अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 86 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 86/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - त्राता इन्द्र सूक्त
    पदार्थ -

    (त्रातारम्) पालन करनेवाले (इन्द्रम्) बड़े ऐश्वर्यवाले राजा को, (अवितारम्) तृप्त करनेवाले (इन्द्रम्) सभाध्यक्ष [राजा] को, (हवेहवे) संग्राम-संग्राम में (सुहवम्) यथावत् संग्रामवाले, (शूरम्) शूर (इन्द्रम्) सेनापति [राजा] को, (शक्रम्) शक्तिमान्, (पुरुहूतम्) बहुत [लोगों] से पुकारे गये (इन्द्रम्) प्रतापी राजा को (नु) शीघ्र (हुवे) मैं बुलाता हूँ, (मघवान्) बड़ा धनवाला (इन्द्रः) राजा (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) मङ्गल (कृणोतु) करे ॥१॥

    भावार्थ -

    सब मनुष्य धर्म्मात्मा, न्यायकारी, जितेन्द्रिय, शूरवीर राजा का सदा आदर करें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−६।४७।११, यजु० २०।५०, और साम० पू० ४।५।२ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top