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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1179
    ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    24

    पु꣣नाना꣡स꣢श्चमू꣣ष꣢दो꣣ ग꣡च्छ꣢न्तो वा꣣यु꣢म꣣श्वि꣡ना꣢ । ते꣡ नो꣢ धत्त सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पु꣣नाना꣡सः꣢ । च꣣मूष꣡दः꣢ । च꣣मू । स꣡दः꣢꣯ । ग꣡च्छ꣢꣯न्तः । वा꣣यु꣢म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । ते । नः꣣ । धत्त । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् ॥११७९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुनानासश्चमूषदो गच्छन्तो वायुमश्विना । ते नो धत्त सुवीर्यम् ॥११७९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    पुनानासः । चमूषदः । चमू । सदः । गच्छन्तः । वायुम् । अश्विना । ते । नः । धत्त । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् ॥११७९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1179
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे फिर ब्रह्मानन्द का ही विषय है।

    पदार्थ

    (पुनानासः) पवित्रता देते हुए, (चमूषदः) आत्मा एवं बुद्धिरूप कटोरों में स्थित और (वायुम्) गतिशील मन में तथा (अश्विना) प्राण-अपान में (गच्छन्तः) जाते हुए (ते) वे तुम सोम अर्थात् ब्रह्मानन्द-रस (नः) हमें (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्ययुक्त दिव्यधन (धत्त) प्रदान करो ॥२॥

    भावार्थ

    ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाने पर मन तथा बुद्धि की पवित्रता, प्राण-अपान की कार्यक्षमता और आध्यात्मिक धन स्वयं ही उपासक के पास दौड़े चले आते हैं ॥२॥

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    पदार्थ

    (ते चमूषदः पुनानासः) वह द्युलोक पृथिवीलोक—द्यावापृथिवीमय जगत् में व्यापक शान्तस्वरूप परमात्मा साक्षात् हुआ (वायुम्-अश्विना गच्छन्तः) प्राणवायु को*20 और दोनों कानों को*21 प्रेरित करता हुआ अपने आनन्दरस में और अमृतवचन से तृप्त करता हुआ (नः सुवीर्यं धत्त) हमारे लिये आत्मबल उत्तम उत्साह को धारण करावे॥२॥

    टिप्पणी

    [*20. “प्राणो वै वायुः” [तै॰ सं॰ २.१.१.२]।] [*21. “श्रोत्रे अश्विनी” [श॰ १२.९.१.१३]।]

    विशेष

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    विषय

    पवित्रता, प्रभु-प्राप्ति व शक्ति-लाभ

    पदार्थ

    हे सोमो! १. (पुनानासः) = हमारे जीवनों को पवित्र करते हुए । इन सोमकणों से जहाँ शरीर नीरोग होता है, वहाँ साथ ही मनोवृत्ति भी सुन्दर बनती है । एवं, ये सोम हमें अधिकाधिक पवित्र बनाते चलते हैं।

    २. (चमूषदः) = द्यावापृथिवी में स्थिर होनेवाले, अर्थात् हम प्रयत्न करके इन सोमकणों को शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें । मस्तिष्क तक आकर ये हमारी ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाले हों ।

    ३. (अश्विना) = प्राणापानों के द्वारा (वायुम्) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले [वा गतौ] प्रभु की ओर (गच्छन्तः) = जाते हुए । प्राणापान की साधना से ये सोमकण शरीर में सुरक्षित होते है। इनकी ऊर्ध्वगति होती है। ये हमारी बुद्धि को सूक्ष्म बनाते है और हम प्रभुदर्शन कर पाते हैं।

    ४. हे सोमो! (ते) = वे आप (नः) = हममें (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को (धत्त) = धारण कीजिए ।

    भावार्थ

    शरीर में प्राणापान की साधना से सोम की ऊर्ध्वगति होती है। ये सोम १. हमें पवित्र बनाते हैं, २. प्रभु की ओर ले जाते हैं, ३. शक्ति प्राप्त कराते हैं ।

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    विषय

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    भावार्थ

    (चमूषदः) अपने ज्ञान ग्रहण शक्तियों में जितेन्द्रिय होकर विराजमान (पुनानासः) पवित्र होते हुए (अश्विना) प्राण और अपान दोनों और (वायुम्) सबके प्रेरक आत्मा को (गच्छन्तः) उपलब्ध करते हुए (तेन) उस परमेश्वर या अपने भीतरी इन्द्र स्वरूप आत्मा के बल पर (उ) ही (सुवीर्यम्) उत्तम यश, बल और सामर्थ्य को (धत्त) धारण करते हैं।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरपि ब्रह्मानन्दविषय उच्यते।

    पदार्थः

    (पुनानासः) पवित्रतां प्रयच्छन्तः, (चमूषदः) चम्वोः आत्मबुद्धिरूपयोः पात्रयोः स्थिताः, किं च (वायुम्) गतिशीलं मनः (अश्विना) आश्विनौ प्राणापानौ च (गच्छन्तः) प्राप्नुवन्तः (ते) ते यूयं सोमाः ब्रह्मानन्दरसाः (नः) अस्मभ्यम् (सुवीर्यम्) श्रेष्ठवीर्ययुक्तं दिव्यं धनम् (धत्त) प्रयच्छत ॥२॥

    भावार्थः

    ब्रह्मानन्दे प्राप्ते सत्यात्ममनोबुद्धीनां पवित्रता प्राणापानयोः कार्यक्षमताऽऽध्यात्मिकं धनं च स्वयमेवोपासकं प्रति प्रद्रवन्ति ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।८।२, ‘धत्त’ इत्यत्र ‘धान्तु’।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    The pure Prana and Apana, dwelling in the organs of senses, marching towards the soul, achieve glory and forces on the strength of internal soul alone.

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    Meaning

    The same soma streams of life distilled from nature, contained in deep reservoirs, vibrating in human veins and nerves, marshalling in social forces energise and motivate the vibrant scholar and the pursuers of jnana-yoga and karma-yoga in knowledge and action. May they bring us the lustre and vitality of creative splendour and graces of culture, sanctifying as they are. (Rg. 9-8-2)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (ते चमूषदः पुनानासः) તે દ્યુલોક અને પૃથિવીલોક-દ્યાવા પૃથિવીમય જગતમાં વ્યાપક શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા સાક્ષાત્ થઈને (वायुम् अश्विना गच्छन्तः) પ્રાણવાયુને તથા બન્ને કાનોને પ્રેરિત કરીને પોતાના આનંદરસમાં અને અમૃતવચનથી તૃપ્ત કરીને (नः सुवीर्यं धत्त) અમારા માટે આત્મબળ ઉત્તમ ઉત્સાહને ધારણ કરાવે. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ब्रह्मानंद प्राप्त झाल्यावर मन व बुद्धी यांची पवित्रता प्राण-अपानची कार्यक्षमता व आध्यात्मिक धन स्वत:च उपासकाजवळ तीव्र गतीने येतात ॥२॥

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