः। पा० ४।३।७४। इत्यण्। वरुणात् कष्टनिवारकात् परमेश्वरात् प्राप्ताः (ये) (दुःष्वप्न्यम्) अ० ६।४६।३। कुनिद्राभयं विचारम् (दुरितम्) कष्टम् (निः स्व) तन्वादीनां छन्दसि बहुलम्। वा० पा० ६।४।८६। षू प्रेरणे यण्। निः सुव। निर्गमय (अथ) अनन्तरम् (गच्छेम) प्राप्नुयाम (सुकृतस्य) पुण्यस्य (लोकम्) समाजम् ॥

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