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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 51 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 51/ मन्त्र 2
    ऋषिः - शन्ताति देवता - आपः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - एनोनाशन सूक्त
    52

    आपो॑ अ॒स्मान्मा॒तरः॑ सूदयन्तु घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः पुनन्तु। विश्वं॒ हि रि॒प्रं प्र॒वह॑न्ति दे॒वीरुदिदा॑भ्यः॒ शुचि॒रा पू॒त ए॑मि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आप॑: । अ॒स्मान् । मा॒तर॑: । सू॒द॒य॒न्तु॒ । घृ॒तेन॑ । न॒: । घृ॒त॒ऽप्व᳡: । पु॒न॒न्तु॒ । विश्व॑म् । हि । रि॒प्रम् । प्र॒ऽवह॑न्ति । दे॒वी: । उत्। इत् । आ॒भ्य॒: । शुचि॑: । आ । पू॒त: । ए॒मि॒ ॥५१.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आपो अस्मान्मातरः सूदयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु। विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आप: । अस्मान् । मातर: । सूदयन्तु । घृतेन । न: । घृतऽप्व: । पुनन्तु । विश्वम् । हि । रिप्रम् । प्रऽवहन्ति । देवी: । उत्। इत् । आभ्य: । शुचि: । आ । पूत: । एमि ॥५१.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 51; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    द्रोह के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (मातरः) माता के समान पालन करनेवाले (आपः) जल (अस्मान्) हम को (सूदयन्तु) सींचें, (घृतप्वः) घृतको पवित्र करनेवाले [जल] (घृतेन) घृत से (नः) हमको (पुनन्तु) पवित्र करें। (देवीः) दिव्यगुणयुक्त जल (विश्वम्) सब (हि) ही (रिप्रम्) मल को (प्रवहन्ति) बहा देते हैं, (आभ्यः) इन जलों से (इत्) ही (शुचिः) शुद्ध और (आ पूतः) सर्वथा पवित्र होकर (उत् एमि) मैं ऊँचा चलता हूँ ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे जल अन्न आदि पदार्थ उत्पन्न करके मलों को शुद्ध करके और अनेक शिल्पों में प्रयुक्त होकर उपकार होते हैं, वैसे ही मनुष्य विद्या आदि शुभ गुण प्राप्त करके परस्पर उपकार करके उदय को प्राप्त हों ॥२॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० ४।२ ॥

    टिप्पणी

    २−(आपः) जलानि (अस्मान्) मनुष्यादीन् (मातरः) मातृवत्पालिकाः (सूदयन्तु) षूद क्षरणे। सिञ्चन्तु। शुन्धयन्तु (घृतेन) आज्येन (नः) अस्मान् (घृतप्वः) घृत+पूञ् पवने−क्विप्। घृतं पुनन्ति यास्ता आपः (पुनन्तु) पवित्रयन्तु (विश्वम्) सर्वम् (हि) खलु (रिप्रम्) लीरीङोर्ह्रस्वः पुट् च तरौ श्लेषणकुत्सनयोः। उ० ५।५५। इति रीङ् श्रवणे−र प्रत्ययः, ह्रस्वः पुट् च। रपो रिप्रमिति पापनामनी भवतः−निरु० ४।२१। कुत्सितं मलम् (प्रवहन्ति) प्रकर्षेण क्षालयन्ति, अपगमयन्ति (देवीः) देव्यः। दिव्यगुणयुक्ताः (उत्) उदित्य (इत्) एव (आभ्यः) अद्भ्यः (शुचिः) शुद्धः (आ) समन्तात् (पूतः) पवित्रः (एमि) गच्छामि ॥

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    विषय

    आपः

    पदार्थ

    १. (आप:) = शरीरस्थ रेत:कण [आपः रेतो भूत्वा०] (मातरः) = हमारे जीवन का निर्माण करनेवाले हैं। ये (अस्मान्) = हमें (सूदयन्तु) = [क्षालयन्तु पापरहितान् शुद्धान् कुर्वन्तु-सा०] पापरहित व शुद्ध जीवनवाला बनाएँ, (घृतेन) = ज्ञान-दीसि के द्वारा (घृतप्वः) = मलों के क्षरण व ज्ञानदीपन द्वारा पवित्र करनेवाले ये रेत:कण (नः पुमन्तु) = हमें पवित्र करें। २. (देवी:) = ये दिव्य गुणोंवाले व रोगों को पराजित करने की कामनावाले रेत:कण (हि) = निश्चय से (विश्वम्) = सब (रिप्रम्) = दोषों को (प्रवहन्ति) = बहा ले-जाते हैं-धो डालते हैं। (आभ्य:) = इन रेत:कणरूप जलों से (शुचिः) = पवित्र बना २ हुआ (आ पूतः) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में पवित्र हुआ-हुआ (इत्) = निश्चय से (उत् एमि) = ऊपर उठता हूँ।

     

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित रेत:कण हमें शुद्ध व पवित्र बनाते हैं। सब दोषों से शून्य होकर मैं ऊपर उठता हूँ।

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    भाषार्थ

    (मातरः) माताओं की तरह (आपः) जल (अस्मान्) हमें (सूदयन्तु) प्रक्षालित करें, शुद्ध करें। (घृतप्वः) घृत की तरह पवित्र करने वाले (नः) हमें (घृतेन) घृत सदृश जल द्वारा (पुनन्तु) पवित्र करें। (देवी:) दिव्य गुणों वाले जल (विश्वम्, रिप्रम्) सब पाप को ( प्रवहन्ति) प्रवाहित कर देते हैं। (शुचिः) शुद्ध तथा (पूतः) पवित्र हुआ, (आभ्यः) इन जलों से (उद् इत्) उठ कर (आ एमि) मैं आता हूं।

    टिप्पणी

    ["मातरः" माताएं जैसे निजबच्चों के मलों को धोकर उन्हें शुद्ध करती हैं, बैसे जल हमारे मलों को क्षारित कर हमें शुद्ध करें। ये मल हैं पाप जन्य चित्तनिष्ठ संस्कार तथा तज्जन्य शारीरिक और मानसिक रोग। मन्त्र में प्रतिदिन स्नान या जल चिकित्सा का वर्णन है। यह जल तीन प्रकार का है। (१) भूमिष्ठ, जिस में कि भोमतत्त्व मिले रहते हैं। (२) दूसरा है वर्षाजल जिसे कि "घृत" सदृश पवित्र या क्षरित कहा है, घृ क्षरणे (जुहोत्यादिः), यह भौमजल की अपेक्षा शुद्ध होता है। (३) तीसरा है प्रवाहित नदी जल, जिस में बैठ कर जल चिकित्सा करने से शारीरिक मल साथ-साथ प्रवाहित होता रहता है, जब कि टब के जल में जल चिकित्सा करने से शारीरिक मल जल में ही मिला रहता है। सूदयन्तु= षूद क्षरणे (भ्वादिः), णिच्गर्भित प्रयोग। घृतेन=घृतम् उदकनाम (निघं० १॥५२)। घृतप्वः= घृत (उदक) + पूङ पवने (भ्वादिः)। यजु० ४।२ में भी "घृतप्वः" पाठ है। मन्त्र में "शुचि" द्वारा मानसिक और "पूत" द्वारा शारीरिक शुद्धि का कथन हुआ है]।

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    विषय

    पवित्र होकर उन्नत होने की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (अस्मान्) हम को (मातरः) समस्त विश्व का निर्माण करनेवाली (आपः) आप्त शक्तियां (सूदयन्तु) प्रेरित करें, सदा समर्थ बनावें। और (तघृतप्वः) तेज से पवित्र करनेवाले तेजोमय सूर्य आदि पदार्थ (घृतेन) अपने घृत = प्रकाश से (नः) हमें सदा (पुनन्तु) पवित्र करें, हमारे शरीर मन, और वाणी के मलों का शोधन करें। क्योंकि (देवीः) दिव्य शक्तियां ही (विश्वम्) समस्त (रिप्रम्) मल और पाप भाव को (प्रवहन्ति) नदियों के समान दूर बहा ले जाती हैं और धो डालती हैं। (आभ्यः इत्) इनमें स्नान करते ही मैं (शुचिः) शुद्ध पवित्र होकर (उत्) ऊर्ध्व गति को प्राप्त होकर सात्विक भाव में (आ-पूतः) सर्वथा पवित्र होकर (एमि) उस प्रभु को प्राप्त होऊँ।

    टिप्पणी

    ‘मातरः शुचयन्त’ इति पाठ: यजु०,ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंतातिर्ऋषिः। १ सोमः २ आपः, ३ वरुणश्च देवताः। १ गायत्री, २ त्रिष्टुप, ३ जगती। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Purity and Power

    Meaning

    Let the holy waters, sacred as mother powers, cleanse, chasten and fortify us. They are pure, they may sanctify us with the purity of piety and refinement. They wash away the dirt and evil of the world, they being divine. Purified, sanctified and consecrated by these, I go on forward, higher and higher.

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    Subject

    Apab (Waters)

    Translation

    May waters, the mothers of all, cleanse us. May the purfiers of butter purify us with melted butter These divine waters carry ‘off all the dirt of sins. Purified with these all around, I rise up clean and pure. (Also Yv. IV.2)

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    Translation

    Let the waters like mothers cleanse us, let the waters of shining rays purify us with their lights, the powerful pure waters bear off each blot and stain, let us be cleansed and stainless from these waters.

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    Translation

    May all the world-building forces strengthen me. May glittering objects like the Sun, purify me with their brilliance. Divine forces alone bear oil each blot and sin. Bathing in them may I become cleansed and stainless, and attain to God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(आपः) जलानि (अस्मान्) मनुष्यादीन् (मातरः) मातृवत्पालिकाः (सूदयन्तु) षूद क्षरणे। सिञ्चन्तु। शुन्धयन्तु (घृतेन) आज्येन (नः) अस्मान् (घृतप्वः) घृत+पूञ् पवने−क्विप्। घृतं पुनन्ति यास्ता आपः (पुनन्तु) पवित्रयन्तु (विश्वम्) सर्वम् (हि) खलु (रिप्रम्) लीरीङोर्ह्रस्वः पुट् च तरौ श्लेषणकुत्सनयोः। उ० ५।५५। इति रीङ् श्रवणे−र प्रत्ययः, ह्रस्वः पुट् च। रपो रिप्रमिति पापनामनी भवतः−निरु० ४।२१। कुत्सितं मलम् (प्रवहन्ति) प्रकर्षेण क्षालयन्ति, अपगमयन्ति (देवीः) देव्यः। दिव्यगुणयुक्ताः (उत्) उदित्य (इत्) एव (आभ्यः) अद्भ्यः (शुचिः) शुद्धः (आ) समन्तात् (पूतः) पवित्रः (एमि) गच्छामि ॥

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