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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1179
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
6
पु꣣नाना꣡स꣢श्चमू꣣ष꣢दो꣣ ग꣡च्छ꣢न्तो वा꣣यु꣢म꣣श्वि꣡ना꣢ । ते꣡ नो꣢ धत्त सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७९॥
स्वर सहित पद पाठपु꣣नाना꣡सः꣢ । च꣣मूष꣡दः꣢ । च꣣मू । स꣡दः꣢꣯ । ग꣡च्छ꣢꣯न्तः । वा꣣यु꣢म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । ते । नः꣣ । धत्त । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११७९॥
स्वर रहित मन्त्र
पुनानासश्चमूषदो गच्छन्तो वायुमश्विना । ते नो धत्त सुवीर्यम् ॥११७९॥
स्वर रहित पद पाठ
पुनानासः । चमूषदः । चमू । सदः । गच्छन्तः । वायुम् । अश्विना । ते । नः । धत्त । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११७९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1179
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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विषय - आगे फिर ब्रह्मानन्द का ही विषय है।
पदार्थ -
(पुनानासः) पवित्रता देते हुए, (चमूषदः) आत्मा एवं बुद्धिरूप कटोरों में स्थित और (वायुम्) गतिशील मन में तथा (अश्विना) प्राण-अपान में (गच्छन्तः) जाते हुए (ते) वे तुम सोम अर्थात् ब्रह्मानन्द-रस (नः) हमें (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्ययुक्त दिव्यधन (धत्त) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थ - ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाने पर मन तथा बुद्धि की पवित्रता, प्राण-अपान की कार्यक्षमता और आध्यात्मिक धन स्वयं ही उपासक के पास दौड़े चले आते हैं ॥२॥
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