अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 121 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 121/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कौशिक देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सुकृतलोकप्राप्ति सूक्त
    पदार्थ -

    [हे शूर !] (विषाणा=०−णेन) विविध भक्ति के साथ (पाशान्) फन्दों को (अस्मत्) हमसे (अधि) अधिकारपूर्वक (वि ष्य) खोल दे, (ये) जो (उत्तमाः) ऊँचे और (ये) जो (अधमाः) नीचे फन्दे (वारुणः) जो दोषनिवारक वरुण परमात्मा से आये हैं। (दुःष्वप्न्यम्) नींद में उठे कुविचार और (दुरितम्) विघ्न को (अस्मत्) हम से (निः) निकाल दे, (अथ) फिर (सुकृतस्य) धर्म के (लोकम्) समाज में (गच्छेम) हम जावें ॥१॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य भक्ति की शक्ति को बढ़ाकर अपने बुरे कर्म के फल दुःखों को पुरुषार्थ से हटाकर सोते-जागते उत्तम विचार करते हैं, वे ही पुण्यात्मा कीर्ति पाते हैं ॥१॥

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