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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - वासः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वास सूक्त
    217

    अ॒भि त्वा॒ मनु॑जातेन॒ दधा॑मि॒ मम॒ वास॑सा। यथाऽसो॒ मम॒ केव॑लो॒ नान्यासां॑ की॒र्तया॑श्च॒न ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भ‍ि । त्वा॒ । मनु॑ऽजातेन । दधा॑मि । मम॑ । वास॑सा । यथा॑ । अस॑: । मम॑ । केव॑ल: । न । अ॒न्यासा॑म् । की॒र्तया॑: । च॒न ॥३८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा। यथाऽसो मम केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभ‍ि । त्वा । मनुऽजातेन । दधामि । मम । वाससा । यथा । अस: । मम । केवल: । न । अन्यासाम् । कीर्तया: । चन ॥३८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 37; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे स्वामिन् !] (मनुजातेन) मननशील मनुष्यों में प्रसिद्ध (मम वाससा) अपने वस्त्र से (त्वा) तुझे (अभि दधामि) मैं बाँधती हूँ। (यथा) जिससे तू (केवलः) केवल (मम) मेरा (असः) होवे, (चन) और (अन्यासाम्) अन्य स्त्रियों का (न कीर्तयाः) तू न ध्यान करे ॥१॥

    भावार्थ

    विवाह में विद्वानों के बीच वस्त्र का गठबन्धन करके वधू और वर दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि पत्नी पतिव्रता और पति पत्नीव्रत होकर गृहस्थ आश्रम को प्रीतिपूर्वक निबाहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(त्वा) पतिम् (मनुजातेन) मननशीलेषु मनुष्येषु प्रसिद्धेन (अभि दधामि) अभिपूर्वो दधातिर्बन्धने। बध्नामि (वाससा) वस्त्रेण यथा येन प्रकारेण (असः) असेलेर्टि, अडागमः। भवेः (मम) (केवलः) असाधारणः (न) निषेधे (अन्यासाम्) अन्यस्त्रीणाम् (कीर्तयाः) कॄत संशब्दने, णिचि। उपधायाश्च। पा० ७।१।१०१। इत्वम्। उपधायां च। पा० ८।२।७८। इति दीर्घः, लेटि आडागमः। कीर्तयेः। कीर्तनं ध्यानं कुर्याः (चन) चार्थे ॥

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    विषय

    मनुजात वस्त्र द्वारा पति का बन्धन

    पदार्थ

    १. पत्नी पति से कहती है कि (त्वा) = तुझे (मनु-जातेन) = विचारपूर्वक धारण किये गये (मम वाससा) = अपने इस वस्त्र से (अभिदधामि) = अपने साथ बाँधती हूँ। मैं तुझे इसप्रकार अपने साथ सम्बद्ध करती हूँ कि (यथा) = जिससे (केवल: मम अस:) = तू केवल मेरा ही हो, (चन) = और (अन्यासाम्) = औरों का नाम भी (न कीर्तया:) = उच्चरित न करे।

     

    भावार्थ

    पत्नी विचारपूर्वक [समझदारी से] वस्त्रों को धारण करती हुई पति की प्रिया बने। पति को प्रसन्न रक्खे, पति का ध्यान कभी पर-स्त्री की ओर न जाए। भद्दे ढंग से धारण किये हुए वस्त्र कभी पति के मन में ग्लानि पैदा कर सकते हैं।

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    भाषार्थ

    (मनुजातेन१) मनोऽनुराग द्वारा उत्पादित (मम) मेरे अर्थात् अपने (वाससा) वस्त्र द्वारा [हे पति ! या वर !] (वा) तुझे मैं (अभि दधामि) बान्धती हूं। (यथा) जिस प्रकार कि तू (मम केवलः) केवल मेरा ही (असः) हो, और (अन्यासाम्) अन्य नारियों का (न कीर्तयाः चन) कीर्तन न करे।

    टिप्पणी

    [यह मन्त्र भी विवाह संस्कार सम्बन्धी है। वधू निज मनोऽनुराग पूर्वक जिस वस्त्र को बुनकर तय्यार करती है उस वस्त्र के द्वारा स्वयं न कि पुरोहित, पति को बान्धती है, उस के वस्त्र के साथ अपने वस्त्र का गठ जोड़ करती है। और इस विधि द्वारा पति को केवल अपना पति घोषित करती है। असः= अस् (भुवि), लेट् लकार + सिप् (इकारलोप, "इतश्च लोपः परस्मैपदेषु") + अट् का आगम]। [१. अथवा "मननपूर्वक तय्यार किये गए" वस्त्र द्वारा। मन्त्रेण जातेन, मनो र्वा निष्पन्नेन" (सायण)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Wedding Knot

    Meaning

    With cloth woven with love born of the heart and mind, I tie the knot and hold you to me so that you would be only with me in love and would not even think, much less speak, of others.

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    Subject

    Vasah - Cloth

    Translation

    I clothe you with my cloth, closely fitting you, so that you shall be mine alone and shall not even talk of others (women).

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.38.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    The bride at the time of tying of bride’s cloth with that of her bride-groom says : “The tie whith that of thine I fasten whin this cloth of mine and which is woven with art of man; that thou be exclusively mine and should not and would not talk of other women.

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    Translation

    With this my robe, woven dexterously, I envelop thee, so that thou mayst be all mine own and give no thought to other dames.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(त्वा) पतिम् (मनुजातेन) मननशीलेषु मनुष्येषु प्रसिद्धेन (अभि दधामि) अभिपूर्वो दधातिर्बन्धने। बध्नामि (वाससा) वस्त्रेण यथा येन प्रकारेण (असः) असेलेर्टि, अडागमः। भवेः (मम) (केवलः) असाधारणः (न) निषेधे (अन्यासाम्) अन्यस्त्रीणाम् (कीर्तयाः) कॄत संशब्दने, णिचि। उपधायाश्च। पा० ७।१।१०१। इत्वम्। उपधायां च। पा० ८।२।७८। इति दीर्घः, लेटि आडागमः। कीर्तयेः। कीर्तनं ध्यानं कुर्याः (चन) चार्थे ॥

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