Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1005
ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्रः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
5

स्वा꣣दो꣢रि꣣त्था꣡ वि꣢षू꣣व꣢तो꣣ मधोः पिबन्ति गौर्यः । या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१००५॥

स्वर सहित पद पाठ

स्वा꣣दोः꣢ । इ꣣त्था꣢ । वि꣣षूव꣡तः꣢ । वि꣣ । सूव꣡तः꣢ । म꣡धोः꣢꣯ । पि꣣बन्ति । गौर्यः꣢ । याः । इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । स꣣या꣡व꣢रीः । स꣣ । या꣡व꣢꣯रीः । वृ꣡ष्णा꣢꣯ । म꣡द꣢꣯न्ति । शो꣣भ꣡था꣢ । व꣡स्वीः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज्य꣢꣯म् ॥१००५॥


स्वर रहित मन्त्र

स्वादोरित्था विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः । या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१००५॥


स्वर रहित पद पाठ

स्वादोः । इत्था । विषूवतः । वि । सूवतः । मधोः । पिबन्ति । गौर्यः । याः । इन्द्रेण । सयावरीः । स । यावरीः । वृष्णा । मदन्ति । शोभथा । वस्वीः । अनु । स्वराज्यम् । स्व । राज्यम् ॥१००५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1005
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
Acknowledgment

पदार्थ -
(गौर्यः) चमकीली सूर्यकिरणें (इत्था) सचमुच (वि-सुवतः) विशेषरूप से भूमि पर बरसते हुए बादल के (स्वादोः) स्वादु (मधोः) मधुर जल का (पिबन्ति) पान करती हैं, (याः) जो सूर्यकिरणें (वृष्णा) वर्षा करनेवाले (इन्द्रेण) सूर्य की (सयावरीः) सहगामिनी होती हुई (शोभथा) शोभन प्रकार से (मदन्ति) आनन्दित करती हैं। (वस्वीः) निवासक वे किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के स्वराज्य के (अनु) अनुकूल चलती हैं ॥१॥

भावार्थ - अहो, सूर्य का स्वराज्य कैसा दर्शनीय है ! किस प्रकार सूर्य-किरणें निर्बाध होकर मेघ से बरसाये हुए नदी, नद, समुद्र आदि में व्याप्त जल को पीकर, पुनः बादल बनाकर फिर मेघ-जल को भूमि पर बरसा देती हैं। वैसे ही हमें भी चाहिए कि हम भी आन्तरिक स्वराज्य तथा अपने राष्ट्र के स्वराज्य की अर्चना करें ॥१॥

इस भाष्य को एडिट करें
Top