अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 125/ मन्त्र 2
दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्योज॒ उद्भृ॑तं॒ वन॒स्पति॑भ्यः॒ पर्याभृ॑तं॒ सहः॑। अ॒पामो॒ज्मानं॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑तमिन्द्रस्य॒ वज्रं॑ हविषा॒ रथं॑ यज ॥
स्वर सहित पद पाठदि॒व: । पृ॒थि॒व्या:। परि॑ । ओज॑: । उत्ऽभृ॑तम् । वन॒स्पति॑ऽभ्य: । परि॑ । आऽभृ॑तम् । सह॑: । अ॒पाम् । ओ॒ज्मान॑म् । परि॑ । गोभि॑: । आऽवृ॑तम् । इन्द्र॑स्य । वज्र॑म् । ह॒विषा॑ । रथ॑म् । य॒ज॒ ॥१२५.२॥
स्वर रहित मन्त्र
दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः। अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज ॥
स्वर रहित पद पाठदिव: । पृथिव्या:। परि । ओज: । उत्ऽभृतम् । वनस्पतिऽभ्य: । परि । आऽभृतम् । सह: । अपाम् । ओज्मानम् । परि । गोभि: । आऽवृतम् । इन्द्रस्य । वज्रम् । हविषा । रथम् । यज ॥१२५.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सेना और सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(दिवः) बिजुली वा सूर्य से और (पृथिव्याः) भूमि वा अन्तरिक्ष से (उद्भृतम्) उत्तम रीति से धारण किये गये (ओजः) बल को (परि) प्राप्त करके, (वनस्पतिभ्यः) वट आदि वनस्पतियों से (आभृतम्) अच्छे प्रकार पुष्ट किये गये (सहः) बल को (परि) प्राप्त करके (गोभिः) किरणों से (आवृतम्) ढाँपे हुए (अपाम्) जलों के (ओज्मानम्) बल को (परि) प्राप्त करके (वज्रम्) शस्त्रसमूह और (रथम्) रथ को (इन्द्रस्य) बिजुली के (हविषा) ग्राह्य गुण के साथ (यज) संयुक्त कर ॥२॥
भावार्थ
मनुष्य पृथ्वी आदि भूतों और उनसे उत्पन्न पदार्थों के सम्बन्ध से बल और पराक्रम बढ़ा कर विमान आदि यानों को बना कर आनन्दित होवें ॥२॥
टिप्पणी
२−(दिवः) विद्युतः सूर्याद् वा (पृथिव्याः) भूमेरन्तरिक्षाद् वा (परि) लक्षणेत्थंभूताख्यान०। पा० १।४।९०। इति कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्राप्य (ओजः) बलम् (उद्भृतम्) उत्तमतया धृतम् (वनस्पतिभ्यः) वटादिभ्यः (परि) प्राप्य (आभृतम्) समन्तात् पोषितम् (सहः) बलम् (अपाम्) जलानाम् (ओज्मानम्) अ० ४।१९।८। बलम् (परि) प्राप्य (गोभिः) किरणैः (आवृतम्) आच्छादितम् (इन्द्रस्य) विद्युतः (वज्रम्) शस्त्रसमूहम् (हविषा) ग्रहणेन (रथम्) रमणीयं विमानादियानम् (यज) संयोजय ॥
विषय
शरीर-रथ
पदार्थ
१. 'यह शरीर-रथ क्या है? इसका विवेचन करते हुए कहते हैं कि इसमें (दिव:) = मस्तिष्करूप धुलोक का तथा (पृथिव्याः) = अन्नमयकोशरूप पृथिवी का (ओज:) = बल (परि उद्भतम्) = सब प्रकार से धारण किया गया है। इस शरीर में (वनस्पतिभ्यः) = वानस्पतिक पदार्थों के सेवन से (सहः) = शत्रुमर्षक बल (पर्याभृतम्) = चारों ओर-अङ्ग-प्रत्यङ्ग में भूत हुआ है। २. इस (अपाम् ओज्मानम्) = [आपो रेतो भूत्वा०] रेत:कणों के बलवाले (गोभिः परि आवृतम्) = ज्ञानरश्मियों से समन्तात् आच्छादित (इन्द्रस्य वज्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष के आयुध के समान (रथम्) = इस शरीर-रथ को (हविषा यज) = दानपूर्वक अदन से युक्त कर। यज्ञशेष के सेवन के द्वारा इसे नीरोग व अमर बना-'यज्ञशेषममृतम्'।
भावार्थ
इस शरीर में हम मस्तिष्क व शरीर दोनों को ही सबल बनाएँ। वानस्पतिक पदार्थों के सेवन से इसे रोगनिरोधक शक्ति से युक्त करें। यह रेत:कणों के बलवाला हो। ज्ञानरश्मियों से आवृत हो। रोगरूप शत्रुओं के लिए वजहो। यज्ञशेष के सेवन द्वारा हम इसे नीरोग बनाएँ।
भाषार्थ
(दिवस्पृथिव्याः) द्युलोक और पृथिवी से (उद्भृतम्) उद्धृत (ओजः) ओजस् रूप, (वनस्पतिभ्यः) वनस्पतियों से (आभृतम्) आहृत (सहः) बल रूप (परि = पञ्चम्यर्थानुवादी); (अपाम् ओज्मानम) जल के ओजस् रूप, (गोभिः) गोचर्मों द्वारा (परि) सब ओर (आवृतम) आच्छादित (इन्द्रस्य) विद्युत् के (वज्रम्) वज्ररूप (रथम्) सैन्यरथ को (हविषा) आत्माहुति द्वारा (यज) सुसंगत कर।
टिप्पणी
[गोभिः = गोचर्मभिः। यथा “अथाप्यस्यां ताद्धितेन कृत्स्नवन्निगमा भवन्ति, "गोभिः श्रीणीत मत्सरमिति" पयसः (२/२/५ निरुक्त), अर्थात् गोसम्बन्धी मन्त्रों में तद्धितार्थ अर्थात् भव, अवयव, विकार में, पूर्ण गोपद का प्रयोग होता है। यथा “गोभिः श्रीणीत मत्सरम" में गोभिः का अभिप्राय है पयः अर्थात् दुग्ध। अर्थात् दूध के द्वारा सोम औषधि को पकाओ। मन्त्र में रथ के निर्माण का वर्णन है। रथ का निर्माण पञ्चभूतों की सहायता से होता है। वनस्पति का बीज पृथिवी में अङ्कुरित होता, द्युलोकस्थ सूर्य के ताप प्रकाश द्वारा, और अन्तरिक्ष के वर्षाजल द्वारा सींचा जाकर बढ़ता, और वृक्षरूप होकर वृक्ष के काष्ठ से निर्मित होता है। चलने में अधिक वेग वाला होने से, और शत्रुओं के विनाश में सहायक होने से रथ वैद्युतवज्ररूप है। यज = देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु में सङ्गति करण अभीष्ट है। वनस्पतियां किन तत्वों से पैदा होती तथा बढ़ती है, इसका भी परिज्ञान मन्त्र द्वारा होता है।]
विषय
युद्ध का उपकरण रथ और देह।
भावार्थ
(दिवः) द्युलोक से मेघ की वर्षा रूप में और (पृथिव्याः) पृथिवी से अन्नरूप में (ओजः) तेज, बल को (परि उद् भृतम्) सब ओर से प्राप्त कर संगृहीत किया है और (वनस्पतिभ्यः) सब वनस्पतियों के (सहः) सहन या आघातकारी को दबा लेने की शक्ति का भी (पर्याभृतम्) संग्रह किया है और उससे यह शरीर रचा गया है, अतः (अपाम्) सब रसों के बलस्वरूप (गोभिः) इन्द्रिय शक्तियों से (परि आवृतम्) सम्पन्न (इन्द्रस्य) आत्मा के (वज्रं) सब पापों के वर्जनकारी इस (रथम्) देह को (हविषा) अन्न से (यज) सम्पन्न करो । युद्धस्थ के पक्ष में गौण है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः वनस्पतिर्देवता। १, ३ त्रिष्टुभौ, २ जगती। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory Chariot
Meaning
Man of knowledge and power, receive, cultivate and socially promote the light and energy emanating from the sun and earth. Receive, cultivate and promote the strength, courage and endurance emanated from the trees and forests. Cultivate and promote the energy of the waters. Refine and strengthen the chariot invincible as thunder and blazing with rays of the sun, and develop it further by self-sacrifice, research and investment.
Translation
Show full respect to the chariot replete with synthesis of basic elements of heaven and earth - the divine extracted essence of the forest wood. It possesses the velocity of waters, and is encompassed with the cow-hide and the thunderbolt, (Also Rg. VI.47.27)
Translation
O King! unite yourself with the ware-fare utility and activity of electricity obtaining the power derived from solar electricity, from firmament and from the earth, possessing the force obtained from trees, wood of the trees, having in your possession the power of waters covered with sun-beans and completely equipped with steadily weapon and chariot.
Translation
O learned person, give us the vitality possessed by the Sun and Earth, the strength of trees, the vitalizing juice of waters. Fill thy car with war like weapons shining like the rays of the Sun!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(दिवः) विद्युतः सूर्याद् वा (पृथिव्याः) भूमेरन्तरिक्षाद् वा (परि) लक्षणेत्थंभूताख्यान०। पा० १।४।९०। इति कर्मप्रवचनीयत्वम्। प्राप्य (ओजः) बलम् (उद्भृतम्) उत्तमतया धृतम् (वनस्पतिभ्यः) वटादिभ्यः (परि) प्राप्य (आभृतम्) समन्तात् पोषितम् (सहः) बलम् (अपाम्) जलानाम् (ओज्मानम्) अ० ४।१९।८। बलम् (परि) प्राप्य (गोभिः) किरणैः (आवृतम्) आच्छादितम् (इन्द्रस्य) विद्युतः (वज्रम्) शस्त्रसमूहम् (हविषा) ग्रहणेन (रथम्) रमणीयं विमानादियानम् (यज) संयोजय ॥
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