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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 61 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 61/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वा देवता - रुद्रः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - विश्वस्रष्टा सूक्त
    127

    अ॒हं वि॑वेच पृथि॒वीमु॒त द्याम॒हमृ॒तूंर॑जनयं स॒प्त सा॒कम्। अ॒हं स॒त्यमनृ॑तं॒ यद्वदा॑म्य॒हं दैवीं॒ परि॒ वाचं॒ विश॑श्च ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । वि॒वे॒च॒ । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् । अ॒हम् । ऋ॒तन् । अ॒ज॒न॒य॒म् । स॒प्त । सा॒कम् । अ॒हम् । स॒त्यम् । अनृ॑तम् । यत् । वदा॑मि । अ॒हम् । दैवी॑म् । परि॑ । वाच॑म् । विश॑: । च॒॥६१.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहं विवेच पृथिवीमुत द्यामहमृतूंरजनयं सप्त साकम्। अहं सत्यमनृतं यद्वदाम्यहं दैवीं परि वाचं विशश्च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । विवेच । पृथिवीम् । उत । द्याम् । अहम् । ऋतन् । अजनयम् । सप्त । साकम् । अहम् । सत्यम् । अनृतम् । यत् । वदामि । अहम् । दैवीम् । परि । वाचम् । विश: । च॥६१.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 61; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमेश्वर की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अहम्) मैंने (पृथिवीम्) पृथिवी (उत) और (द्याम्) सूर्य को (विवेच) पृथक्-पृथक् किया, (अहम्) मैंने (सप्त) सात (ऋतून्) व्यापनशील [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] को (साकम्) आपस में मिला हुआ (अजनयम्) उत्पन्न किया है। (अहम्) मैं (यत्) जो कुछ (सत्यम्) सत्य और (अनृतम्) झूठ है [उसे] (च) और (अहम्) मैं (देवीम्) विद्वानों में होनेवाली (वाचम्) वाणी को (विशः परि) सब मनुष्यों में भरपूर (वदामि) बताता हूँ ॥२॥

    भावार्थ

    परमेश्वर ने पृथिवी सूर्य आदि पदार्थों को रचकर सत्य का विधान और असत्य का निषेध वेद द्वारा सब प्राणियों को बताया है ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अहम्) परमेश्वरः (विवेच) विचिर् पृथग्भावे−लिट्। पृथक् पृथक् कृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (उत) अपि च (द्याम्) सूर्यलोकम् (अहम्) (ऋतून्) अर्तेश्च−तुः। उ० १।७२। इति ऋ गतौ−तु, स च कित्। ऋतुरर्तेर्गतिकर्मणः−निरु० २।२५। ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी−निरु० १२।३७। सप्त ऋषीन्। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धिरूपान् (अजनयम्) उत्पादितवानस्मि (साकम्) सह परस्परं संहतान् (अहम्) (सत्यम्) यथार्थम् (अनृतम्) (यत्) यत् किञ्चित् तदपि (वदामि) कथयामि विधिनिषेधरूपेण (अहम्) (दैवीम्) देव−अञ्। विद्वत्सु भवाम् (परि) परीत्य व्याप्य (वाचाम्) वेदवाणीम् (विशः) मनुष्यान् निघ० २।३। (च) समुच्चये ॥

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    विषय

    सत्यम् अनृतम्

    पदार्थ

    १. प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (पृथिवीं उत द्याम्) = पृथिवी और धुलोक को (विवेच) = पृथक् पृथक् थामे रखता हूँ। (अहम्) = मैं (साकम्) = साथ-साथ ही सात (प्रातून) = सात गतिशील प्राणों को 'दो कान, दो नासिका-छिद्र, दो आँख व मुख' (अजनयम्) = उत्पन्न करता हूँ। २. (अहम्) = मैं (यत् सत्यम् अनृतम्) = जो सत्य और झूठ है, उसका (वदामि) = प्रतिपादन करता हूँ। 'यह सत्य है, यह अनृत है'-इसका बतानेवाला मैं ही हूँ, (च) = और (अहम्) = मैं ही (दैवीं वाचम्) = दिव्य वेदवाणी को (परिविश:) = प्रजाओं का लक्ष्य करके प्रतिपादित करता हूँ।

    भावार्थ

    धुलोक व पृथिवीलोक का धारण करनेवाले वे प्रभु ही हैं। प्रभु ही हमें मुखादि सात प्राणों को-इन्द्रियों को प्राप्त कराते हैं। प्रभु ही हमारे लिए सत्य व असत्य का विविक्तरूप से उपदेश करते हैं। प्रभु ही सृष्टि के आरम्भ में वेदवाणी का प्रकाश करते हैं।

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    भाषार्थ

    (अहम्) मैंने (पृथिवीम्) पृथिवी को (उत) तथा (द्याम्) द्युलोक को (विवेच) विवेक पूर्वक पृथक्-पृथक् किया है; (अहम्) मैंने (सप्त ऋतून्) सात ऋतुओं को (साकम्) साथ-साथ (अजनयम्) पैदा किया है। (यद्) जो (सत्यम्, अनृतम्) सत्य और असत्य का स्वरूप है उसे (अहम् वदामि) मैं ही कहता हूं, (च) और (विशः परि) सब प्रजा को (देवीम्, वाचम्) दिव्य वेदवाणी (अहम् वदामि) मैं कहता हूं।

    टिप्पणी

    [सप्त ऋतून्= ६ ऋतुएं, १ अधिमास, मलमास। यथा "अहोरात्रै र्विमितं त्रिशदङ्ग त्रयोदशं मासं यो निर्मिमीते" (अथर्व १३।३॥८)। यह १३वां मास, सौरमासों और चान्द्रमासों के वर्षों में दिनों द्वारा हुई विषमता की पूर्ति के लिये है। परमेश्वर सत्य और अनृत का भेद वेदवाक् द्वारा दर्शाता है तथा "दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः। अश्रद्धामनृतेऽदधात् श्रद्धां सत्ये प्रजापति:"। (यजु० १९।७७)॥ अर्थात् प्रजापति ने सत्य और अनृत के स्वरूपों को देख कर उन का भेद दर्शाया है। उस ने अनृत में अश्रद्धा को, और सत्य में श्रद्धा को स्थापित किया है।

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    विषय

    ईश्वर का स्वतः विभूति-परिदर्शन।

    भावार्थ

    (अहम्) मैं ही (पृथिवीम्) इस विशाल पृथिवी को ओर (उत् द्याम्) द्यौलोक को (विवेच) पृथक् पृथक् थाम रखता हूं और (अहम्) मैं (साकम्) एक साथ ही (सप्त) सात (ऋतून्) गतिशील प्राणों को (अजनयम्) अपने सामर्थ्य से इस शरीर में उत्पन्न करता हूं। (सत्यम् अनृतं यत्) सत्य क्या है और असत्य क्या है, यह जो कुछ भी है उसको (अहं वदामि) मैं ही ठीक ठीक बतलाता हूं। और (दैवीम्) ज्ञानमयी, विद्वानों की (वाचम्) वाणी को (परिविशः) प्रजा के भीतर भी (अहम्) मैं ही बतलाता हूं, उपदेश करता हूं। अर्थात् यह सब परसात्मा ही करता है। बही इन सब सामर्थ्यों का धारक है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। रुद्रो देवता। त्रिष्टुभः २-३ भुरिजौ। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Lord Supreme

    Meaning

    I separate the earth and the solar region; I create the seven united flows of Nature: five elements and the two orders of sense, i. e., senses of perception and action; seven orders of the worlds of the universe from Bhu to Satyam; seven seasons; seven lights of the sun, seven orders of wind and rain, and the seven seas. I speak of what is true and of what is not true and the eternal Word of the Veda for all people of the world.

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    Translation

    1 have set the earth and the sky apart. I have created seven seasons together. What is untrue, I speak truly. I have brought the divine speech to people all around.

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    Translation

    I set the heavenly region and the earth, I bring into being all the seven seasons, 1 tell discriminating the nature of what is truth and what is untruth and I reveal divine vedic speech over the worldly subject.

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    Translation

    I have set the Earth and Heaven asunder. I have created together the seven Rishis. My word is truth, what I deny is falsehood. I preach to all people the divine Vedic knowledge.

    Footnote

    I: God. Seven Rishis: skin, eye, tongue, ear, nose, mind sand intellect.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अहम्) परमेश्वरः (विवेच) विचिर् पृथग्भावे−लिट्। पृथक् पृथक् कृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (उत) अपि च (द्याम्) सूर्यलोकम् (अहम्) (ऋतून्) अर्तेश्च−तुः। उ० १।७२। इति ऋ गतौ−तु, स च कित्। ऋतुरर्तेर्गतिकर्मणः−निरु० २।२५। ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी−निरु० १२।३७। सप्त ऋषीन्। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धिरूपान् (अजनयम्) उत्पादितवानस्मि (साकम्) सह परस्परं संहतान् (अहम्) (सत्यम्) यथार्थम् (अनृतम्) (यत्) यत् किञ्चित् तदपि (वदामि) कथयामि विधिनिषेधरूपेण (अहम्) (दैवीम्) देव−अञ्। विद्वत्सु भवाम् (परि) परीत्य व्याप्य (वाचाम्) वेदवाणीम् (विशः) मनुष्यान् निघ० २।३। (च) समुच्चये ॥

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