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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1015
ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
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त्री꣡णि꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ धा꣡र꣢या पृ꣣ष्ठे꣡ष्वै꣢꣯रयद्र꣣यि꣢म् । मि꣡मी꣢ते अस्य꣣ यो꣡ज꣢ना꣣ वि꣢ सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥१०१५॥

स्वर सहित पद पाठ

त्रा꣡णि꣢꣯ । त्रि꣣त꣡स्य꣢ । धा꣡र꣢꣯या । पृ꣣ष्ठे꣡षु꣢ । आ । ऐ꣣रयत् । रयि꣢म् । मि꣡मी꣢꣯ते । अ꣣स्य । यो꣡ज꣢ना । वि । सु꣣क्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्र꣡तुः꣢꣯ ॥१०१५॥


स्वर रहित मन्त्र

त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्ठेष्वैरयद्रयिम् । मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः ॥१०१५॥


स्वर रहित पद पाठ

त्राणि । त्रितस्य । धारया । पृष्ठेषु । आ । ऐरयत् । रयिम् । मिमीते । अस्य । योजना । वि । सुक्रतुः । सु । क्रतुः ॥१०१५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1015
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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पदार्थ -
(त्रितस्य) सूर्य के (त्रीणि) तीन—पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक रूप पृष्ठ हैं। उन (पृष्ठेषु) तीनों पृष्ठों में, उस पवमान सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमेश्वर ने (रयिम्) ऐश्वर्य को (ऐरयत्) प्रेरित किया हुआ है। साथ ही (सुक्रतुः) उस सुकर्मा परमेश्वर ने (अस्य) इस सूर्य के (योजना) योजनों को, अर्थात् सूर्य कितने योजन विस्तारवाला है, इस माप को भी (वि मिमीते) मापा हुआ है ॥३॥

भावार्थ - भूमि, अन्तरिक्ष और द्युलोक में सब जगह ही जगदीश्वर ने विशिष्ट ऐश्वर्य रखे हुए हैं। सब ग्रह, उपग्रह, सूर्य, नक्षत्र, नीहारिका आदियों का बनानेवाला वह उनके परिमाण को भी ठीक-ठाक जानता है ॥३॥

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