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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1067
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - आदित्याः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
6
प्र꣡ति꣢ वा꣣ꣳसू꣢र꣣ उ꣡दि꣢ते मि꣣त्रं꣡ गृ꣢णीषे꣣ व꣡रु꣢णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢ꣳ रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣡ति꣢꣯ । वा꣣म् । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । मित्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । गृ꣣णीषे । व꣡रु꣢꣯णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢म् । रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रति वाꣳसूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम् । अर्यमणꣳ रिशादसम् ॥१०६७॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रति । वाम् । सूरे । उदिते । उत् । इते । मित्रम् । मि । त्रम् । गृणीषे । वरुणम् । अर्यमणम् । रिशादसम् ॥१०६७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1067
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम मन्त्र में मित्र, वरुण, अर्यमा की स्तुति की गयी है।
पदार्थ -
(सूरे उदिते) सूर्य के उदय होने पर मैं (वाम्) तुम दोनों (मित्रम्) मित्र जगदीश्वर और (वरुणम्) वरणीय जीवात्मा को, तथा (रिशादसम्) हिंसक दोषों के नाशक (अर्यमणम्) प्राण को (प्रति गृणीषे) एक-एक करके गुणवर्णनरूप स्तुति का विषय बनाता हूँ ॥१॥
भावार्थ - प्रभातकाल में मनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा को उद्बोधन देते हुए प्राणायामपूर्वक प्रतिदिन परमेश्वर की उपासना करें ॥१॥
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