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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कबन्ध देवता - जातवेदा अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - प्रतिष्ठापन सूक्त
    83

    य उ॒दान॑ट् प॒राय॑णं॒ य उ॒दान॒ण्न्याय॑नम्। आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑नं॒ यो गो॒पा अपि॒ तं हु॑वे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । उ॒त्ऽआन॑ट् । प॒रा॒ऽअय॑नम् । य: । उ॒त्ऽआन॑ट् । नि॒ऽअय॑नम् । आ॒ऽवर्त॑नम् । नि॒ऽवर्त॑नम् । य: । गो॒पा: । अपि॑ । तम् । हु॒वे॒ ॥७७.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य उदानट् परायणं य उदानण्न्यायनम्। आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । उत्ऽआनट् । पराऽअयनम् । य: । उत्ऽआनट् । निऽअयनम् । आऽवर्तनम् । निऽवर्तनम् । य: । गोपा: । अपि । तम् । हुवे ॥७७.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 77; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    संपदा पाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जिस (गोपाः) भूमिपालक राजा ने (परायणम्) निकल जाने का सामर्थ्य (उदानट्) पाया है, (यः) जिस ने (न्यायनम्) भीतर जाने का सामर्थ्य, और (यः) जिसने (आवर्तनम्) घूमने और (निवर्तनम्) लौटने का सामर्थ्य (उदानट्) पाया है, (तम्) उसको (अपि) ही (हुवे) मैं बुलाता हूँ ॥२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य नीतिनिपुण और कलाकुशल होवे, उसका आदर सत्कार सब मनुष्य करें ॥२॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १० सू० १९ म० ५ ॥

    टिप्पणी

    २−(यः) बलवान् पुरुषः (उदानट्) उत्+अशू व्याप्तौ संघाते च लिटि एश्त्वे, एशो लुक्, व्रश्चादिना षत्वम्। झलां जशोऽन्ते। पा० ८।२।३९। इति डत्वम्। वावसाने। पा० ६।४।५६। इति टत्वम्। आनट्, व्याप्तिकर्मा−निघ० २।१८। उत्कर्षेण व्याप प्राप (परायणम्) बहिर्गमनसामर्थ्यम् (यः) (उदानट्) (न्यायनम्) सांहितिको दीर्घः। अन्तर्गमनम् (आवर्तनम्) चक्रवत् परिक्रमणम् (निवर्तनम्) निवृत्य गमनम् (यः) (गोपाः) गो+पा रक्षणे−विच्। भूमिपालकः। राजा (अपि) एव (तम्) तादृशम् (हुवे) आह्वयामि ॥

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    विषय

    आवर्तनं निवर्तनम्

    पदार्थ

    १. (य:) = जो (गोपा:) =  हमारी इन्द्रियों का रक्षक प्रभु (परायणम्) = परम स्थान मोक्ष को-ऊँचे से-ऊँचे लोकों को भी व्याप्त कर रहा है और (यः) = जो (न्यायनम् उदानट्) = निचले लोकों को भी व्यास कर रहा है, वह प्रभु ही (आवर्तनम्) = विविध योनियों में हमारे आवर्तन को तथा निवर्तनम् योनियों से निवृत्त होकर मोक्ष-प्राप्ति को व्याप्त करता है, (अपितं हुवे) = क्या मैं उसे पुकारूँगा? क्या मेरे जीवन में वह शुभ दिन आएगा जबकि मैं उस प्रभु का स्मरण करनेवाला बनूंगा।

    भावार्थ

    वह शुभ दिन होगा जब मैं इन्द्रियों को विषयों से हटाकर उस प्रभ का स्मरण करनेवाला बनूंगा। वे प्रभु दूर-से-दूर व समीप-से-समीप हैं। वे ही हमें विविध शरीरों में जन्म व मोक्ष प्राप्त कराते हैं।

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    भाषार्थ

    (यः) जो (गोपाः) पृथिवी और वेदवाक् का रक्षक परमेश्वर (परायणम्)१ दूर के मार्गों में (उदानट) उत्कर्षरूप में व्याप्त है, (य:) जो (न्ययनम्)१ नीचे के मार्गों में भी (उवानट्) उत्कर्षरूप में व्याप्त है। (यः) जो (आवर्तनम्) सर्जनकाल में सृष्टि में आवे और (निवर्तनम्) प्रलयकाल में सृष्टि से निवृत्त हो जाने को [उदानट्] उत्कृष्टतया प्राप्त करता है (तम्) उस परमेश्वर का (अपि) भी (हुवे) मैं [स्तुति-प्रार्थना में] आह्वान करता हूँ।

    टिप्पणी

    [उदानट्= नशतिर्व्याप्तिकर्मा। अस्मात् छान्दसे लुङि 'मन्त्रे घस' (अष्टा० २।४।८०) इति च्लेर्लुक। आडागमः। 'षत्वजश्त्वे' (सायण)। गोपाः= गौ: पृथिवीनाम, गौः वाङ्नाम (निघं० १।१; १।११) +पा रक्षणे (अदादिः)। 'अपि: सम्भावनायाम्' (सायण)।] [१. दूर के मार्ग = द्युलोक सम्बन्धी। नीचे के मार्ग= अन्तरिक्ष के और भूलोक सम्बन्धी।]

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    विषय

    ईश्वर से राजा की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (यः) जो महान् आत्मा (परायणम्) परम स्थान, मोक्ष में (उद् आनट्) व्यापक है। और (यः) जो (न्यायनम्) नीचे के अयन, तामस लोकों को भी (उद् आनट्) उन्नत करता है और (यः) जो जीव के (आ-वर्तनम्) यहां आगमन और (निवर्त्तनम्) यहां से गमन, मुक्ति इन दोनों को वश करता है। ऐसा जो (गोपाः) लोकों का पालक है (तम् अपि हुवे) उसको भी मैं स्मरण करता हूँ।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘य उदानड् व्ययनं’ (द्वि०) ‘य उदानट् परायणम्’ इति ऋ०। ऋग्वेदे मथितो यामायनो भृगुर्वा वारुणिश्च्यवनो वा ऋषिः। आपो गावो वा देवता।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कबन्ध ऋषिः। जातवेदो देवता। १-३ अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Unassailable Stability

    Meaning

    He that masters, controls and protects the centrifugals, he that masters, controls and protects the centripetals, who sustains the going-away’s and the coming-in’s, who masters, controls and protects birth and rebirth, life and death, all that is and moves and yet in place in a steady state, that master protector manager of all, I invoke and adore.

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    Translation

    Who controls the ascending up, who controls the descent (descending) downwards, who controls coming and going back - Him, the protector of earth, I invoke.

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    Translation

    I grasp the nature and characteristics of the soul who is the guardian of organs who employs the limbs outside in the external world who takes them in his own fold in the subjective world and who controls the incoming and outgoing activities of them.

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    Translation

    I invoke God, the Lord of the worlds, Who resides in exalted final beatitude, and elevates the low dark worlds, Who controls the soul in its march to salvation, and its return.

    Footnote

    Final beatitude: Salvation Elevates the low dark worlds: Morally and spiritually uplifts the mortals residing in the universe through His Vedic teachings.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(यः) बलवान् पुरुषः (उदानट्) उत्+अशू व्याप्तौ संघाते च लिटि एश्त्वे, एशो लुक्, व्रश्चादिना षत्वम्। झलां जशोऽन्ते। पा० ८।२।३९। इति डत्वम्। वावसाने। पा० ६।४।५६। इति टत्वम्। आनट्, व्याप्तिकर्मा−निघ० २।१८। उत्कर्षेण व्याप प्राप (परायणम्) बहिर्गमनसामर्थ्यम् (यः) (उदानट्) (न्यायनम्) सांहितिको दीर्घः। अन्तर्गमनम् (आवर्तनम्) चक्रवत् परिक्रमणम् (निवर्तनम्) निवृत्य गमनम् (यः) (गोपाः) गो+पा रक्षणे−विच्। भूमिपालकः। राजा (अपि) एव (तम्) तादृशम् (हुवे) आह्वयामि ॥

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