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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1140
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
3
मू꣣र्धा꣡नं꣢ दि꣣वो꣡ अ꣢र꣣तिं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ वै꣢श्वान꣣र꣢मृ꣣त꣢꣯ आ जा꣣त꣢म꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢ꣳ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡ति꣢थिं꣣ ज꣡ना꣢नामा꣣स꣢न्नः꣣ पा꣡त्रं꣢ जनयन्त दे꣣वाः꣢ ॥११४०॥
स्वर सहित पद पाठमू꣣र्धा꣡न꣢म् । दि꣣वः꣢ । अ꣣रति꣢म् । पृ꣣थिव्याः꣢ । वै꣣श्वानर꣢म् । वै꣣श्व । नर꣢म् । ऋ꣣ते꣢ । आ । जा꣣त꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢म् । सम्रा꣡ज꣢म् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯म् । अ꣡ति꣢꣯थिम् । ज꣡ना꣢꣯नाम् । आ꣣स꣢न् । नः꣣ । पा꣡त्र꣢꣯म् । ज꣣नयन्त । देवाः ॥११४०॥
स्वर रहित मन्त्र
मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम् । कविꣳ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः ॥११४०॥
स्वर रहित पद पाठ
मूर्धानम् । दिवः । अरतिम् । पृथिव्याः । वैश्वानरम् । वैश्व । नरम् । ऋते । आ । जातम् । अग्निम् । कविम् । सम्राजम् । सम् । राजम् । अतिथिम् । जनानाम् । आसन् । नः । पात्रम् । जनयन्त । देवाः ॥११४०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1140
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ६७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के साक्षात्कार के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भी वही विषय है।
पदार्थ -
(मूर्धानम्) मूर्धा के समान सर्वोपरि विराजमान (दिवः) सूर्य के और (पृथिव्याः) पृथिवी के (अरतिम्) स्वामी, (वैश्वानरम्) सबके नेता, (ऋते) यज्ञ में (आ जातम्) सर्वत्र प्रसिद्ध, (कविम्) वेदकाव्य के कवि, (सम्राजम्) ब्रह्माण्ड के राजराजेश्वर, (जनानाम्) मनुष्यों के (अतिथिम्)अतिथि के समान पूज्य, (नः) हमारे (पात्रम्) पालनकर्ता (अग्निम्) अग्रनायक परमेश्वर को (देवाः) विद्वान् उपासक जन (आसन्) मुख से प्रणव-जप आदि करके (जनयन्त) अन्तरात्मा में प्रकट करते हैं ॥१॥
भावार्थ - सबके वन्दनीय, सब शुभ गुण-कर्म-स्वभावों से युक्त, विश्व के सम्राट् परमात्मा को जानकर, उसकी स्तुति और उपासना करके मनुष्यों को अपनी और दूसरों की उन्नति सिद्ध करनी चाहिए ॥१॥
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