अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 72 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 72/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वाङ्गिरा देवता - शेपोऽर्कः छन्दः - जगती सूक्तम् - वाजीकरण सूक्त
    पदार्थ -

    (यथा) जिस प्रकार से (असितः) बन्धनरहित, स्वतन्त्र परमात्मा (वशान् अनु) अपने वशवर्त्ती प्राणियों के लिये (असुरस्य) बुद्धिमान् की (मायया) बुद्धि से (वपूंषि) अनेक शरीरों को (कृण्वन्) बनाता हुआ (प्रथयते) विस्तार करता है। (एव) वैसे ही (अयम्) यह (अर्कः) मन्त्र [विचार] (ते) तेरे (शेपः) सामर्थ्य को (सहसा) सहनशक्ति के साथ और (अङ्गम्) अङ्ग को (अङ्गेन) अङ्ग के साथ (संसमकम्) भली-भाँति संयुक्त (कृणोतु) करे ॥१॥

    भावार्थ -

    जैसे परमेश्वर ने अपनी बुद्धिमत्ता से जगत् को रचकर महा उपकार किया है, वैसे ही मनुष्य वेदों के विचार से अपनी शक्ति बढ़ा कर बढ़ती करें ॥१॥

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