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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1019
ऋषिः - मन्युर्वासिष्ठः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
3
इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ प꣢वते꣣ गो꣡न्यो꣢घा꣣ इ꣢न्द्रे꣣ सो꣢मः꣣ स꣢ह꣣ इ꣢न्व꣣न्म꣡दा꣢य । ह꣢न्ति꣣ र꣢क्षो꣣ बा꣡ध꣢ते꣣ प꣡र्यरा꣢꣯तिं꣣ व꣡रि꣢वस्कृ꣣ण्व꣢न्वृ꣣ज꣡न꣢स्य꣣ रा꣡जा꣢ ॥१०१९॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्दुः꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । प꣣वते । गो꣡न्यो꣢꣯घाः । गो । न्यो꣣घाः । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । स꣡हः꣢꣯ । इ꣡न्व꣢꣯न् । म꣡दा꣢꣯य । ह꣡न्ति꣢꣯ । र꣡क्षः꣢꣯ । बा꣡ध꣢꣯ते । प꣡रि꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯तिम् । अ । रा꣣तिम् । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣ण्व꣢न् । वृ꣣ज꣡न꣢स्य । रा꣡जा꣢꣯ ॥१०१९॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय । हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा ॥१०१९॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्दुः । वाजी । पवते । गोन्योघाः । गो । न्योघाः । इन्द्रे । सोमः । सहः । इन्वन् । मदाय । हन्ति । रक्षः । बाधते । परि । अरातिम् । अ । रातिम् । वरिवः । कृण्वन् । वृजनस्य । राजा ॥१०१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1019
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 20; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ५४० क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ ब्रह्मानन्द रस का वर्णन है।
पदार्थ -
(गोन्योधाः) मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों में प्रवाहित होनेवाला, (वाजी) वेगवान्, (इन्दुः) सराबोर करनेवाला ब्रह्मानन्दरस (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (सोमः) अभिषुत वह ब्रह्मानन्दरस (इन्द्रे) जीवात्मा में (मदाय) उत्साह के लिए (सहः) बल (इन्वन्) प्रेरित करता है। वह रस (रक्षः) पाप को (हन्ति) विनष्ट करता है, (अरातिम्) आदानवृत्ति को (परिबाधते) दूर करता है। (वृजनस्य) आत्मिक बल का (राजा) राजा वह (वरिवः) आध्यात्मिक धन को (कृण्वन्) उत्पन्न करता है ॥१॥
भावार्थ - योगाभ्यास द्वारा आनन्दरस की नदी जीवात्मप्रदेश में जब बहती है, तब सब दोष दूर हो जाते हैं और चित्त निर्मल हो जाता है ॥१॥
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