Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1657
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
1
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१६५७॥
स्वर सहित पद पाठप꣡न्यं꣢꣯पन्यम् । प꣡न्य꣢꣯म् । प꣣न्यम् । इ꣢त् । सो꣣तारः । आ꣢ । धा꣣वत । म꣡द्या꣢꣯य । सो꣡म꣢꣯म् । वी꣣रा꣡य꣢ । शू꣡रा꣢꣯य ॥१६५७॥
स्वर रहित मन्त्र
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥१६५७॥
स्वर रहित पद पाठ
पन्यंपन्यम् । पन्यम् । पन्यम् । इत् । सोतारः । आ । धावत । मद्याय । सोमम् । वीराय । शूराय ॥१६५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1657
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment
भावार्थ - माणसांनी प्रशंसायोग्य भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञानाचा आत्म्यात संचय करावा, ज्यामुळे अभ्युदय व नि:श्रेयसचा मार्ग चांगल्या प्रकारे पार पडावा. ॥१॥
इस भाष्य को एडिट करें